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HumanStory: गंदगी निकालते हुए चोट लग जाए तो ज़ख्म पर पेशाब कर लेते हैं गटर साफ करने वाले

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

लोग सुबह उठते हैं, पूजा-पाठ करते हैं. हम नहा-धोकर गटर में उतर जाते हैं, हाथों से मैला निकालते हैं. बदबू शरीर का हिस्सा हो गई है.

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(38 साल के राजेंदर पूर्वी दिल्ली नगर निगम में पिछले 20 सालों से नालों और गटर की सफाई कर रहे हैं. यही काम करते हुए उनके पिता की मौत हो गई थी. )

सफाईकर्मियों की लगातार मौतों के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वादा किया कि साल 2019 से हाथ से सफाई पूरी तरह से बंद हो जाएगी. हालांकि आज जो हालात हैं, उन्हें देखते हुए ये बदलाव मुश्किल ही लगता है. साल के शुरुआती सप्ताह में ही देश के अलग-अलग हिस्सों से 7 सफाईकर्मचारियों की मौतों की खबर आई. ये मौतें किसी कोने-कूचे के अभावग्रस्त गांव नहीं, बल्कि मुंबई, बंगलुरु और दिल्ली में हुई. सेंसस की मानें तो हर साल 100 से ज्यादा सफाई कर्मचारियों की गटर-नालों की जहरीली गैस में दम घुटने से मौत हो जाती है.

राजेंदर के लिए इन बातों पर चर्चा मानो चना-चबैना है. सपाट आवाज में कहते हैं, हां, ये तो होता है. रोज कई फीट गहरे गटर में धुंधला-सा टॉर्च लेकर उतरते हैं. बदबू का भभका सीधे नाक और आंखों से होता हुआ भीतर उतर जाता है. सांस नहीं ले पाते हैं. ऐसे में मौत से अलग क्या होगा!



20 सालों से इसी पेशे में रहते हुए राजेंदर को कई नियम-कायदे भी पता हैं लेकिन उनका कोई इस्तेमाल नहीं. उन्हें पता है कि ये काम करते हुए क्या-क्या सुरक्षा उपकरण मिलने चाहिए. शुरू में ठेकेदार से कहता. ऑक्सीजन मास्क, ग्लव्स, हेलमेट, गमबूट, रौशनी का इंतजाम- इनमें से कुछ भी नहीं मिलता. गहरे गटर में इतनी गैस होती है कि सांस नहीं आती. उसमें हमें फावड़े से गंदगी निकाल-निकालकर ऊपर देनी होती है.

पहला दिन भला कोई भूलने की चीज है!
राजेंदर को काम का पहला दिन बखूबी याद है. पिता भी जलबोर्ड में यही काम करते थे. इसी काम ने उनकी उम्र आधी कर दी. तब उनका काम मैंने ले लिया. पहले दिन गटर की सफाई का काम मिला तो दिल धक से रह गया. एक तरह से पुश्तैनी काम था. मैंने सुना तो था लेकिन किया नहीं था. साथी ने कहा- गटर में उतर. बांस से गहराई नापी गई और बिना नीचे देखे मैं उतर गया. सांस रोकी हुई थी लेकिन आखिर कितनी देर!

बदबू का सैलाब आया और नाक, आंखों, मुंह, शरीर के हर हिस्से में समा गया. जैसे-तैसे वो दिन बीता. शाम को नहा-धोकर लौटा. दिन में खाना नहीं खाया. रात में खा नहीं सका. दोबारा नहाया. फिर तिबारा. बदबू बस चुकी थी.

आंकड़ों राजेंदर की बातों की तस्दीक करते हैं. साल 2011 के सेंसस के अनुसार देश के ग्रामीण अंचलों में लगभग 2 लाख घर जीवन-यापन के लिए इसी काम पर निर्भर हैं. शहरों में हालात और खराब हैं. यहां सफाई कर्मचारी टॉयलेट नहीं, बल्कि गटर और नालों की सफाई करने को मजबूर हैं. Prohibition of Employment as Manual Scavengers and Their Rehabilitation Act of 2013 के खास मायने नहीं हैं. कम से कम राजेंदर की जिंदगी में तो नहीं.



गटर की गहराई 10 मीटर से कम शायद ही होती हो. बांस डुबोते हैं, नापते हैं, फिर रस्सी के सहारे नीचे उतरते हैं.

यही कमजोर रस्सी इनका सेफ्टी बेल्ट होती है. बदबू और गंदगी से सांस रुकना अकेली समस्या नहीं. गंदगी इतनी होती है कि कीलें, कांच, कुछ पता नहीं चलता. अक्सर फावड़े में भरते हुए कुछ न कुछ हाथ में चुभ जाता है. आज भी याद है- पहले-पहल चोट लगी और खून निकलने लगा तो साथी ने पेशाब करने को कहा. इससे खून रुक जाता है. मैंने वही किया और वही करता आ रहा हूं.

खून निकलने पर जख्म पर पेशाब करता हूं और रात में घर लौटकर उसपर आग जलती बत्ती मार देता हूं. इससे इंफेक्शन का डर नहीं रहता. हमारा कोई मेडिकल इंश्योरेंस नहीं वरना जख्म पर आग कोई क्यों लगाए.

लोग छुआ मानते हैं, दुत्कार देते हैं
अपने ही घरों में टॉयलेट की सफाई में नाक-भौं सिकोड़ते लोगों का हमारे लिया नजरिया और भी खराब होता है. साइट पर काम करते हुए कई घंटे बीत जाते हैं. प्यास से गला चटकने लगता है. कई बार आसपास कोई दुकान नहीं होती. ऐसे में आसपास के घरों से पानी मांगा करते. लोग पानी देने तक से मना कर देते थे. क्या पता बर्तन छू जाए. या उसकी गंदगी हमपर छिटक जाए. फिर हम प्यासे ही काम करते. अब साथ में अपनी पानी की बोतल ले जाते हैं या फिर दुकान से खरीदनी होती है. शाम को नहाकर घर लौटते हैं. कई बार देखा कि बस में लोग दूर खड़े हो जाते हैं. कोई मुंह-नाक पर रुमाल रख लेता है. कोई अजीब ढंग से देखता है.
हमारे कपड़े तो साफ होते हैं लेकिन बदबू समाई रहती है, चाहे कितना ही तेज़ साबुन लगा लें. 



पिता को भी इसी काम ने खा लिया.
राजेंदर याद करते हैं, वो बड़े मजबूत हुआ करते. लोग फुर्ती की मिसालें देते लेकिन वक्त से पहले चले गए. ब्लडप्रेशर, चमड़ी की बीमारी, सांस की बीमारी, क्या नहीं था उन्हें. अब उनका बेटा भी उसी रास्ते पर है. गंदगी और जहरीली गैस ने 20 साल में बाल सफेद कर दिए. शरीर में पहले सी फुर्ती और ताकत नहीं. हांफने लगता हूं. आंखें धुंधला देखती हैं. चमड़ी पर दाने हैं.

ढेरों जख्म हैं. एक भरता है, तब तक दूसरा लग जाता है. कितने ही जानने वाले इसी काम को करते हुए मर गए.
आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1993 से अब तक गटर की जहरीली गैस में दम घुटने से 1,471 मौतें हो चुकी हैं. और कितनी ही मौतों कभी कागजों में शामिल ही नहीं हो सकीं.

गाजियाबाद की घनी बस्ती में शाम को घर लौटना ही राजेंदर की जिंदगी की अकेली राहत है. पत्नी और तीन बच्चे इंतजार करते हैं. बच्चे किताबें खोले होते हैं. पत्नी मेरे इस काम से तकलीफ पाती है लेकिन लौटता हूं तो अपनी चहक से मेरे दिन की तकलीफ धो देना चाहती है. बच्चों को देखता हूं और मनाता हूं कि वे अपने दादा और पिता का पेशा न अपनाएं.

महीने में चार इतवार मिलते हैं. तब मैं नहा-धोकर झकाझक कपड़ों में परिवार के साथ वक्त बिताता हूं. यकीन जानें, मेरा महीना इन्हीं चार दिनों से मिलकर बनता है. 

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