#HumanStory: जिसने मां को कोठे पर बिठाया, वही उसकी बेटी की जिस्मफ़रोशी करने जा रहा था

जिस दलाल ने नौ बरस की उम्र में मां का सौदा किया, वही सालों बाद बेटी का सौदा करने वाला है. बेटी को पहला पीरियड आया है, यानी वो 'नथ-उतराई को तैयार' है. मां मदद की गुहार लगाती हमारे पास पहुंची. हमें बच्ची को जिस्मफरोशों से बचाना था. 

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 23, 2018, 12:10 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 23, 2018, 12:10 PM IST
(आज भी जब किसी लड़की को वेश्यावृत्ति से बचाने पहुंचती हूं, जहन में सालों पहले के उस रेस्क्यू की याद तैर जाती है. बिहार के कटिहार जिले में तब हम नए-नए थे. एक रोज एक औरत आई. बताया कि जिस दलाल ने सालों पहले उसे बेचा था, वही अब उसकी बेटी को भी धंधे में धकेलने वाला है. फिर शुरू हुई बच्ची को बचाने की जद्दोजहद...16 सालों से देह-व्यापार में फंसी लड़कियों को बाहर निकालने का काम कर रही टिंकू खन्ना पहले रेस्क्यू का अनुभव बांटती हैं.)

दिन में कटिहार के कुली पाड़ा की सांवली-संकरी गलियां आम गलियों सी ही लगती हैं. वही घर-मकान-दुकान.

ये इलाका बारिशों में बाढ़ के पानी से बजबजाता रहता है. शाम के धुंधलके में दृश्य बदलने लगता है. कमउम्र लड़कियां बित्ते-बित्ते कपड़ों में घरों के सामने खड़ी रहती हैं. अनजान चेहरे लड़की-दर-लड़की गुजरते हैं. किसी एक लड़की पर आंखें ठिठकती हैं. खड़े-खड़े ही पूरे शरीर को स्कैन करती हैं, आंखों ही आंखों में हामी दी जाती है. अब लड़की उस अनजान चेहरे को भीतर ले जा रही होती है.

ज्यादातर घर बांस की टट्टियों से बने हैं, जिसमें फटी-गंधाती चादरों की ओट में उतना ही मैला बिस्तर बिछा हुआ है. यही बिस्तर उस लड़की का दफ्तर है.



टिंकू लाल-बत्ती इलाके का खाका खींचते हुए कहती हैं, जिस जगह बिना जरूरत मिनटभर न ठहरा जा सके, वहां एक सीले कमरे में लड़कियां बूढ़ी हो जाती हैं. और फिर बेकार और लाचार.

अपने पहले रेस्क्यू की याद एकदम ताजा है. वे बताती हैं, तब मैं यूनिवर्सिटी से नई-नई निकली थी. मेरे लिए सबकुछ नया और बड़ा दिलचस्प था. जिस संस्था में मैं जुड़ी हूं, उसने तभी-तभी कटिहार में काम शुरू किया था. हम बिहार, कोलकाता और दिल्ली के रेड-लाइट एरिया में काम करते. एक रोज खिचड़ी बालों लेकिन चुस्त शरीर वाली एक औरत धड़धड़ाती हुई हमारे घरनुमा दफ्तर में घुस आई. वो अपनी बेटी को बचाना चाहती थी. हमारे हामी भरने और तसल्ली बंधाने के बाद धीरे-धीरे उसने पूरी कहानी सुनाई.
Loading...
गीता (नाम परिवर्तित) नाम की इस औरत को एक दलाल ने नौ साल की उम्र में कोठे पर बेच दिया था. विरोध करने पर मार पड़ती, भूखा रखा जाता. फिर भी न मानी तो नशा देकर जबर्दस्ती की गई.

बिना कपड़ों के कमरे में बंद रखा जाता. आखिरकार एक वक्त के बाद विरोध मद्धम पड़ गया. कोठे में ही गीता प्रेगनेंट हुई. बाहरी दुनिया में जहां बच्चा कामकाजी मां के लिए रोड़ा माना जाता है, यहां बात उलट होती है. दलाल और कोठे के मालिक-मालकिन आश्वस्त हो जाते हैं कि मां बनने के बाद औरत अपना बच्चा छोड़कर कहीं नहीं भागेगी.

हठी से हठी औरत के लिए बच्चा बेड़ी बन जाता है. गीता भी मां बनने के बाद चुपचाप कोठे में ही रहती रही, जब तक उसे डर नहीं हुआ कि उसकी बेटी भी इसी धंधे में आ जाएगी. मां उसे लेकर भागी लेकिन नाकामयाब रही. तीसरी बार भागने की कोशिश में पुलिसवालों ने ही पकड़कर ट्रैफिकर्स के हवाले कर दिया. खूब मार पड़ी.



अब गीता ने भागने की रणनीति पर दोबारा सोचा. इस बार वो भागी लेकिन बच्ची को वहीं छोड़कर.

टिंकू कहती हैं, लालबत्ती इलाके में औरतें भागना चाहकर भी नहीं भाग पाती हैं तो बड़ा कारण हैं बच्चे. गीता ने सोचा कि भागकर किसी की मदद लेगी और अपनी बेटी को छुड़ा लेगी. पहरा सख्त था लेकिन कई बार भागने की कोशिश कर चुकी गीता को अंदाजा था. वो कामयाब रही. वहां से निकलकर लगभग 100 किलोमीटर दूर अररिया जिले के फॉरबिसगंज पहुंची. किसी के जरिए हमसे मदद मांगी.

सोनागाछी जैसे लालबत्ती इलाके में हमारा काम चलता था. काफी चीजों की समझ थी. हमने मिलकर प्लान किया. सबसे पहले उस जगह की मैपिंग की, जहां बच्ची फंसी हुई थी. किस दिन, किन लोगों को जाना है और कैसे निकालना है, सबका खाका खींचा. यहां हम बच्ची को निकालने की सोच रहे थे, वहां बच्ची की दुनिया बदल चुकी थी. रातोंरात मां उसे छोड़कर चली गई थी. बेहाल बच्ची को दलालों ने दुलार दिया. उसका ब्रेनवॉश कर दिया. बच्ची अपनी मां से नफरत करने लगी थी.

बच्ची को नशे और हॉर्मोन का इंजेक्शन दिया जाने लगा. उसे देह व्यापार में लाने की पूरी तैयारी हो चुकी थी.



हम अपनी टीम और पुलिस के कुछ लोगों के साथ वहां पहुंचे. साथ में गीता भी थी. उसने बच्ची को पहचान लिया. बच्ची नशे में धुत्त एक ओर पड़ी थी. मां ने उसे लिया और हम सब लोग उसके चारों तरफ सुरक्षा-घेरा बनाकर चलने लगे. कटिहार में तब कोई बाल-गृह नहीं था. हम बच्ची को लेकर पटना के लिए निकले. साथ में दो कॉन्सटेबल थे, बिना हथियार के. रात के साढ़े ग्यारह बजे होंगे.

मैं लड़की की मां और बच्ची के साथ प्लेटफॉर्म पर ट्रेन का इंतजार कर रही थी, तभी ट्रैफिकर्स ने हमें घेर लिया. पुलिसवाले एकदम से गायब हो गए.

हम जोर-जोर से चीखने लगे. आसपास भीड़ जमा हो गई. किसी तरह से बचते हुए पटना पहुंचे और सबसे पहली बच्ची की कस्टडी ली. वो रेस्क्यू अभियान यहां खत्म नहीं हुआ. कोठे पर बच्ची को नशे के इंजेक्शन दिए जाते थे. वो हिंसक हो गई. छोड़कर जाने के लिए अपनी मां पर गुस्सा थी. कोठे से बचा लाने के लिए हमपर गुस्सा थी. साथ के लोगों को काटती. मारपीट करती. पढ़ाने की कोशिश पर भड़क जाती कि उसे अक्षर-गिनती नहीं सीखनी. हम उसे कोलकाता लेकर गए, जहां उसका नशा छुड़वाया.

वो बच्ची अब एक बेहद जहीन औरत में तब्दील हो चुकी है, जो हिंदी, अंग्रेजी और बंगाली लिख-पढ़ पाती है. कभी-कभार ब्लॉग भी लिखती है. उसका एक परिवार है और खूब सारे सपने हैं. 

प्रतीकात्मक तस्वीर- फर्स्टपोस्ट


इसके बाद से अब तक ढेरों रेस्क्यू किए. हर रेस्क्यू दूसरे से अलग होता है लेकिन कुछ बातें सबमें समान होती हैं. जिस्मफरोशी का धंधा सुनने में जितना खौफनाक है, भीतरी दुनिया कहीं ज्यादा अंधेरी और संकरी है.

दलाल ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए लड़कियों को छोटे से छोटा कपड़ा पहनने को मजबूर करते हैं. खून जमा देने वाली सर्दियों में भी बित्ताभर कपड़े पहन लड़कियां दरवाजे पर खड़ी रहती हैं. 

उन्हें अक्सर भूखा रखा जाता है. ये हर छोटी बात पर नाफर्मानी की सजा है. हम रेस्क्यू पर जाते हैं तो साथ में पूरे कपड़े और खाने का सामान लेकर जाते हैं. हर कदम पर धमकियां मिलती हैं. जान का खतरा रहता है लेकिन कोई लड़की अंधेरी दुनिया से निकलकर दिन की रौशनी देख सके, इससे बड़ी खुशी कुछ नहीं.

ये भी पढ़ें-


#HumanStory: मॉडल बनने के बाद मुझसे एक रात की कीमत पूछी, 'नहीं' पर बोले- तेरी औकात ही क्या है...


#HumanStory: '30 साल बाद फौज से लौटा तो इस देश ने मुझे अवैध प्रवासी बता दिया'

#HumanStory: 'बरेली के उस 'ख़ुदा' के घर में 14 तलाक हो चुके थे, मैं 15वीं थी'

#HumanStory: नक्सलियों ने उसकी नसबंदी कराई क्योंकि बच्चे का मोह 'मिशन' पर असर डालता

#HumanStory: दास्तां, उस औरत की जो गांव-गांव जाकर कंडोम इस्तेमाल करना सिखाती है

#HumanStory: गोश्त पर भैंस की थोड़ी-सी खाल लगी रहने देते हैं वरना रास्ते में मार दिए जाएंगे

HumanStory: गंदगी निकालते हुए चोट लग जाए तो ज़ख्म पर पेशाब कर लेते हैं गटर साफ करने वाले

34 बरस से करते हैं कैलीग्राफी, ये हैं खत्म होती कला के आखिरी नुमाइंदे

दास्तां एक न्यूड मॉडल की: 6 घंटे बगैर कपड़ों और बिना हिले-डुले बैठने के मिलते 220 रुपए

इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human stories पर क्लिक करें.

Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर