Human Story: जून की तपिश में 91 बीमारों की देखभाल कर रहा है ये रोज़ेदार

छोटा था तब रमजान के मायने ही ईदी हुआ करती. ये पहली ईद है, जब मुझे किसी की ईदी का इंतजार नहीं. गांव की बेतरह याद आती है. घर जाने का इरादा करता हूं कि तभी साथ रह रहे बेघर-बीमार चेहरे याद आ जाते हैं. इरादा मुल्तवी कर फिर से उनकी तीमारदारी में जुट जाता हूं. मेरी कोशिशों से किसी की तकलीफें कुछ कम हो सकें, यही मेरी ईद होगी. और उनकी खुशी मेरी ईदी.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 29, 2018, 12:24 PM IST
Human Story: जून की तपिश में 91 बीमारों की देखभाल कर रहा है ये रोज़ेदार
बेघर बुजुर्ग- प्रतीकात्मक तस्वीर
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 29, 2018, 12:24 PM IST
ये है दिल्ली के गीता घाट पर बना अमन रिकवरी शेल्टर होम. इसकी नीली दीवारों पर एस्बेस्टस की चादर तनी हुई है. ये जून की तपती दोपहरी में आग के गोले जैसी धधकती है. पंखे भी राहत कम और गर्म हवा ज्यादा फेंकते हैं.

ऐसे में एक चेहरा भाग-भागकर सबकी जरूरतें पूरी कर रहा होता है. इस चेहरे का नाम है मोहम्मद इनाम. वे रिकवरी शेल्टर के इंचार्ज हैं. ये पहली ईद होगी, जिसमें वे घर से दूर हैं. हालांकि उन्हें इसका मलाल कम, सुकून ज्यादा है कि वे जरूरतमंदों के काम आ रहे हैं.

रमजान की चंद यादें अब भी जहन में ताजा हैं. अम्मी के हाथ का खाना और ईदी उन्हीं यादों का हिस्सा हैं.

आधी रात में सहरी के लिए अम्मी टेर लगाती. हम बच्चे आंखें बंद किए-किए ही छोटे-बड़े निवाले मुंह में रखने लगते. तब अम्मी मनुहार से खुद खिलाती. हम भरपेट खा फिर से सो जाते, बगैर ये देखे कि अम्मी ने कुछ खाया भी है या नहीं. दूसरी याद ईदी की है. मैं घर पर सबसे छोटा था, लिहाजा सबसे ईदी की फरमाइश करता. सालभर जिन चीजों का इंतजार रहता, ईद पर वो सबकुछ मिल जाता. अम्मी के गुजरने के बाद हालात बदलने लगे.

तकरीबन 7 साल पहले नौकरी की तलाश में दिल्ली आया. रिकवरी शेल्टर में काम मिला. पहले-पहल झुंझलाहट होती. बेघरों को खोज-खोजकर शेल्टर में लाना. बीमारों का इलाज करवाना. ये भला कोई काम है! धीरे-धीरे नजरिया बदला.

शेल्टर होम


दिल्ली जैसे बड़े शहर में जितने लोग घरों के भीतर हैं, शायद उससे कहीं ज्यादा बेघर हैं. सड़कों पर, पटरी पर, फ्लाईओवर पर- यहां हर कहीं लोग रहते हैं. बड़े-बड़े बंगले सालों-साल खाली रहते हैं.
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बेघरों के लिए आजादी भी किसी बददुआ से कम नहीं. उनके आसपास कोई चारदीवारी नहीं. कोई छत नहीं. हर मौसम खुलकर बरसता है. कड़ाके की सर्दी से लेकर दहकती गर्मी तक. सड़कों पर सोएं तो रातभर गाड़ियों की आवाजें, रौशनी और मच्छर नींद हराम करते हैं. खवातीन के लिए तो ये आजादी किसी दोजख से कम नहीं. एक बार एक बुजुर्ग से मिला. वो अपने घर का रास्ता भूल चुका था, दिल्ली में रेल पटरी पर रहता. ऐसे कितने ही लोग रहते हैं.

कोई घर का रास्ता भूल जाता है तो किसी को उसका घर बिसार देता है. हम उन्हें शेल्टर होम लाते हैं.

शेल्टर होम


फिलवक्त यहां 91 बेघर रह रहे हैं. इनमें से ज्यादातर बीमार हैं. ऐसे में ईद पर घर जाना मुमकिन नहीं. घर से दूर पहली रमजान है. पहली ईद होगी. सहरी के वक्त जागकर दूध पीते हुए अम्मी की याद आती है. मैं खाने के लिए कितने नखरे करता और वो कितने निहोरे करतीं. शाम की इफ्तार में दस्तरख्वान सजाने में अम्मी की दौड़-दौड़कर मदद करता. यहां शेल्टर होम में बीमारों के लिए रसोई बनती है, वहीं खाना मैं भी खा लेता हूं. बाकी दिन बीमारों की देखभाल, उनकी दवा, अस्पताल ले जाना, साफ-सफाई का ख्याल रखते बीत जाता है.

ईद पर गांव नहीं तो क्या, शेल्टर होम तो है.

उस रोज के लिए कई तैयारियां कर चुका हूं. गांव में फोन करके सेवई की रेसिपी पूछी. रसोईए को खास ताकीद दी है कि वो उसी तरीके से मीठी सेवई पकाए. मेरे घर न जाने की बात पर शेल्टर के सारे लोग बहुत खुश हुए. उनके चेहरों पर छाई राहत और सुकून ही मेरी ईदी हैं.

(इनपुट: Centre for equity studies द्वारा संचालित अमन रिकवरी शेल्टर होम, गीता घाट, दिल्ली)

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