'JNU में कहने-भर को लोकतांत्रिक माहौल था, दलित यहां भी अलग-थलग रहते'

दलित बच्चे का बचपन अलग होता है. स्कूल में सबसे पीछे बैठा. खाने की थाली अलग रही. बड़ा हुआ, जेएनयू आया. हालात यहां भी वही. हमारा चेहरा, बोली, कपड़े चीखते हैं कि हम दलित हैं. लोगों की आंखों की हिकारत मेरे गानों में उतरने लगी. दलित रैपर सुमीत सामोस की आपबीती... 

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: September 3, 2018, 3:52 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: September 3, 2018, 3:52 PM IST
हमारी चमड़ी वही है. शक्लों और आदतों में भी खास फर्क नहीं. बोलते हैं तो आवाज सुनकर कोई फर्क नहीं कर सकता है कि हम दलित हैं या सवर्ण. बस, एक खास समुदाय में जन्म लेना हमें एकदम अलग बना देता है. मैं एक दलित परिवार में जन्मा, वो भी गरीब. उड़ीसा के छोटे गांव में पला-बढ़ा. बड़ा हो रहा था और समझने लगा था कि हम अलग हैं. जिस ट्यूबवेल से सारे लोग पानी लेते, हम या कुछ और परिवार उसके आसपास भी फटक नहीं सकते थे. स्कूल पहुंचा तो पीछे बैठाया गया. दोपहर के खाने के वक्त दो लाइनें लगतीं- एक दलितों की और दूसरी ऊंची जाति के बच्चों की. बड़ों के लिए ये भेद और भी ज्यादा था.

बारहवीं भुवनेश्वर से की. यहां आकर देखा कि शहरों में कास्ट कैसे ऑपरेट होती है. यहां सरनेम बिना पूछे ही लोग चेहरे और बोली से समझ जाते कि आप फलां जगह हैं और फलां जाति के होंगे. बस, उनका व्यवहार बदल जाता. कमरा मिलने में दिक्कत आई. लोग दूर-दूर रहते. क्लास में मजाक बनाते. मैं अपने जैसे ही सताए हुए लोगों के साथ रहने लगा. स्कूल के बाद क्या करना है, कुछ पता नहीं था. घर में हालात ऐसे नहीं थे कि वे मुझे पढ़ने के लिए कोई सलाह देते या मदद कर पाते. मैं पढ़ना चाहता था. क्या और कैसे- ये खोजना बाकी था. वही खोज मुझे दिल्ली ले आई.

आया तो घर की खोज शुरू हुई. मुनीरका में बहुत कम कीमत पर छोटा सा कमरा लिया. हाथ के पैसे खत्म हो जाएं, इससे पहले काम करना जरूरी था. मैं रेस्त्रां में वेटर का काम करने लगा, खाना सर्व करना, प्लेटें पोंछता. पढ़ाई के बारे में भी साथ-साथ पता करता. इसी दौरान जेएनयू के बारे में पता चला. अच्छी यूनिवर्सिटी है और सबसे बड़ी बात, फीस कम लगती है. मुझे बीए में एडमिशन मिल गया.



दिल्ली मेरे लिए नया गांव था. तमाम बचपन हैरान होते बीता कि मेरी थाली अलग क्यों! बड़ा हुआ तो लगा ये छोटी जगह का दोष है. मैं गलत था. दिल्ली में भी उड़ीसा का वही गांव साथ चला आया था. जेएनयू कैंपस में कहने-भर को लोकतांत्रिक माहौल था. कॉ़लेज के पहले दिन से बंटवारा हो गया. ऊंची जाति के बच्चे अलग और हम अलग. हमारे बोलने का तरीका उनसे कुछ अलग था, हमारे कपड़े थोड़े अलग नजर आते. अक्सर लोग हमें हिकारत से देखते कि जाति के कारण हमें अच्छी यूनिवर्सिटी में पढ़ने का मौका मिला. मैं मन लगाकर पढ़ने लगा ताकि उनके मन से कम से कम ये वहम निकाल सकूं.

एक ओर मैं खुद को साबित करने में जुटा हुआ था, दूसरी तरफ जाति मेरी हर कोशिश के साथ पुछल्ले की तरह चली आती. जेएनयू में कितने ही मौके बाहर जाने के मिलते हैं. मुझ तक वे मौके पहुंच ही नहीं पाते थे. कभी सूचना देर से पहुंचती तो कभी रिकमंडेशन लेटर वक्त पर नहीं मिल पाता था. मेरे जैसे और बहुत से बच्चे थे जो कमोबेश उसी हाल में थे. अलगाव पर पहले तो तकलीफ होती थी, अब गुस्सा आने लगा. मैं सावित्री बाई फुले और अंबेडकर को पढ़ने लगा. एक रोज ऐसे ही गुस्से-गुस्से में मैंने कुछ रिकॉर्ड किया और फेसबुक पर डाल दिया.

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खूब ट्रोल हुआ कि मैं कौन से ग्रह से आया हूं. न ठीक से हिंदी बोल पाता हूं और न अंग्रेजी. कुछ लोगों ने बताया कि जो गानानुमा चीज मैंने पोस्ट की है, वो 'दलित रैप' है. इस शब्द ने मुझे अपनी तकलीफों को सामने लाने का जरिया दे दिया. मैं दलित साहित्य पढ़ने लगा. हिंदी और अंग्रेजी बोलना सीखने लगा. ब्लैक रैप देखता हूं ताकि समझ सकूं कि क्या हमारा दर्द साझा है! मैंने सोचा कि जिसे सब नीच कहते हैं, उसे ही सामने लाऊंगा. मैं हर वक्त गाने की प्रैक्टिस करने लगा. सोते-जागते, खाते, बाथरूम में. जल्दी-जल्दी, बिना सांस लिए गाना होता है, इसके लिेए खूब मेहनत की. जेएनयू में एक वक्त पर हम शर्म से बोल भी नहीं पाते थे कि हम दलित हैं. फिर जय भीम बोलना या नीला झंडा तो दूर की बात है. अब माहौल बदला है. स्टूडेंट एक्टिविज्म जोरों पर है. मेरे गानों की भी इसमें भूमिका रही.

तकलीफों, संघर्ष और अपने साथ हुए भेदभाव को बताना कीमत मांगता है. सोशल मीडिया पर धमकी मिलती है कि उड़ीसा आओ तो देख लेंगे. हिंदी-अंग्रेजी का मजाक बनता है. खूब ट्रोल होता हूं. मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता. जिस परिवेश में पला-बढ़ा, उसमें जो भाषा मिली, वही बोलूंगा. और उसी बोली में अपनी बातें कहूंगा.

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