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#Human Story: जख्म तो वक्त के साथ भर जाएंगे मगर दर्द तो ताउम्र मेरे सीने में पलेगा...

हम दोनों अपनी नई-नवेली दुनिया को अभी सजा ही रहे थे तभी उस दिन एक धमाका हुआ और हमारा सब कुछ उजड़ गया. ताउम्र के लिए मुझे ये जख्‍म मिल गया.

हम दोनों अपनी नई-नवेली दुनिया को अभी सजा ही रहे थे तभी उस दिन एक धमाका हुआ और हमारा सब कुछ उजड़ गया. ताउम्र के लिए मुझे ये जख्‍म मिल गया.

हम दोनों अपनी नई-नवेली दुनिया को अभी सजा ही रहे थे तभी उस दिन एक धमाका हुआ और हमारा सब कुछ उजड़ गया. ताउम्र के लिए मुझे ये जख्‍म मिल गया.

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अभी कुछ महीने पहले मेरी जिंदगी की नई शुरुआत हुई थी. मेरी शादी हुई थी. पड़ोस में रहने वाली एक लड़की मेरी जीवनसंगिनी बनकर आई थीं. हम अपनी नई-नवेली दुनिया को अभी सजा ही रहे थे. मैं बहुत ज्‍यादा तो कमाता नहीं था. मगर जितना भी था उसमे हम पति- पत्‍नी खुशी-खुशी अपना गुजारा करते थे. कभी पत्‍नी ने भी किसी चीज को लेकर कोई शिकायत नहीं की.

मैं रोज सुबह गांव वालों के जानवर चराने जाता था.शाम को मजदूरी करता था.उससे मिलने वाले पैसों से हमारा दो वक्‍त रोटी खाने का जुगाड़ हो जाता था. इससे ज्‍यादा तो हमारी ख्‍वाहिशें भी नहीं थीं. हमारी एक बहुत छोटी सी दुनिया बन चुकी थी. मगर इस खुशहाल जिंदगी की उम्र इतनी छोटी होगी. हम दोनों ने कभी सोचा नहीं था. उस दिन कुछ ऐसा हो जाएगा. सबकुछ एक झटके में बदल जाएगा. ये हम दोनों ने कभी सोचा नहीं था.

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दरअसल हर रोज की तरह बीते साल चौदह नवंबर को मैं गाय चराने गया था. गाय चराते हुए मुझे प्यास लगी और मैं पानी की तलाश में इधर-उधर भटक रहा था, तभी मेरा पैर किसी चीज पर एक धमाका हुआ और उसके बाद मुझे कुछ भी याद नहीं. आंख खुली तो सामने अंधेरा पसरा हुआ था. लोगों की आवाजें सुनाई दे रही थी. मगर मुझे कुछ नजर नही आ रहा था. मैंने उठकर खड़े होने की कोशिश की तो मैं हिल-डुल भी नहीं पा रहा था. समझ नहीं आया कि आखिर हो क्‍या रहा है ये? न बोल पा रहा हूं. आखिर मैं हूं कहां? तभी पापा की आवाज पहचान में आई. उसके बाद मेरी पत्‍नी की. उन लोगों ने मुझे बताया कि मैं हॉस्‍पटिल में हूं.

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हॉस्पटिल सुनकर मैं चौंक गया. मुझे लगा मैं वहां कैसे आया और क्‍यों आया? तमाम तरह के सवाल मेरे दिलो- दिमाग में चल रहे थे. मेरा सर घूम रहा था. उसके बाद पास बैठे पुलिस अधिकारी ने बताया कि उस दिन जब मैं गांव में जानवर चराने गया था. अचानक मेरा पैर खेत की मेड़ पर नक्सलियों द्वारा लगाए प्रेशर बम पर पड़ा और पल भर में ही विस्फोट के साथ मैं हवा में उछला और फिर नीचे आ गिरा.इस विस्फोट में मेरा बांया पैर उड़ गया, जबकि आंखों के आगे हमेशा के लिए अंधेरा छा गया.धमाके की आवाज गांव और थाने तक आई, जिसके बाद पुलिस मौके पर पहुंची थी. किसी तरह घायल अवस्‍था में मुझे पहले सुकमा फिर सुकमा से उसे सरकारी एंबुलेंस में मेडिकल कॉलेज में भर्ती करा दिया गया.

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इस बम धमाके में मेरा बांया पैर अलग कर दिया गया है और मेरी आंखों की रोशनी चली गई है. शरीर के पूरे हिस्से में बम के स्प्लिनटर्स लगने के कारण पूरे शरीर मे दर्द रहता था. हमेशा की तरह नक्सली जवानों को निशाना बनाने के लिए आईईडी लगाते रहे हैं, लेकिन इसकी चपेट में ग्रामीण और जानवर आते रहते हैं. मगर उस दिन मैं उसका शिकार हो चुका था. पिछले दो महीने से अस्‍पताल में भर्ती हूं. दांए आंख की रौशनी पूरी तरह से चली गयी. मगर बांयें आंख से 2-3 मीटर तक रखी चीज़ें धुंधली सी दिखाई देतीं हैं. इन सबके बीच मेरी पत्नी और मेरे पापा हर वक़्त मेरे साथ रहते हैं. आज उनकी वजह से मैं अपनी जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा हूं.

(ये कहानी छत्‍तीसगढ़ सुकमा जिले के चिंतागुफा निवासी 18 वर्षीय राहुल सोढ़ी की है. राहुल गांव के खेत में  अपनी गाय चराने गए थे. इस दौरान उन्‍हें प्‍यास लगी. प्‍यास की तलाश में जब वे इधर-उधर भटक रहे थे तो उनका बांया पैर माओवादियों के लगाए प्रेशर आई ई डी के लगाए हुए बम पर पड़ गया. उनका पैर पड़ते ही एक तेज धमाका हुआ. इस धमाके में उनकी आंखों की रोशनी चली गई. इसके अलावा उनका बांया पैर भी  अलग करना पड़ा.बैसाखी के सहारे अपनी जिंदगी बिता रहे हैं. मगर उन्‍होंने हार नहीं मानी है. अब वे अपनी हिम्‍मत और लगन से जिंदगी को पटरी पर लाने का प्रयास कर रहे हैं.)  

(इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human stories पर क्लिक करें.)

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