#HumanStory: नौ साल की बच्ची ने 25 किताबों से शुरू की लाइब्रेरी,अब पूरा देश कर रहा है मदद

पापा की ख्‍वाहिश थी कि मैं और दीदी अंग्रेजी में बात करें. मैं उनकी इस इच्‍छा को पूरा करने के लिए अंग्रेजी में बोलने की कोशिश करती हूं. भले ही वो गलत ही क्‍यों न हो?

News18Hindi
Updated: April 11, 2019, 10:03 AM IST
#HumanStory: नौ साल की बच्ची ने 25 किताबों से शुरू की लाइब्रेरी,अब पूरा देश कर रहा है मदद
मुस्‍कान
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Updated: April 11, 2019, 10:03 AM IST
साल 2015 की बात है. उस वक्‍त मैं नौ साल की थी.चौथी कक्षा में पढ़ती थी.उस दौरान घर के आस-पास बच्‍चों को ऐसे ही घूमते देखती थी. उनको देखकर ये सोचती थी कि ये बच्‍चे खेलते रहते हैं या अपने मम्‍मी-पापा के साथ मिलकर उनके काम में हाथ बंटाते हैं लेकिन कभी पढ़ाई क्‍यों नहीं करते.मुझे लगा कि जब सब बच्‍चे पढ़ते हैं तो ये क्‍यों नहीं? इन्‍हें भी पढ़ना-लिखना चाहिए, तभी एक दिन की बात है राज्‍य शिक्षा केंद्र के अधिकारियों ने हमारी बस्‍ती का दौरा किया.

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उन्‍होंने यहां एक क्विज प्रतियोगिता करवाई गई थी.इस प्रतियोगिता में बहुत से बच्‍चों ने हिस्‍सा लिया. उन सबमे मैंने पहला स्‍थान हासिल किया था. इसके बाद अधिकारयों ने मुझे 25 किताबें गिफ्ट की थीं. किताबें पाकर मैं बहुत खुश थी, जब भी स्‍कूल से लौटकर आती थी तो उन किताबों को निहारती रहती थी. ऐसी ख्‍वाहिश होती थी कि जल्‍दी से ये सभी रंग-बिरंगी किताबें पढ़ लूं. उसके बाद शिक्षण केंद्र वाले सर और किताबें ले सकूं. मेरी ये लगन देखकर घर वाले भी बहुत खुश होते थे. इसी दौरान मैंने सोचा कि क्‍यों न ये किताबें मैं और भी अपनी सहेलियों और बच्‍चों के साथ शेयर करूं, जिनके पास पढ़ने-लिखने के लिए पैसे नहीं है.बस यही सोचकर मैंने अपनी किताबें और बच्‍चों के लिए पहले चबूतरे पर सजाना शुरू कर दिया.किताबें देखकर कुछ बच्‍चे आने लगे.

मुस्‍कान


इनमे कुछ पढ़ते तो कुछ देखकर वापस चले जाते. कुछ ऐसे थे जो रोजाना आने लगे. बस फिर क्‍या था यहीं से एक-एक करके बच्‍चे बढ़ते चले गए फिर बड़े लोग भी इस बारे में बात करने लगे और जो लोग अपने बच्‍चे को स्‍कूल नहीं भेज पाते थे, वे मेरी किताबें पढ़ने भेजने लगे. इस तरह से धीरे-धीरे संख्‍या बढ़ने लगी थी.मेरी ये कोशिश देखकर राज्‍य शिक्षण केंद्र वाले सर एक बार फिर आए. इस बार उन्‍होंने मेरी मदद  की. उन्‍होंने लाइब्रेरी खोली और उसमे खूब सारी किताबें हमें उपलब्‍ध कराईं. इस तरह किताबें बढ़ी तो बच्‍चे भी बढ़ने लगे.

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मैं भी हर रोज स्‍कूल से आने के बाद लाइब्रेरी पहुंची हूं. यहां अपने से छोटे बच्‍चों को पढ़ाती भी हूं.अच्‍छा लगता है हर दिन यहां 30 से 35 बच्‍चे आते हैं. वहीं गर्मियों में ये संख्‍या और बढ़ जाती है तो अच्‍छा लगता है. बस्ती के बच्चे पढ़ने के लिए किताबें घर भी ले जाते हैं और फिर अगले दिन लौटाते हैं.अपनी लाइब्रेरी के लिए एक रजिस्टर भी रखती हैं ताकि उनके पास किताबों का पूरा रिकॉर्ड रहे. वहीं अब मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान के भईया और दीदी लोग आती हैं और हमारे बच्‍चों को पढ़ाती भी हैं.  इसके अलावा वो लोग सिंगिग, डासिंग भी सिखाती हैं. अब हमारी लाइब्रेरी में 2 हजार से ज्‍यादा किताबें हैं. इसके अलावा देश के कोने-कोन से लोग लाइब्रेरी के लिए किताबें भेजते हैं.

बस दुख इस बात का है पिछले साल पापा नहीं रहे. उनकी छत बनाने के दौरान उनकी मौत हो गई. वो , मेरी तस्वीर अखबारों में देखकर बहुत खुश हुुआ करते थे. वो कम पढ़े- लिखे थे. इसलिए चाहते थे कि उनके बच्चे अंग्रेजी में बातचीत का जवाब अंग्रेजी में दें. मैं अब साथियों और भाई-बहनों से इंग्लिश में ही बोलने की कोशिश करती हूं चाहें भले ही गलत जवाब दूं.

(ये कहानी भोपाल में दुर्गा नगर झुग्गी क्षेत्र में रहने वाली मुस्‍कान अहिरवार की है.मुस्‍कान खुद पांचवी कक्षा में पढ़ती हैं लेकिन झुग्‍गी-झोपड़ी में रहने वाले बच्‍चों के लिए एक लाइब्रेरी का संचालन करती हैं. मुस्‍कान की लाइब्रेरी में इस वक्‍त 2000 से भी ज्‍यादा की किताबें हैं. इतनी कम  उम्र में दूसरे बच्‍चों को आगे बढ़ा रही हैं मुस्‍कान  खुद भविष्‍य में IAS ऑफिसर बनना चाहती हैं.)
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