34 बरस से करते हैं कैलीग्राफी, ये हैं खत्म होती कला के आखिरी नुमाइंदे

किताबत यानी कैलीग्राफी एक खत्म होता हुनर है. मोहम्मद ग़ालिब इसकी आखिरी पीढ़ी के नुमाइंदे माने जा सकते हैं. पुरानी दिल्ली के उर्दू बाजार में किताबों की दुकान में पालथी लगाकर काम करते ग़ालिब की बातों में अकेले रह जाने का दर्द झलकता है. वे कहते हैं, 'पहले कई साथी मिलकर काम करते थे. अब मैं बाकी रहा. नई पीढ़ी इतनी जल्दबाज है कि ये हुनर सीखते सांसें थमती हैं.'

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: May 31, 2018, 12:28 PM IST
34 बरस से करते हैं कैलीग्राफी, ये हैं खत्म होती कला के आखिरी नुमाइंदे
कैलीग्राफी
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: May 31, 2018, 12:28 PM IST
जामा मस्जिद के दक्षिणी दरवाजे की ओर एक तंग ढलान दरियागंज की तरफ निकलती है. ये उर्दू बाजार है. पुरानी दिल्ली या फिर दिल्ली को जो चंद चीजें पूरा करती हैं, उन्हीं में से एक है ये बाजार. मजहबी किताबों के अलावा तमाम पुरानी चीजों को सहेजने के लिए भी ये जगह जानी जाती है.

वर्ष 1857 की लड़ाई में ये बाजार लगभग खत्म हो गया था. तब मिर्ज़ा ग़ालिब ने सोग में डूबकर कहा था- ‘जब उर्दू बाजार नहीं तो उर्दू कहां रही! इसके बगैर दिल्ली शहर नहीं, छावनी में तब्दील हो गई है.’ बाद के वक्त में इस बाजार की दोबारा रिहाइश हुई. पुरानी चीजों को संजोकर उनमें दोबारा जान फूंकी गई. मोहम्मद ग़ालिब भी उसी पुरानेपन का हिस्सा हैं.

मजहबी किताबों की दुकान में लकड़ी की एक डेस्क पर सिर झुकाकर काम करते ग़ालिब घंटों बिना सिर उठाए काम करते जाते हैं. दवात पास ही रखी है, बीच-बीच में सिर उठाए बिना ही जिसमें वे लकड़ी की कलम डुबोते जाते हैं. वे कहते हैं, ‘80 के बखत में जब काम शुरू किया, तब से अब तक कितनी बातें बदलीं. यहां तक कि कलम भी बदल चुकी है. पहले किताबत की मांग हुआ करती. मोटी-मोटी किताबें लिखवाई जातीं. अब कोई जन्मदिन की मुबारकबाद लिखवाने आता है, कोई अशआर तो कोई चुनावी पोस्टर बनवाने’.



सहारनपुर, उत्तरप्रदेश के ग़ालिब याद करते हैं तब का दौर, जब झोंक में उन्होंने किताबत सीखनी शुरू की. अब के स्कूलों में जैसे कंप्यूटर सिखाया जाता है, हमारे वक्त में कैलीग्राफी सिखाई जाती. रोज घंटाभर देना ही होता.

पढ़ाई का हासिल भले और कुछ न हो, तह़रीर ख़ूबसूरत होनी चाहिए. जहां साथ के बच्चे पास होने के लिए पढ़ते, मैं सीखने के लिए. ऐसे ही एक रोज उस्ताद ने सबके सामने कहा कि तुम थोड़ी मेहनत करो तो बहुत बढ़िया कातिब बन सकते हो. फिर लगातार 3 साल मैंने इसी काम को दिए. इस्लामिक यूनिवर्सिटी में सीखता और उस्ताद काम देते तो वो भी करता. यहीं से शौक ने पेशे की शक्ल अख्तियार करनी शुरू की.

अरबी, फारसी, उर्दू और हिंदी में कागजों पर शब्दों को उतारते मोहम्मद ग़ालिब के पास अलग चाकू है जो खास कलम तैयार करने के काम आता है. स्याही भी अलग मंगाई जाती है. वक्त के साथ-साथ कलम भी कुछ ‘मॉडर्न’ हो गई और किताबत का बाजार भी.
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सहारनपुर से मैं दिल्ली आया ताकि दो पैसे जोड़ सकूं. उर्दू बाजार से ही काम शुरू किया. तब हमारे पास किताबें लिखने के ऑर्डर आया करते. अब कुछ तो बाजार बदल गया है तो कुछ बढ़ती उम्र का तकाजा है कि मैं बड़ा काम नहीं ले पाता.

किताबत का पहला सबक यही है कि इसमें दम साधकर काम करना होता है ताकि हाथ न कांपें. अब उम्र के साथ नजरें कमजोर हो गई हैं. हाथ भी कांपते हैं. वही काम लेता हूं जिसमें कम और मोटा-मोटा लिखने से काम हो जाए.

‘किताबत का इतिहास बहुत पुराना है. बड़े-बड़े शहंशाह इस हुनर को वैसे ही जानते थे जैसे तलवारबाजी या इश्क. अब इसी हुनर को हमारे अपने लोग भी अपनाने से इनकार करते हैं’, ये बताते हुए 55 साल के ग़ालिब की आवाज थरथरा रही है.

शादी के बाद पत्नी को सिखाने की कोशिश की. लगता था कि मुझसे मोहब्बत करने वाला मेरे पेशे से भी मोहब्बत कर सकेगा लेकिन कुछ रोज बाद ही वो सीखने में आनाकानी करने लगी.

फिर बच्चे आए. उन्होंने साफ मना कर दिया. कहते हैं, इस काम में बड़ी मेहनत चाहिए! कई बार लड़के-लड़कियां घूमते हुए आते हैं, मुझे देखकर सीखने की ख्वाहिश जताते हैं और फिर कभी नहीं दिखते. हां, दूसरे देशों के लोग जरूर इसमें दिलचस्पी लेते हैं.



शार्गिदों के किस्से सुनाते हुए ग़ालिब देर तक ठहरे रहते हैं. एक बार जापान से एक बच्ची आई. उसने 8 दिनों तक रोजाना मेरे पास कई घंटे बिताए. जाते वक्त मैंने उसे कलम और स्याही भी तोहफे में दी. ऐसे ही कनाडा, इंग्लैंड, अमरीका से लोग आते रहते हैं.

कई अपने दोस्तों के हवाले से आते हैं तो कई पुरानी दिल्ली के पुरानेपन में मुझे पा लेते हैं.

जितने दिन यहां रहते हैं, सीखते हैं. जब भी भारत आते हैं, मुझसे मिलने आते हैं. ये सब देखकर अपने घरवालों के न सीखने का मलाल धुल जाता है. एक बार एक प्रोफेसर आए. मजे में कहने लगे- अरे ग़ालिब मियां यहां हैं, हम उन्हें जाने कहां-कहां ढूंढते फिरे. फिर देर तक हंसी-मजाक चलता रहा. उन्होंने भी काम सीखा.

नाम के साथ ‘कातिब’ लगाते ग़ालिब मानते हैं कि उनके साथ ही ये हुनर उनके परिवार से चला जाएगा.

सहारनपुर से दिल्ली आकर शुरुआत की तो कई दोस्त-अहबाब साथ हुआ करते थे. बड़ा काम आता तो मिलकर बैठते. धीरे-धीरे सब चले गए. किसी के पास काम नहीं आता था तो कोई काम से दूर जाने लगा. मेरी भी अब नजरें कमजोर हो गई हैं, उंगलियां कांपती हैं, किताबत की मांग भी घट चली. मैं इसी काम के साथ मंज़िले-मक़सूद तक पहुंचा. बहुत तकलीफ़ होती है जब सोचता हूं कि मेरे साथ ही ये भी दफ़न हो जाएगा.
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