कहानी स्टैंडअप कॉमेडियन की: घरवालों ने माइक थामे तस्वीर देखी तो बताया, डिबेट की है

स्टैंड-अप कॉमेडियन आदेश निचित से बातचीत.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 24, 2018, 11:47 AM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 24, 2018, 11:47 AM IST
स्टेज पर खड़े हैं, रौशनी का घेरा आपपर फोकस होता है. आपको गाना नहीं गाना है, भाषण नहीं देना है. आपको जोक्स सुनाने हैं और पक्का करना है कि लोगों को उनपर हंसी आए. मैं तीन साल से यही कोशिश कर रहा हूं. स्टैंड-अप कॉमेडियन आदेश  निचित अपने बेहद ताजा और युवा अंदाज में इस अपेक्षाकृत नए हुनर के साथ अपनी जद्दोजहद साझा करते हैं.

कई बार ऐसा होता है कि मैं जोक्स सुना रहा होता हूं. ऑडियन्स में 4-5 लोग ही होते हैं. उनमें से 2 को मेरे मजाक समझ नहीं आ रहे होते और बाकी 3 को हंसी नहीं आ रही होती. मैं पूरी तैयारी के साथ जाता हूं. स्क्रिप्ट तैयार की होती है लेकिन मेरी बात लोगों को गुदगुदाती नहीं. तब कॉन्फिडेंस हिल जाता है. लेकिन तब भी कोशिश जारी रखता हूं.

ऐसे मौके पर कहता हूं, आप लोगों को मेरे लिए बुरा लग रहा होगा कि मेरी तैयारियों के बाद भी आपको हंसी नहीं आ रही. मुझे आपके लिए बुरा लग रहा है कि आप मेरे पास कितनी उम्मीदों के साथ आए और तब भी आप हंस नहीं पा रहे. ऐसी बातें करता हूं कि लोग झक मारकर हंस पड़ते हैं.



दिल्ली के बागपत के पास एक छोटे से गांव के आदेश  का सेंस-ऑफ-ह्यूमर शुरू से अच्छा रहा. दोस्तों से प्रोत्साहन मिला और शुरुआत हो गई. आदेश  बताते हैं, दोस्त कहते कि तेरे मजाक बढ़िया होते हैं, तू इसमें करियर की सोच. फिर ग्रेजुएशन के लिए दिल्ली आया और सेकंड ईयर से ओपन माइक में कॉमेडी शुरू कर दी. धीरे-धीरे समझ आया कि इसमें काफी तैयारी चाहिए होगी.
लोग खुद को अभिव्यक्त करने के लिए म्यूजिक, पेंटिंग चुनते हैं, मैंने कॉमेडी चुन ली.

स्टैंड-अप करते 3 साल हुए. अभी मेरी कोई पहचान नहीं है. ये पक्का भी नहीं कि पहचान बन सकेगी भी या नहीं. घरवालों को लगता है, बच्चा कंपीटिशन की तैयारी कर रहा है. एक बार उन्होंने माइक पकड़े मेरी कुछ तस्वीरें देख लीं. मैंने बताया कि मैं डिबेट में हिस्सा लिया करता हूं, हंसते हुए आदेश  कहते हैं लेकिन न बता पाने का मलाल भी उनकी आवाज में साफ है. ये पेशा इंजीनियरिंग, डॉक्टरी जैसी चीज नहीं कि मैं अपनी कामयाबी को लेकर पक्का रहूं, इसीलिए घरवालों को कुछ बता नहीं पाता.
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वैसे ये भी सच है कि कोई भी क्रिएटिव चीज सिक्योर नहीं होती. बस, इतना जानता हूं कि मैं कामयाब रहूं या नहीं, मैं कॉमेडी ही कर सकता हूं.



कई बार अजीब लेकिन मजेदार हालात होते हैं. किसी को आपकी बातों पर हंसी नहीं आ रही होती. लोग पिटी-पिटाई चीजें सुनना चाहते हैं लेकिन मैं सिर्फ ऑडियन्स को खुश करने नहीं आया. मैं बीच के रास्ते चुनने की कोशिश करता हूं ताकि मैं भी अपनी ओर से नया दे सकूं और उन्हें भी सुनकर अच्छा लगे. कई बार बेस्ट कोशिश पर भी लोग सपाट चेहरा लिए बैठे रहते हैं. तब बड़ी तकलीफ होती है. लेकिन शुरुआत में ये मुश्किलें सबको आती होंगी!

एक स्टैंड-अप कॉमेडियन की जिंदगी में भी 'रियाज' की खासी अहमियत है. मैं रोज सुबह घंटेभर स्क्रिप्ट लिखता हूं. इंटरनेट पर स्टैंड-अप देखता हूं और हफ्ते में पांच दिन किसी शो या फिर ओपन माइक में चला जाता हूं. पहले स्टेज पर जाने में डर लगता था, अब वो चला गया. अभी पहचान नहीं बनी है तो पैसे भी नहीं जितने मिल पाते हैं. किसी शो में दोस्तों से उधार लेकर जाता हूं तो कई बार कमरे के किराए के लिए संघर्ष करता हूं.

कोई एक चीज जिसकी आपको ख्वाहिश है? आदेश  तपाक से कहते हैं- चाहता हूं, मैं जो लिखूं, इतना मज़ेदार हो जाए कि लोग हंस सकें. अभी आलम ये है कि 10 चीजें लिखता हूं तो 1 बात पर किसी को हंसी आती है.

(इंटरव्यू- कल्पना शर्मा) 

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