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एक डाउन सिंड्रोम औलाद की परवरिश करते हुए ये मां डॉक्टर बन गई

एक डाउन सिंड्रोम औलाद की परवरिश करते हुए ये मां डॉक्टर बन गई

एक डाउन सिंड्रोम बेटी की मां होना क्या होता है, ये डॉ मीता मुखर्जी से बेहतर कौन बता सकेगा! 23 साल की इस मां ने बेटी को संभालने के लिए डॉक्टरेट कर लिया.

    रात में सोते हुए पियाली मुझसे दुनिया-जहान की बातें करती हैं. ऐसे ही एक रात बांहों में बांहें डालकर उसने बताया कि एक लड़के ने उसे प्रपोज किया है. मैं चिंहुककर उठ बैठी. अलसाई हुई बेटी को बैठाया और सवालों की झड़ी लगा दी. प्रपोज करने वाला उसी की तरह स्पेशल बच्चा था. मैंने पूछा- तुम्हें उसकी बातों से क्या समझ आया? वो मुझसे प्यार करता है, मैं उसकी गर्लफ्रेंड हूं- पियाली ने कहा.

    किसी भी मां की प्रतिक्रिया लगभग मुझ-सी ही होगी, जब बेटी प्यार का जिक्र करे लेकिन मैं अतिरिक्त अलर्ट थी. मेरी बेटी स्पेशल बच्ची है. उसकी शादी की उम्र हो चुकी है लेकिन हम शादी की सोच तक नहीं सकते, भले ही उसे प्रपोज करने वाला भी उसकी तरह हो. दोनों ही अपनी जिम्मेदारियां नहीं निभा सकेंगे. फिर ऐसे रिश्ते का क्या मतलब!

    पियाली के बारे में मीता घंटों, बिना थके बात कर पाती हैं. वे स्पेशल बच्चों के लिए स्कूल भी चलाती हैं. रोती हुई मांओं को संभालती हैं. साल 1986 की मीता एकदम अलग थीं. उसी साल मीता को पहला बच्चा हुआ- पियाली. 23 साल की नई-ताजी मां को मानो सारा जहान मिल गया हो. वे याद करती हैं, मैं बेटी को गोद में लिए हुए देखती रहती. मेरी न आंखें थकती थीं और न दिल. एक रोज मेरी सास देर तक पियाली को देखती रही. फिर कहा कि ये बच्ची सामान्य नहीं लगती. इसकी आंखें दूसरे बच्चों से अलग हैं. ये उनका अनुभव बोल रहा था, लेकिन मैं भड़क उठी. वैसे तो मेरी सास मुझे मां जैसा दुलार देतीं लेकिन उस एक बात के लिए मैं उन्हें माफ नहीं कर सकी.



    मन में खुटका आ चुका था. 15 दिनों बाद मैं बेटी को लेकर डॉक्टर के पास गई. उसने गौर से देखा, जांचा लेकिन उसकी ओर से भी कोई पक्का आश्वासन नहीं मिल सका. मेरी बेटी एट रिस्क थी यानी मुझे कुछ वक्त या कुछ महीनों तक इंतजार करना था. मैं हर वक्त डरी रहती. तब तक किसी से कुछ नहीं कहा था. लगता कि जानने के बाद कोई उसे प्यार नहीं करेगा. पति भी डाउन सिंड्रोम बेटी को पता नहीं प्यार कर भी सकें या नहीं!

    वो और बच्चों से अलग थी
    कन्फर्म होने के बाद हमने घर पर सबको बताया. पहले बच्चे के आने की खुशी एकदम से मातम में बदल गई. लोग उसे प्यार तो करते लेकिन आंखों में भाव होता कि ये बच्ची बड़ी होकर दूसरे बच्चों से अलग होगी. मुझे कोई अनुभव नहीं था, ऐसे बच्चे को कैसे संभाला जाता है. तब शुरू हुए डॉक्टरों के चक्कर. हम उनके पास जाते और बच्ची के इलाज की गुजारिश करते. डाउन सिंड्रोम का कोई क्योर नहीं, ऐसा हमें तब भी नहीं लगता था. कोई कुछ कहता, कोई कुछ. वक्त के साथ जाना कि अब डॉक्टरों की देहरी से मन हटाकर पियाली पर लगाना होगा.

    मैं उसे ब्रश कराती. नहलाती, कपड़े पहनाती. छोटी थी तो कुछ अलग नहीं लगा लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ने लगी, उसके अलग होने का अहसास पूरे तीखेपन के साथ सामने आने लगा. मैं उसे खुद ट्रेनिंग देने लगी लेकिन घरवाले गुस्सा करते कि मैं बच्ची पर ज्यादती कर रही हूं. मैं मां हूं. जानती थी कि कल जब वो बड़ी हो जाएगी, यही लोग नाक-मुंह सिकोड़ेंगे. जल्दी ही मैं पियाली के साथ स्पेशल बच्चों के स्कूल जाने लगी. वहां खुद सबकुछ सीखा. सारी ट्रेनिंग की- ब्रश कराने से लेकर खाने और कपड़े पहनने तक. तब नए सिरे से उसे सिखाना शुरू किया.



    छोटी बहन के आने पर पियाली में बड़ा होने का अहसास जागा. वो उसे गोद में लेकर बैठती. रात को छोटी के जागने पर वो भी जाग जाती. उसे गोद में लेकर दूध पिलाती. वो दूसरे स्पेशल बच्चों से अलग काफी जल्दी अपने काम खुद करने लगी थी. हालांकि पीरियड के आने पर उसे दिक्कत होती. पीरियड शुरू होने के सालभर बाद तक मैं पैड बदलने में उसकी मदद करती रही. फिर मैंने कैलेंडर में उन तारीखों पर गोला मारना शुरू कर दिया. उसके साथ पैड रखने लगी ताकि अचानक आने पर वो परेशान न हो जाए.

    कितनी सारी चीजें सीख चुकी है लेकिन सेफ्टी के बारे में अब भी कुछ खास नहीं समझा सके हैं. कोई भी घंटी बजाए, वो धड़ से दरवाजा खोल देती है. उसे कहीं भी अकेला नहीं जाने दे सकते. 30 पार कर चुकी है लेकिन हम शादी के बारे में नहीं सोच सकते. यहां तक कि आज उसकी छोटी बहन की शादी में रुकावट आ रही है क्योंकि पियाली स्पेशल है. लोगों को लगता है कि हमारे बाद पियाली छोटी बहन पर निर्भर हो जाएगी. ऐसे कितने ही रिश्तेवाले पीछे हट चुके हैं.

    आज से 30 साल पहले पियाली इस दुनिया में आई, तब इंटरनेट नहीं था. तब छत्तीसगढ़ और भी पिछड़ा हुआ था. मैं कमउम्र मां थी. बच्चा संभालना और उसपर स्पेशल बच्चा संभालना बेहद मुश्किल था. मैंने इसे चुनौती की तरह लिया. उसके साथ सीखा. उसे सिखाया. पढ़ाई की. और आज पियाली जैसे कितने ही बच्चों को सिखा रही हूं.

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    Tags: Human Stories

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