Human Story: लोग कहते थे मैं दिव्यांग हूं, लेकिन फेसबुक की CEO ने कहा- जीनियस हो तुम

मुझे डायस्प्रैक्सिया (डेवलपमेंट डिसऑर्डर) नामक बीमारी है, ये जानने में मेरे पैरेंट्स को नौ सालों का वक्‍त लग गया था. इसके बाद से ही मैंने ठान लिया था कि इस दिशा में कुछ करना है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 2, 2019, 2:54 PM IST
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आज भी वो वक्‍त मुझे अच्‍छी तरह से याद है, जब मेरी मम्‍मी-पापा ये नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर मुझे हुआ क्‍या है? सब कुछ समझता हूं. दिमाग बहुत तेज है. पढ़ने में अच्‍छा हूं. टीचर को सब जवाब भी देता हूं. फिर भी एग्‍जाम में कम मार्क्‍स क्‍यों लाता हूं? आधा पेपर छोड़कर क्‍यों चला आता हूं. व्‍यवहार, बातचीत करने का तरीका सब कुछ आम बच्‍चों जैसा क्‍यों नहीं है? मेरा दिमाग और मेरा शरीर ये दोनों अलग दिशा में क्‍यों चलते हैं? मेरा शारीरिक विकास आखिर ठहर क्‍यों गया है?

मेरे मम्‍मी-पापा इन सभी सवालों के जवाब ढूंढ नहीं पा रहे थे. वो इन बातों को लेकर बेहद परेशान ही थे कि तभी एक दिन मेरी स्‍कूल की टीचर ने कह दिया कि आप अपने बच्‍चों को किसी दिव्‍यांग स्‍कूल में लेकर जाइए. वहां उसका एडमिशन कराएं. ये बात सुनकर मेरे पैरेंट्स को बहुत दुख हुआ.हालांकि उन्‍होंने कभी इस बात को मेरे सामने जाहिर नहीं होने दिया लेकिन उनकी फिक्र उनके चेहरे पर साफ पढ़ी जा सकती थी.





उनको देखकर समझा जा सकता था कि वो अपने बेटे की इस परेशानी को समझने के लिए पागल थे. वे बस कुछ भी करके ये जानना चाहते थे कि आखिर उनके बेटे को हुआ क्‍या है? इसके लिए उन्‍होंने हर जतन किए. कभी मुझे लेकर किसी डॉक्‍टर के पास भागे तो कभी किसी मनोवैज्ञानिक के पास. ये सब कुछ करते-करते उन्‍हें लगभग नौ साल बीत गए, तब जाकर कहीं मालूम चल सका कि आखिर मुझे हुआ क्‍या है? दरअसल डॉक्‍टर ने बताया कि मुझे डायस्प्रैक्सिया (डेवलपमेंट डिसऑर्डर) नामक गंभीर बीमारी है. इस मर्ज से पीड़ित शख्‍स का शारीरिक विकास सामान्य बच्चों की अपेक्षा काफी कम होता है. उनका शरीर और ब्रेन दोनों में तालमेल बिठाना मुश्किल होता है. मगर डॉक्टर ने कहा कि मेरा आईक्यू औसत से भी ऊपर है.


ये सुनने के बाद मेरे पैरेंट्स के लिए एक पल के लिए सब कुछ ठहर सा गया. मगर ये सब जानने के बाद मैंने हार नहीं मानीं. उसी वक्‍त ठान लिया था कि जो कुछ मेरे साथ हुआ है. वो मैं किसी और बच्‍चे के साथ नहीं होने देना चाहता था. दरअसल इस बीमारी को पता लगने में नौ साल लग गए थे. इसलिए मैं चाहता था कि अब किसी और बच्‍चे के साथ ऐसा न हो. हालांकि मुझे पता नहीं था कि करना क्‍या है? लेकिन मैंने अपनी बीमारी से ध्‍यान हटाकर अपने शौक पर ध्‍यान देने लगा. मुझे कंप्‍यूटर में दिलचस्‍पी थी तो मैं कंप्‍यूटर सीखता था. याद है मुझे दस साल की उम्र में कोंडिग करने लगा था.



इधर मैंने रिसर्च भी करना शुरु किया तो जाना हर छठे बच्चे को डेवलेपमेंट डिस्ऑर्डर होता है. मुझे लगा कि फिर इसका कुछ हल तो होना चाहिए. लगातार रिसर्च करता रहा.अंत में छह साल की कड़ी मेहनत के बाद मैंने सोलह साल की उम्र में मैंने ‘माई चाइल्‍ड ऐप’ बनाया. इसके जरिए केवल दस सेकेंड में एक से चौबीस महीने तक के बच्‍चे को डेवलेपमेंटल डिस्ऑर्डर है या नहीं पता किया जा सकता है, जो बात पता करने में नौ साल लग गए थे. कोई भी पैरेंट इस ऐप के जरिए चंद सेकेंड में पता कर सकते हैं.

अगर आपके बच्‍चे को कोई परेशानी है तो आप इस ऐप के जरिए पता कर सकते हैं. इधर-उधर भटकना नहीं पड़ेगा. इस ऐप में बच्चे के वजन, लंबाई, शारीरिक गतिविधियों के बारे में 8 सवाल पूछे जाते हैं. इन सवालों के जवाब के आधार पर ऐप संबंधित बच्चे के शारीरिक विकास की धीमी  रफ्तार के कारण के बारे में बताता है. साथ ही इलाज के लिए डॉक्टर के नाम भी सुझाए जाते हैं.



आज वो लम्‍हा बेहद खुशी देता है मेरी मम्‍मी का पार्लर है. उनके यहां एक लेडी आई थी.उन्‍होंने कहा कि मेरे बच्‍चे को दिक्‍कत थी. इस ऐप से पता चला कि तो मेरी मम्‍मी ने उनसे कहा कि अरे ये ऐप मेरे बच्‍चे ने बनाया है. उस वक्‍त हम सब बेहद खुश थे. साल 2015 को मैं नहीं भूला सकता, जब मेरा ऐप को फेसबुक की सीईओ शेरिल सैंडबर्ग ने भी सराहा था. सीईओ ने इस ऐप के बारे में लिखा और मेरी सरहाना भी की. इसके बाद से कई अन्‍य लोगों का इधर ध्‍यान गया.आज लोग इस ऐप के बारे में बात करते हैं तो लगता है कुछ बेहतर किया है.

( ये कहानी भोपाल शहर से ताल्‍लुक रखने वाले हर्ष सोंगरा की है. वे बचपन में  डायस्प्रैक्सिया के शिकार गए  थे. इसके बाद उन्‍होंने इस बीमारी से लड़ने के लिए माई चाइल्‍ड ऐप बनाया. इसकी तारीफ फेसबुक की सीईओ ने भी की )

(इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human stories पर क्लिक करें.)
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