#HumanStory: कबाड़ीवाला हूं, आपके लिए जो 'बेकार' है, उससे मेरे बच्चे पलते हैं

प्रतीकात्मक तस्वीर

कम ही लोग मेरा असल नाम जानते होंगे. रद्दीवाला कहना काफी है. वे चीजें, जो उनके लिए कबाड़ हो चुकी होती हैं, उनसे मेरा परिवार पलता है.

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(दिल्ली के कोटला मुबारकपुर के मोहम्मद सोनू पिछले 12 सालों से कबाड़ी का काम कर रहे हैं, उनकी यही पहचान है.)

इतवार की सुबह की पहचान अगर अलसाए सूरज और देर से खुलती दुकानों से है तो एक आवाज भी है जो इस दिन को अलग बनाती है.

वो आवाज है कबाड़ीवाला की. लगभग हर छोटे-बड़े शहर की हर गली में ये आवाज अलसुबह से देर दोपहर गूंजती रहती है. सोनू रद्दीवाले की आवाज भी इसमें शामिल है.

सुबह घर से निकलता हूं तो मुकद्दर साथ लेकर निकलता हूं. कई बार दो-तीन गलियों में घूमने पर ही रिक्शा भर जाता है और दिहाड़ी बन जाती है. कई रोज ऐसा भी होता है कि पूरा दिन घूमने के बाद भी खाली हाथ लौटना होता है. ऐसे दिनों में रिक्शे पर 30 किलोमीटर भी घूमते हैं ताकि कुछ तो हाथ आए. लेकिन जब किस्मत साथ नहीं देती तो रात में चावल खाकर ही गुजारा करना होता है.

सुबह से शाम तक उन चीजों की तलाश में घूमता हूं जो लोगों के लिए किसी काम की नहीं.

लंगड़ा सोफा, टूटी चारपाई, पुराने अखबार, पुराने बर्तन. हर वो चीज जो लोगों को अपने घर के लायक नहीं लगती, हम उसे खरीद लेते हैं. फिर उन चीजों की छंटाई करते हैं. कागज एक तरफ, बोतलें एक तरफ, स्टील के सामान एक ओर. दिन का बड़ा हिस्सा इस काम में जाता है.



कबाड़ी का पेशा ऐसा है, जिसमें कई दफे कई खूबसूरत चीजें भी मिल जाती हैं. कुछ बेहद पुरानी लेकिन अच्छी हालत में. उन चीजों के आकर्षण से बचना मुश्किल होता है.

सोनू एंटीक शब्द के मायने नहीं जानते, लेकिन अच्छी चीजों की खासी पहचान रखते हैं. कहते हैं, कई बार कोई अच्छा सामान मिल जाता है. बेचने का मन नहीं करता लेकिन बिना बेचे गुजारा भी नहीं होता. हाल में एक फ्रिज मिला. अच्छी कंडीशन में था. 1500 में खरीदा और पास की झुग्गी में 2000 में बेच दिया. मेरे घर में भले फ्रिज नहीं लेकिन रोटी उससे ज्यादा जरूरी है.

दिल को चीज बहुत ही भाती है, उसे बेच नहीं पाता. घर पर रख लेता हूं और मालिक को कीमत चुका देता हूं. एक टेपरिकॉर्डर मिला. उसमें पुराने तरीके से गाने बजते हैं. कैसेट भी लगता है. उसे बेच ही नहीं सका.

हर पेशे की कुछ न कुछ पहचान होती है. रद्दी के पेशे में पहचान है एक खास सुर और लय में लगती 'टेर'. कबाड़ी...वाला, रद्दी...ले लो. एक खास लहजे में पुकार लगाती ये आवाज कई लोगों को झुंझलाहट से भर देती है. हम भी ये बात जानते हैं. शुरू में वैसी आवाज खुद मुझसे नहीं निकलती थी. शर्म आती. झेंप होती. लेकिन फिर देखा-देखी आदत हो गई.

अगर हम सीधे-सीधे रद्दीवाला चिल्लाएंगे तो कोई ध्यान नहीं देगा.



हम कोई चीज खरीदते ही इसलिए हैं ताकि उसे बेच सकें
बड़े-बड़े घरों में रहने वाले लोग भी किलो के भाव में अखबार बेचते हुए भाव करते हैं. तौल को शक की नजरों से देखते हैं. हमारे पास किलो में 2 रुपए आते हैं. उसी 2 रुपए के लिए हम घंटों और किलोमीटरों का फासला तय करते हैं. दिन में 50 किलो रद्दी आई तो 100 रुपए बनते हैं. कई बार वो भी नहीं बनते. शाम को अपने मालिक के पास जाकर हिसाब भी देना होता है. रिक्शा वापस लौटाना होता है. ऐसे वक्त में बच्चों और घरवाली की बेतरह याद आती है.

परिवार का जिक्र आते ही सोनू का लहजा बदल जाता है. वे याद करते हैं, साल 2010 में हमारी 'लव मैरिज शादी' हुई. घरवालों को शादी के लिए मनाया. काम शुरू किया लेकिन कुछ भी अलग नहीं आता था. फिर कबाड़ी का काम शुरू किया.

बड़े करमों से बेटी हुई. इलाज के पैसे नहीं थे लेकिन घरवाली के प्यार ने कभी किसी कमी का अहसास नहीं होने दिया.

दिनभर फेरी लगाता. शाम को अस्पताल खाना लेकर जाता. कई बार अस्पताल में मिलने वाला खाना ही वो मेरे लिए भी बचाकर रख देती. रात उसी के पास रुकता, फिर सुबह काम पर निकल जाता. तब से काम में लगन और बढ़ गई. अब भी बिटिया को खाना खिलाकर ही घर से निकलता हूं.

आवाज में हल्की खराश के साथ सोनू कहते हैं, अक्सर बड़े-बड़े घरों में जाते हैं. हमारी भी हसरत होती है कि अपनी एक छत हो. लेकिन फिलवक्त तो हर महीने घर का किराया, राशन और बेटी की स्कूल की फीस का बंदोबस्त ही मुश्किल से हो पाता है.

दूसरे का पैसा अपनी जेब में होना बड़ी जिम्मेदारी है. रिक्शा लेकर निकलता हूं तो कोशिश रहती है कि मालिक को उसके पैसों की कीमत जितनी रद्दी दे सकूं. 

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