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HumanStory: सर्जरी के दौरान आए मामूली से ज़ख्म ने AIIMS की नर्स की ज़िंदगी बदलकर रख दी

ड्यूटी के बाद सीधा एड्स सेंटर पहुंची. वहां एक मरीज पहले से थी. देखते ही पूछा- 'आपको ये बीमारी कैसे लगी?' मैं सकते में थी. अभी तो कितना कुछ बाकी है. अभी मैं कैसे मर सकती हूं! सर्जरी के दौरान उस एक हादसे ने मेरी जिंदगी बदलकर रख दी.

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(सरकारी अस्पताल के ओटी (ऑपरेशन थिएटर) में काम करना सीमा पर दुश्मनों से लड़ने से अलग नहीं. इलाज करते हुए जाने कब, कौन सी बीमारी गिरफ्त में ले ले. एम्स ट्रॉमा सेंटर में काम कर रही नर्सिंग ऑफिसर निहारिका मोइत्रा (नाम बदला हुआ) ने लंबा वक्त एड्स की आशंका से लड़ते बिताया.)

मार्च, 2016.
मेरी नाइट शिफ्ट थी. सफदरजंग अस्पताल से एक मरीज रेफर किया गया. हाथों में खून का थक्का जमा हुआ था. हमने आनन-फानन सर्जरी की तैयारियां कीं. मरीज की हालत से लग रहा था, वो ड्रग एडिक्ट है. मैंने उसका ब्लड सैंपल लैब में भेजा. उसकी हालत हमें रिपोर्ट के इंतजार की मोहलत नहीं दे रही थी. हमने सर्जिकल किट पहनी और काम शुरू कर दिया. डॉक्टर के हाथ तेजी से चल रहे थे. मेरा पूरा ध्यान उन्हें असिस्ट करने पर था तभी डॉक्टर के हाथ से सर्जिकल ब्लेड फिसला और सीधा मेरे पैर में घुस गया. इसी बीच रिपोर्ट आ चुकी थी. मरीज को एड्स तो था ही, HCV यानी हेपेटाइटिस सी भी था.



30 साल की निहारिका  इंटरव्यू की शुरुआत में ही जता देती हैं कि उन्हें ओटी में काम करना बेहद पसंद है. 'किसी को उसकी सबसे खराब हालत में देखने और उसे संभालने से सुखद कुछ नहीं', निहारिका  कहती हैं.

पढ़ाई के बाद साल 2009 से एम्स ट्रॉमा सेंटर में काम शुरू किया. 9 सालों में कितना कुछ देखा. स्वाइन फ्लू जैसी बीमारियों से मरीजों को मरते देखा. मरते इंसान को सेहतमंद होते देखा. कितनों के साथ उनकी जिंदगी के आखिरी पल बांटे. कितनी ही बार बिलखते परिजनों को फर्श से उठाकर तसल्ली दी. यही सारे काम मिलकर मेरे पेशे को पूरा बनाते हैं.

उस रात!
ट्रॉमा सेंटर में मरीज की हिस्ट्री का इंतजार नहीं कर सकते इसलिए खतरा तो होता ही है. मैंने पूरी किट पहनी हुई थी.

चाकू सीधा गिरा और शू-कवर को काटता हुए अंदर धंस गया.



सर्जिकल ब्लेड इतनी तेज होती है कि इससे बचा नहीं जा सकता. आनन-फानन दूसरी नर्स रिलीव करने आई और मैं ओटी से बाहर भेज दी गई. हमें इमरजेंसी पहुंचना था. कुछ मीटर की दूरी थी लेकिन एंबुलेंस बुलाई गई. मेरे साथ इंचार्ज और दूसरे साथी थे.

घाव धोया गया. सारे प्रिकॉशन्स दिए गए. चलने लगे तभी डॉक्टर ने रोका, 'वैसे तो सब ठीक होगा लेकिन 0.001 प्रतिशत चांस है बीमारी का. HIV के लिए एंटीडॉट हैं लेकिन HCV के लिए ऐसा कुछ नहीं.' बताते हुए डॉक्टर सीधा मेरी आंखों में ताक रहा था.

नर्म और संवेदना से भरी वे आंखें मेरे भीतर उतर गईं. वे चेताती थीं- डर तो है...डर है.



रातभर इंतजार के बाद सुबह कपड़े बदले और किसी आम लड़की की ही तरह एम्स के एआरटी (एंटी-रेट्रोवायरल ट्रीटमेंट) सेंटर के लिए निकली. यहां एड्स के लिए दवा लेनी थी. रोज एम्स के गेट नंबर 1 से लगभग भागते हुए ही अंदर पहुंचती. पहले शायद ही कभी इस हिस्से पर ध्यान दिया था. राजकुमारी अमृत कौर ओपीडी की बाईं ओर ये सेंटर किसी भी आम एआरटी सेंटर की तरह बेजान और उदास लगता है.

पूरे अस्पताल का यही हिस्सा है, जहां मरीज अक्सर अकेले आते हैं. एड्स के मरीज.

मैं डर रही थी. अपने ही अस्पताल में मरीज बनकर पहुंची थी. वहां एक औरत मुझसे पहले कतार में थी. करियर में कितने ही मरीज देखे. पहली बार मैं किसी मरीज से आंखें चुरा रही थी. तबतक सवाल किया जा चुका था. 'आपको ये बीमारी कैसे लगी? मुझे मेरे पति ने दी.' मैं अकबकाई सी देखती रही. पैर में ताजा जख्म था और मन आशंकाओं से तितर-बितर. नहीं बता सकी कि मैं खुद नर्स हूं और कल के हादसे ने मुझे यहां पहुंचाया है. नहीं बता सकी कि मुझे इस बीमारी का डर 'लगभग' नहीं जितना है. यानी ये हो भी सकता है!

उस डर से बड़ा ट्रॉमा कुछ नहीं था.



ये शुरुआत थी. सेंटर पर दवा दी गई. एक डोज़ 1200 मिलीग्राम का. पूरा वक्त नींद आती. जब नींद नहीं आती तो उबकाई आती. पेट खराब रहता. सिर में हर वक्त दर्द बना रहने लगा. दवा लेकर नाइट ड्यूटी पर जाती तो कानों से जैसे धुआं निकलता. खड़े रहना तो दूर, जागना तक मुश्किल था. काम के दौरान दुर्घटना होने के कारण मुझे स्पेशल लीव दी गई ताकि मैं 28 दिनों का कोर्स पूरा कर सकूं.

दवा ने मेरी सेहत तबाह कर दी. वजन तेजी से बढ़ा. मैं सोती, रोती और डरावनी बातें सोचतीं. लेकिन इससे भी डरावना था, अपने सपनों को 'पेंडिंग' में डालना.

शादी को 2 साल हुए थे. मैं कंसीव करने की प्लानिंग कर रही थी. दोनों बेहद खुश. तभी ये हादसा हुआ. पति ने तसल्ली दी. तब हिम्मत जुटाई और ससुरालवालों को बताया. उनकी प्रतिक्रिया अलग थी. वे डरे हुए थे और गुस्से में भी. कहीं उनके बेटे को कुछ हो गया तो! कहीं उन्हें ये बीमारी लग गई तो! मुझसे दूरी बरतते करते लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं था.



शुरुआती 6 महीने बीमारी के इंतजार में बीते

ये विंडो पीरियड होता है, वाइरस शरीर के भीतर होते तो हैं लेकिन खून के सैंपल में नहीं आते. टेस्ट कराती. बच्चा अब दूसरे पेंडिंग सपनों की कतार में था. 6 महीने बीते. रिजल्ट निगेटिव आया लेकिन डर बना रहा. अस्पताल जाती. सर्जरी में शामिल होती लेकिन डरी रहती कि कब कौन सी सुई या चाकू दोबारा लग जाए. सालभर तक सैंपल रिपीट करती रही, तब कहीं जाकर तसल्ली हुई. एड्स का खतरा अब मुझपर नहीं. हेपेटाइटिस का खतरा हालांकि हमेशा मंडराता रहेगा. बीमारी का इंतजार, खुद को मरता देखने से भी भयावह है. ये मैंने तभी समझा.

अब भी ओटी में काम करती हूं. अब भी मुझे अपना काम पसंद है. बस, एक फर्क है. सर्जरी के दौरान असिस्ट करते हुए मैं डॉक्टरों को बार-बार ताकीद करती रहती हूं. अब मेरे पास खुद का उदाहरण है.

कितने ही नर्सिंग स्टाफ और डॉक्टरों को इलाज के दौरान बीमारी की गिरफ्त में आते देखा लेकिन काम रुकते कभी नहीं देखा. यही इस पेशे की खूबसूरती है. 

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