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#HumanStory: सुर्खियों में रहने वाले कैब ड्राइवरों की ज़िंदगी का एक पहलू ये भी

कैब ड्राइवर संदीप कुमार गुप्ता

कैब ड्राइवर संदीप कुमार गुप्ता

सड़क पर पीली नंबर प्लेट देखकर लोगों का लहजा बदल जाता है. वे गुस्सा करते हैं. गाली-गलौज करते हैं. कई बार हाथापाई भी करते हैं. माफी मांगने पर भी बेबात भड़की सवारी शांत नहीं होती.

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(अक्सर खराब वजहों से खबरों की सुर्खियां बनने वाले कैब ड्राइवरों की जिंदगी एक दूसरा पहलू भी है. 4 सालों से दिल्ली में कैब चला रहे संदीप कुमार गुप्ता इसी पर बात करते हैं.)

ये है दिल्ली. खंडहरों से लेकर आसमान-छूती इमारतों और मेट्रो से लेकर खबरों का शहर. साथ ही पीली पट्टी वाली गाड़ियों का भी. चौबीस घंटों में शायद ही कोई वक्त हो, जब सड़कों पर कोई कैब सरसराती हुई न जा रही हो. संदीप की गाड़ी भी इन्हीं में से एक है.

हर कैब ड्राइवर की अपनी कहानी है. नींद की झोंक आने पर आंखों पर पानी के छींटे मारकर कैब चलाने से लेकर फाइव स्टार रेटिंग के लिए सवारी की गाली-गलौज सहने तक. 'मेरी कहानी भी इससे अलग नहीं', संदीप कहते हैं. अधिकतर वक्त दिन की शुरुआत एक-सी होती है. सवारियों के पास वक्त कम होता है.

वे गुस्से में होती हैं. ट्रैफिक के लिए हमें दोष देती हैं. यहां तक कि मौसम खराब होने की वजह भी हमें मान लेती हैं. कई लोगों का लहजा ऐसा होता है मानो हमें खरीद लिया हो.



पीली पट्टी देखकर सब इंसल्ट करते हैं
बताते हुए संदीप की आवाज में गुस्सा नहीं, एक खास किस्म का ठंडापन है. आदत के साथ आया ठंडापन. दिल्ली में कैब चलाना आसान काम नहीं. यहां दिन के कई घंटे जाम में बीतते हैं. जाम में फंसने पर भी कैब ड्राइवर झुंझलाहट जाहिर किए बगैर कैब चलाता है. ट्रैफिक में फंसे होने पर भी सवारियां हमें आगे बढ़ने को कहती हैं. आंखों के आगे दूर तक गाड़ियां फंसी हैं, पीछे सरकने का भी रास्ता नहीं लेकिन हमें निर्देश मिलते हैं. ऐसे में बिना बहस किए मैं आगे देखता रहता हूं. बड़ी मेहनत से गाड़ी सीखी, लाइसेंस जुटाया और काम मिला. अब काम करना ही अकेला मकसद है.

कैसे हुई शुरुआत
गाड़ी चलाते हुए कई बार घर की याद करता हूं. पिता पान का ठेला लगाया करते थे, जो चलना बंद हो गया. बड़ा भाई अपंग है. घर चलाने के लिए मेरा चलते रहना जरूरी है, ये बात मैंने स्कूल के दौरान ही समझ ली थी. एक महीने की ड्राइविंग क्लास ली. फिर दोस्तों से गाड़ी मांगकर हाथ साफ करता. ऐसे ही काम शुरू हुआ. सवारी गुस्सा करती है, गाली-गलौज तक उतर आती है लेकिन मैं घर को याद करके चुप रहता हूं.



रोज कितनी सारी तरह के लोग बैठते हैं, कलाकार, पत्रकार, परिवार, देशी-विदेशी, सब तरह के लोग. मैं सवारियों को याद नहीं रखना चाहता, न ये चाहता हूं कि मैं भी उन्हें याद रहूं.

गाड़ी चलाते हुए जबान सिल लेता हूं. सुनता सब हूं लेकिन बोलता कुछ नहीं. सवारियां एक अदृश्य आदमी चाहती हैं, जिसके सामने वे कुछ भी कह सकें. मैं वही बन जाता हूं. उनकी किसी भी बात पर अपनी राय नहीं देता.

रात में शहर बदल जाता है
शाम ढलने के साथ दिल्ली की तस्वीर बदल जाती है. और सवारियों के मिजाज भी. अक्सर देर रात बैठने वाली सवारियां नशे में होती हैं. बैठते ही सो जाती हैं और फिर चीखती हैं कि हमने उन्हें जगाया क्यों नहीं. हम सफाइयां देते रहते हैं और वे गालियां. ऐसा आएदिन होता है.

कई बार सवारी ही लूटमार भी करने लगती है. हाल ही में मेरे साथ भी एक हादसा होते-होते बचा. सुनसान जगह पर सवारी ने मुझे पैसे देने से इन्कार कर दिया. मांगने पर धमकी दी कि मोबाइल छीन लेंगे. मैं चुपचाप निकल गया. लेडी पैसेंजर के साथ कैब ड्राइवरों की बदतमीजी की कितनी खबरें आती हैं. कोई ऐसे ड्राइवरों का प्रतिशत नहीं देखता. सवारियां हमें शक की नजर से देखती हैं. लेडी पैसेंजर होने पर हम उनकी सुरक्षा का अतिरिक्त ख्याल रखते हैं. शीशे लॉक करके ड्राइव करते हैं ताकि जल्दी से उन्हें सही जगह पर छोड़ सकें.

प्रतीकात्मक तस्वीर


गाड़ी ने बनाया संवेदनशील
एसी कार में दिनभर बिताना ऐसा कौन मुश्किल काम है! बहुत से लोग हमारे काम को मामूली और बिना मेहनत का मानते हैं. उनसे कोई पूछे कि जाम में घंटों बिताना उन्हें कैसा लगेगा. गाड़ी चलाते हुए आंखें, कंधे बुरी तरह से दर्द करते हैं. पैर लटके हुए सूज जाते हैं. गालियां सुनते हुए मन दुखता है. सवारी से लेकर ट्रैफिक पुलिस तक जो आता है, बुरा बोलकर जाता है. परिवार चलाने के लिए ही हम ये जिल्लत झेल रहे हैं. कई सवारियां बहुत मुलायमित से बात करती हैं लेकिन ऐसा कम ही होता है.

मेरा कोई रुटीन नहीं
रोज दिन के 12 घंटे सड़कों पर बिताने वाले संदीप की शहर की सड़कों से घर के कमरों जितनी पहचान है. बताते हैं, कैब ड्राइवर का कोई रुटीन नहीं होता. जब भी काम आए, ड्राइव करना होता है. सुबह-दोपहर-रात. सबसे खूबसूरत होता है अलसुबह सड़कों पर निकलना. आधा शहर जाग रहा होता है और आधा ऊंघता होता है. दुकानों के सामने पानी के छींटे दिए जाते हैं. लोग कसरत करते दिखते हैं. कोई हड़बड़ाहट नहीं. कोई झुंझलाहट नहीं. सुबह की सवारियां भी अक्सर नरमी से बात करती हैं.

जिंदगी से आपकी क्या उम्मीद है! ये सवाल संदीप को देर तक चुप रखता है. फिर धीरे-धीरे कहते हैं- मैं ये काम इसीलिए कर रहा हूं ताकि मेरे बाद बच्चों को ये जिल्लत न झेलनी पड़े. कई बार हताश हो जाता हूं. पीली पट्टी देखकर लोगों का लहजा एकदम से बदल जाता है. चाहता हूं, मेरे पास भी एक सफेद प्लेट वाली गाड़ी हो. 

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