#HumanStory: 40 सालों से हड्डी जोड़ने वाले इस पहलवान से मरीज़ मांगते हैं 'वेज' दवाएं

प्रतीकात्मक तस्वीर

शहर का पुराना हिस्सा पुराने नुस्खों से मिलकर बनता है. पुरानी दिल्ली भी जिन चुनिंदा चीजों से पूरी होती है, उनमें से एक हैं हड्डी जोड़ने वाले पहलवान. डॉक्टर के अंग्रेजी तरीके एक तरफ और इन शफाखानों के नुस्खे एक तरफ. हाजी अब्दुल मन्नान पहलवान भी ऐसा ही एक शफाखाना चलाते हैं.

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(हड्डी जोड़ने वाले पहलवानों की भीड़ में हाजी अब्दुल मन्नान अलग रुतबा रखते हैं, वे पिछले 40 सालों से हड्डी जोड़ रहे हैं.) 

पुरानी दिल्ली में हाथ-रिक्शों, ठेलों, गाड़ियों के बीच से जगह बनाते हुए लाल कुआं के बाजार पहुंचें. यहां तक आने के बाद कोई भी हाजी अब्दुल मन्नान का पता बता देगा. दिल्ली के पुरानेपन में इनके पुरानेपन का भी एक हिस्सा है. पुश्तैनी काम कर रहे अब्दुल कहते हैं, 'मेरे वालिद के वालिद ने भी यही किया, उनके वालिद भी यही करते थे. गोद में था, तब से मैंने भी यही देखा-सीखा. शफाखाना के साथ ही घर जुड़ा हुआ था. वालिद साहब की गोद में बैठ जाता और तरह-तरह के मरीजों को देखता. सन् 1978 से यहीं बैठने लगा और वालिद के बाद उनकी गद्दी संभाल ली.'

नाम के साथ पहलवान लगाने का थोड़ा ताल्लुक पहलवानी से भी
पुराने तरीकों से हड्डी जोड़ने का दावा करने वाले सारे लोग नाम के साथ पहलवान जोड़ते हैं. 'ये यूं ही नहीं', अब्दुल कहते हैं. पहले चोटें और भला कैसे लगती थीं! कुश्ती करते हुए पहलवान घायल हो जाते. टूटे हाथ-पैरों के साथ हमारे पास आते. कभी-कभार कोई पेड़ से गिरकर घायल हो जाता. जब मोटर-कारें आईं, तब से एक्सिडेंट के मामले भी आने लगे. डॉक्टर के पास फायदा न हो तो लोग हमारे पास आते हैं.

हाजी अब्दुल मन्नान पहलवान


अब्दुल अपने पेशे और अपनी सलाहियत को लेकर काफी सहज हैं. आवाज में नाज का पुट लेकर बांटते हैं, ये पुश्तैनी काम है. इसके लिए डिग्री नहीं, आंखें और अनुभव चाहिए होता है. एक्सरे, एमआरआई सब देखता हूं. फिर छूकर हड्डी की पोजिशन देखता हूं. मैं छूकर ही बता देता हूं कि केस कितना बिगड़ा है. ठीक होने में कितना वक्त लगेगा. अल्लाह के फजल-ओ-करम से मेरे पास आने वाले लगभग 99 प्रतिशत लोग ठीक हो जाते हैं.
हजारों में कोई एक ही होगा जो आकर ठीक न होने की शिकायत करे. तब हम पूरे पैसे वापस कर देते हैं. आराम न पड़े तो ऐसे काम का क्या मतलब.

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वो सीक्रेट ऑइल जो हड्डी जोड़ता है...
तकरीबन सारे पहलवानों के पास एक सीक्रेट तेल होता है, जिसकी मालिश से मरीज ठीक होता है. दरअसल वो सीक्रेट ऑइल सरसों का तेल होता है. कम से कम अब्दुल के क्लिनिक में तो यही नुस्खा अपनाया जाता है. वे बताते हैं, पहले लोग चर्बी का तेल इस्तेमाल करते थे लेकिन हम सरसों तेल लगाते हैं. लोग आते हैं. तकलीफ में होते हैं, फिर भी इसकी चिंता होती है कि कहीं चर्बी वाली कोई चीज न लगा दी जाए. हम उन्हें तसल्ली देते हैं कि यहां वेजिटेरिटन तेल ही मिलेगा. और वेजिटेरियन नुस्खा. बाजार से जड़ी-बूटियां लाते हैं. खारी बावली में सब मिल जाता है.

खास वेजिटेरियन नुस्खे के इस्तेमाल पर अब्दुल का तर्क है- लोग वेज दवा मांगते हैं इसलिए हम वही रखते हैं. लोग हमारे कहे पर यकीन कर पाते हैं तो हमारे लिए ईमान से बड़ी कोई चीज नहीं. किसी का धर्म लेकर उसे आराम नहीं दे सकते.

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देशी-विदेशी. बच्चे-बूढ़े. औरत-मर्द. अब्दुल के पास सब तरह के लोग आ रहे हैं. 40 सालों के तजुर्बे ने इनके हाथों और ईमान को इतना मजबूत बना दिया है कि परदेदारी करने वाली औरतें भी बेझिझक आती हैं. अब्दुल याद करते हैं, इतने सालों में जाने कितनी औरतें आईं. जानें कितने दुधमुंहे बच्चे. अब्दुल का दावा है कि वे जन्मजात विकलांगता को भी काफी हद तक ठीक कर पाते हैं.
जिन बच्चों के जन्म के साथ टेढ़े पैर होते हैं, उनके मां-बाप भी हमारे पास आते हैं और चेहरों पर खुशी लेकर लौटते हैं.

अंग्रेजी दवाओं से भी वास्ता पड़ता है
डॉक्टर तो डॉक्टर है. वो तो काटकर भी ठीक कर सकता है. हम वो काम नहीं कर सकते लेकिन हड्डी की पुरानी चोट, सर्वाइकल जैसे कई तकलीफें हम ठीक कर पाते हैं. खाने के लिए कोई दवा नहीं देते लेकिन लगाने के लिए हम भी अंग्रेजी दवाओं का इस्तेमाल करते हैं.

गोद में था, जब वालिद को यही काम करते देखा. वालिद से उनके वालिद के किस्से सुने. वालिद के इंतकाल के बाद भी मरीजों के फोन आते हैं. वे मुझे लंबी उम्र की दुआएं देते हैं.

अब ये विरासत किसे सौंपेंगे- सवाल पर छोटी-सी ठिठक के बाद कहते हैं, बच्चे अभी तलक तो इस काम में नहीं हैं लेकिन इंशाअल्लाह कोई न कोई तो मिल ही जाएगा. 

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