#HumanStory: दास्तां, गुजरात की उस बुज़ुर्ग औरत की, जिसे पुलिस ने अपराधी मानकर पीटा

रात के डेढ़ बजे थे, जब दरवाजा तोड़कर पुलिस भीतर आई और मुझे सोते से जगाकर पीटने लगी. 69 साल की हूं. उन्होंने बच्चे-बूढ़े-जवान किसी में कोई फर्क नहीं किया.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 7, 2018, 1:30 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 7, 2018, 1:30 PM IST
(27 जुलाई का दिन गुजरात के छारानगर-वासियों के कैलेंडर में लाल निशान से चिन्हित हो गया. आपराधिक गतिविधियों के संदेह में लोगों को पीटा गया और 29 नौजवानों को जेल में डाल दिया गया. छारा जनजाति की कुसुम बेन बातुंगे भी पीड़ितों में से एक हैं. उनकी आपबीती.)

रात के डेढ़ बजे होंगे. मैं सामने के कमरे में सो रही थी. संयुक्त परिवार है, बाकी लोग भी अगल-बगल के कमरों में थे. तभी धड़ाक की आवाज के साथ दरवाजा खुला और कुछ पुलिसवाले धड़धड़ाते हुए अंदर आ गए. मैं अरे-अरे करती ही रही और उन्होंने मुझे पीटना शुरू कर दिया. वे मेरे मुंह पर, पीठ पर थप्पड़ जड़ रहे थे. बचाव के लिए मेरे घरवाले भागते हुए आए. पुलिस को जैसे इसी का इंतजार था. वो सबपर लाठियां बरसाने लगी. बार-बार कह रहे थे कि हम चोर लोग हैं. गलत काम से पैसे बनाते हैं.



उम्र के चंद आखिरी बरस देख रही कुसुम ने जिंदगी में कितनी ही चीजें देखीं. जवान बेटी के विधवा होने से लेकर अपनी उम्र के साथियों की मौत तक. लेकिन 27 जुलाई की रात इन यादों पर भारी पड़ रही है. वे कहती हैं, पुलिसवालों ने मुझे बहुत मारा. बूढ़ी हूं. शुगर की मरीज हूं. चेहरे पर इतने थप्पड़ मारे कि मुंह सूज गया. मेरे दाढ़ नहीं है. खाना-पीना पहले भी नहीं रुचता था, अब और दुश्वार हो गया है.

हम चोर नहीं है साहब...
गुजरात के अहमदाबाद का छारानगर बाकी शहर से कटा हुआ है. लोग किराए पर मकान खोजने के लिए यहां का रुख नहीं करते. स्कूल में पढ़ने या बेटी ब्याहने के लिए भी यहां बाकी शहर से लोग नहीं आते. वजह- यहां छारा जनजाति बसती है. आखिर क्या वजह है कि एक जमाने में देश की आर्थिक राजधानी रह चुके चमचमाते गुजरात शहर की एक जनजाति इतनी अलग-थलग है? कुसुम बताती हैं, पहले वाले लोग कम पढ़े-लिखे थे. रोजगार कहीं मिलता नहीं था. पेट पालने के लिए शराब बनाते. कुछ लोग चोरी भी करते थे. फिर यही काम पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने लगा. गोरों के वक्त में हमें अलग कर दिया गया. अपनी सीधी-सादी भाषा में जब कुसुम अलग कर दिया गया कहती हैं तो उसके माने कहीं बड़े हैं. छारानगर में रहने वाली इस जनजाति को मुख्यधारा से काट दिया गया. वे शहर के दूसरे लोगों के साथ बिजनेस या शादी-रोटी का रिश्ता नहीं कर सकते थे. साल 1947 से पहले वे डीनोटिफाइड ट्राइब घोषित हो चुके थे, यानी आपराधिक जनजाति अधिनियम 1871 के तहत बसाए गए लोग. ये अधिनियम कब का हटाया जा चुका. छारा समुदाय तो पढ़-लिखकर मुख्यधारा से मिलने की कोशिश कर रहा है लेकिन लोग उन्हें स्वीकारने को तैयार नहीं.

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अहमदाबाद में कहीं भी अपराध हों, सबसे पहला शक छारानगर पर जाता है. 27 जुलाई भी बाकी दिनों का दोहराव ही है. कुसुम याद करती हैं, शराब तस्करी के संदेह में छारानगर के दो लड़कों को पकड़ा. उन्होंने विरोध किया तो पुलिस ने आधी रात को हमारे घरों पर हमला कर दिया. उम्र का लिहाज किए बिना जो सामने आया, सबको मारा-धमकाया. मैं अगले साल 70 की हो जाऊंगी. इतना पीटा कि दवा से भी कोई आराम नहीं पड़ रहा है.

लगभग 17 हज़ार की आबादी वाले छारानगर से 29 युवकों को अवैध हिरासत में ले लिया गया. चारों ओर पुलिस है जो हर आने-जाने वाले को पूछताछ से छलनी कर रही है. कुसुम के शब्दों में 'छारानगर छावनी बना हुआ है'.

(खबर लिखी जाने तक हिरासत में लिए गए सभी 29 लोग जमानत पर रिहा हो गए. इनमें से 26 लोगों का क्लीन क्रिमिनल रिकॉर्ड है यानी उनकी कभी भी आपराधिक गतिविधियों में संलिप्तता नहीं रही.)

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