#HumanStory: AIIMS से पढ़ाई कर रहा है कूड़ा बीनने-वाले का बेटा, पढ़ें इनकी कहानी

कचरे के जिस ढेर से सामने से गुजरते हुए लोग नाक पर रुमाल धर लेते हैं, मेरे पिता उसी ढेर के बीच अपना पूरा दिन बिताते. मैं भी इतवार को यही करता. या फिर भैंसों को पानी पिलाया करता. कभी सोचा नहीं था कि डॉक्टरी की पढ़ाई करूंगा. 

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 8, 2018, 7:38 AM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 8, 2018, 7:38 AM IST
(आसाराम ने पहली ही कोशिश में एम्स की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली. वे एम्स जोधपुर से एमबीबीएस कर रहे हैं. पढ़ें, देवास जिले के विजयागंज मंडी गांव के आसाराम को...)

भरोसा वो जमीन है, जिसकी नमी और खाद पाकर सपनों की खेती लहलहाती है. ये भरोसा आसाराम को विरासत में नहीं मिला. संघर्षों से उपजा है.

स्कूल जाने से पहले और लौटने के बाद वे कचरा बीनने में पिता का हाथ बंटाते. पन्नियां, बोतलें, कागज बीनना. बाद में उनकी अलग-अलग ढेरी बनाना. घरवालों ने सरकारी स्कूल में इसीलिए भेजा क्योंकि वहां मिड-डे मील मिलता है. तब भी आसाराम और बच्चों से अलग नजर आते. सारे बच्चे खेलते और आसाराम पढ़ते.

हम गांव-खेड़ा से हैं. लोगों से बात करने का शऊर नहीं था. यहां तक कि बच्चों से बात करते हुए भी डर लगता. स्कूल में दूसरे बच्चे गुल्ली-डंडा खेलते, कंचे ले जाते लेकिन मैं क्लास में ही किताब पढ़ता रहता. घरवाले पढ़े-लिखे नहीं हैं.

उन्होंने स्कूल भेजा ही इसलिए ताकि हमें दोपहर का खाना आराम से मिल जाए.

जो पढ़ाई होती, स्कूल में ही होती. घर लौटने के बाद सौ काम होते जो एक गरीब घर के लड़के को हो सकते हैं. पिता कूड़ा बीनते लेकिन खेती के मौसम में मजदूरी भी किया करते. ऐसे ही गांव के संपन्न आदमी ने हमें अपने बगीचे में रहने को एक कच्चा घर दे दिया. उसने उदारता दिखाते हुए कहा, आप हमारे बगीचे में रहें. इससे चौकीदारी भी हो जाएगी और आपके पास भी रहने की जगह होगी. इससे हमें छत तो मिली लेकिन बदले में खूब सारी मेहनत मुफ्त में करनी होती.

अक्सर रात को नौकर भेजकर हमें बुलाते कि भैंसों को पानी दे दो. कभी कहते कि आज झाड़ू और साफ-सफाई कर दो. वो जो भी कहते, हमें सब काम करना होता था.
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घर के काम करते और खेलते-कूदते बचपन बीत रहा था. गरीबी इतनी कि दो वक्त की रोटी का ठिकाना नहीं था. ऐसे में पिता ने बड़ा फैसला किया.

उन्होंने हमें पढ़ने के लिए सरकारी स्कूल भेज दिया ताकि कम से कम दोपहर का खाना मिल सके. स्कूल के कपड़े भी सरकार की तरफ से मिले और किताबें भी. मैं रोज स्कूल जाने लगा. क्लास से बच्चों से ठीक से बात करना नहीं आता था इसलिए पढ़ना सीखते ही किताबें पढ़ने लगा. एक टीचर ने देखा तो पिताजी से मुझे दूसरे स्कूल भेजने को कहा, जहां अच्छी पढ़ाई होती थी. उन्हीं की मदद से मेरी पढ़ाई जारी रही और मिडिल स्कूल के लिए नवोदय में सलेक्शन हो गया.

कड़ी से कड़ी जुड़ते जाना सुनने में जितना आसान लगता है, दरअसल आसाराम के लिए उतना था नहीं. वे याद करते हैं, दसवीं तक नवोदय में पढ़ा. वहां कुछ खास दिक्कत नहीं थी, सिवाय इसके कि मैं किसी प्रोग्राम में शामिल नहीं हो पाता था. वजह! मेरे पास पहनने लायक कपड़े नहीं थे.

सब बच्चे अच्छे कपड़े पहनकर आते और मेरे पास तीन जोड़ी ही कपड़े थे. वहीं घर पहन लो, वही बाहर पहन लो. मैं या तो जाता ही नहीं था या फिर टीचर के डांटने पर जाऊं भी तो सबसे पीछे दुबककर बैठता. इसी दौरान एक फाउंडेशन के जरिए मेडिकल की प्रवेश परीक्षा की तैयारी का मौका मिला. उसके जरिए मैं पुणे जा पहुंचा जहां सालभर तक मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी करनी थी.



मैं डरा रहता लेकिन लौट नहीं सकता था
पहली बार बड़े शहर पहुंचकर बड़ी परीक्षा की तैयारी का मौका मामूली नहीं था और यही बात आसाराम को लगातार डराए रखती. उस दौर को याद करते हुए आसाराम चंद पल ठिठके रहते हैं. पापा कूड़ा बीनते हैं. हमारा फूस का घर है. घर से दूर आने वाला मैं पहला बच्चा हूं. ये सारी बातें हर वक्त दिमाग में रहतीं. डरता कि मेडिकल का एंट्रेंस पास न कर सका तो क्या होगा! वापस लौटकर किताबों की जगह हाथ में कूड़ा आ जाएगा! साथ पढ़ने वाले बच्चे पढ़े-लिखे घरों से थे. खूब बड़ी-बड़ी बातें करते. कंप्यूटर की बात होती. मैं चुप रहता क्योंकि मुझे न बोलना आता था, न ऐसी बातों की समझ थी. छोटी-मोटी लड़ाई भी होती तो कई लड़के मेरे घर के हालात को बीच में ले आते. कई बार हिम्मत हारा, तब घरवालों ने हौसला दिया.
हौसला क्या...अभी रह, छह महीने बाद तो लौटना है. ये वक्त निकाल ले. सलेक्शन हो भी सकता है.

आज एम्स, जोधपुर में मुझे 15 दिन हो चुके. पापा यहां छोड़ने आए थे. बड़ा-सा कॉलेज देखकर पहले तो एकदम सिटपिटा गए, फिर कहा- ये है तेरा कॉलेज! अब मेडिकल-फेडिकल की तो मुझे समझ नहीं लेकिन इतने बड़े कॉलेज में पढ़ेगा तो कुछ अच्छा ही होगा.

'एम्स में सलेक्शन के बाद जिंदगी में क्या बदलाव आए? पहले घर लौटता तो पापा के काम में मदद करता. कोई नाम लेकर नहीं बुलाता था. सलेक्शन के बाद घर पर रहा तो लोग मिलने आते. वे याद दिलाते कि मैं उनसे कब और कहां मिल चुका हूं', हंसते हुए आसाराम बताते हैं.

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