#HumanStory: ‘फांसी नहीं दे सकते तो भीड़ को सौंप दो मेरी बेटी के बलात्कारियों को’

“जब मिली तो जैसी हालत थी, किसी को नहीं लगा 'वो' जी जाएगी. गोद में समा जाने वाला छोटा-सा शरीर लहुलुहान था. आंतें बाहर निकली हुई. सिर पर जख्म. गर्दन पर चाकू. तमाम शरीर पर वहशियत के निशान.”

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 2, 2018, 1:12 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 2, 2018, 1:12 PM IST
(बीते महीने मध्यप्रदेश के मंदसौर में 8 बरस की बच्ची का बलात्कार हुआ. प्रदेश सड़कों पर उतर आया. अखबार रंग गए. मोमबत्तीदार रो पड़े. धाराओं पर चर्चा हुई. महीनेभर बाद- बच्ची अस्पताल में है. आंतें पेट से बाहर निकालकर रखी गई हैं. अभी सर्जरियां बाकी हैं. बच्ची की मां से बातचीत के कुछ अंश...)

साल 2018. जून 26. जगह मंदसौर. वाकया गैंगरेप. स्पेशल इनवेस्टिगेशन टीम का गठन. 92 गवाहों के बयान. आईपीसी की धारा 376 (डी) और 363. चौबीस घंटे के भीतर आरोपी हिरासत में. लेकिन, गणित के ये अंक और सोशल का ज्वालामुखी उस मां के लिए कतई मरहम नहीं, जिसकी बेटी अब शायद बस जी पाएगी. फिलहाल इंदौर के अस्पताल में एक बेटी है और एक मां. किसी भी पुरुष का आना-जाना ‘सख्त’ मना है, सिवाय डॉक्टरों और पुलिसवालों के.

26 जून की शाम
गुड़िया का स्कूल शाम पांच बजे छूटता है. छोटी सी जगह. ऐसी कुछ खास दूरी नहीं है और न कोई डर था. लोग एक-दूसरे को लगभग जानते हैं. उस रोज कामकाज में व्यस्तता के चलते ‘उसके’ पापा थोड़ी देर से स्कूल पहुंचे. वो जा चुकी. वहीं से घर फोन किया.



वो नहीं पहुंची थी. कहां जा सकती है! कभी अकेली गई-आई भी नहीं थी. स्कूल में पूछा. उन्होंने उसे किसी और के साथ जाने दिया था. घंटाभर से ज्यादा हो चुका था. भड़कने का वक्त नहीं था. 12 लोगों का परिवार है और वो सबसे छोटी है. खोजबीन मच गई. सब जगह ढूंढा. नदी-नाले हर कहीं खोजा. रात हो चुकी थी. हल्की बारिश हो रही थी. पूरा परिवार रातभर खोजता रहा. थाने में रिपोर्ट भी लिखवाई.

27 जून की सुबह
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रातभर बारिश हुई. पास ही एक जंगल भी है. वहां से बाहर गुजरती पक्की सड़क से जाते हुए एक बच्चे ने एक बच्ची को देखा. खून से सनी हुई. वो बच्ची ‘मेरी’ गुड़िया थी. उन्होंने उसका बलात्कार किया. चाकू मारा. भीतर के हिस्से में सरिया घुसेड़ दी और मरा समझकर चले गए. वो रातभर जंगल में पड़ी रही. बारिश की बूंदों से होश आया तो किसी तरह चलकर सड़क पर आई और उस बच्चे से मदद मांगी. बच्चा लोगों को इकट्ठा करने लगा. पुलिस पहुंची. हमें बुलाया. पुलिस की गाड़ी में ही उसे लेकर मंदसौर के अस्पताल पहुंचे. डॉक्टरों ने मरहम-पट्टी कर खून रोका और हाथ खड़े कर दिए. वे इतना 'सीरियस' मामला नहीं देख सकते थे. उसे इंदौर के बड़े अस्पताल भेज दिया गया.



गुड़िया को बहुत सारी चोट है, मैं क्या बताऊं!
महीनेभर पहले लगभग मरी हुई हालत में वो मिली थी. शरीर हर जगह से नुचा-कटा, खून में लथपथ. मैं उसे देखते ही होश खो बैठी. होश में आई तब उसने मुझे सब बताया. मैं बार-बार बेहोश हो रही थी. उधर मेरी गुड़िया रो रही थी. वो बार-बार पानी और मां मांगती. आठ रोज मैं इसी हाल में रही. अपनेवाले आते, समझाते, चले जाते. मैं मां हूं. ऑपरेशन करके मेरी बच्ची की आंतों को बाहर निकाल रखा है. उसका पूरा शरीर हर वक्त दर्द में रहता है. कभी खून चढ़ता है, कभी ग्लूकोज़. उसे आंखों से ठीक से दिखाई नहीं दे रहा. अभी और सर्जरी होनी बाकी है. क्या बताऊं, कितनी चोटें हैं! मैंने भी इसके साथ बहुत हिम्मत गुजारी है. बार-बार रोना आता है, ये सोचकर कि इतनी-सी बच्ची ने कैसा दिन गुजारा.

दोनों आरोपी 20 से 24 साल के बीच हैं. जिस समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, उन्होंने आरोपियों के लिए फांसी की सजा की मांग की. मौत के बाद जनाजा न उठाने और कब्र के लिए जमीन न देने का एलान हुआ. सोशल मीडिया उस समुदाय की न्यायप्रियता पर जय-जयकार कर उठा. इसे कहते हैं इंसाफ! इस इंसाफ से हालांकि उस बच्ची की तकलीफें जरा भी कम नहीं होती दिखती हैं.



गुड़िया की मां बताती हैं, ‘वो कहती है कि अंकल लोगों ने गंदा काम किया. खूब मारा. चाकू से, हाथ-पैर से. अंदर लोहा घुसेड़ दिया. बताते हुए रोती है, फिर चुप हो जाती है. बच्ची है. उसको पढ़ना अच्छा लगता है. अस्पताल से घर जाने और स्कूल जाने की बात करती है. इतने दर्द से गुजरने के बाद भी इतनी चंचल है कि हंसी-मजाक कर पाती है.’

रेड डॉल और ऑरेंज कलर पसंद करने वाली ये गुड़िया पूरे अस्पताल स्टाफ की गुड़िया बनी हुई है. नर्सें रोज आती और उसे पढ़ाती हैं. डॉक्टर खिलौने लेकर आते हैं. पुलिसवाले भी हर विजिट पर बच्ची के पसंदीदा खिलौने और चॉकलेट लेकर आते हैं. वो सबके साथ हंसी-मजाक करती है. कहती है, बड़ी होकर ‘अच्छी वाली पुलिस’ बनूंगी. सबसे ऊंची पुलिस बनना चाहती है, मेरी गुड़िया.

‘दुबली-पतली है लेकिन बोलने में बड़े-बड़ों से तेज है. बात करोगे तो कहोगे, मुझसे भी बड़ी है’, कहते हुए मां की सूनी आवाज में उम्मीद चली आती है, हालांकि ये चंद पलों के लिए ही ठहरती है. दुनियावाले कई तरह की बातें करते हैं. कैसे हो गया. क्या हो गया. अपनेवाले भी मिलकर चले जाते हैं. गुड़िया तब से एक रात भी पूरी नींद नहीं सोई. चिपककर सोती है. नींद में रोने लगती है. बार-बार डरके उठ जाती है. इसका हाल देखकर कलेजा निचुड़ गया है. इसके पापा के भी यही हाल हैं. वो तबसे अस्पताल में हैं लेकिन इस कमरे में रहना मना है.

अब उन दोनों को फांसी मिले, तभी चैन पड़ेगा.

"अगर कोर्ट फांसी नहीं दे सकती तो उन्हें जनता को सौंप दे. वही फैसला करेगी."

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