'मेरे शरीर का ऊपरी हिस्सा लड़कियों की तरह लगता और निचला भाग लड़कों जैसा'

मैं ट्रांसजेंडर हूं. सीधी भाषा में कहें तो बीच में अटका हुआ. ये कहना है डॉक्टर संतोष गिरि का, जो कभी डॉक्टरी की प्रैक्टिस नहीं कर सके.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 20, 2018, 11:21 AM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 20, 2018, 11:21 AM IST
मेरे जन्म पर मोहल्ले में लड्डू बांटे गए, घर में कांस की थाल बजी. बेटे के जन्म पर जितना हो सकता है, उतना उत्सव मनाया गया.

दिक्कत शुरू हुई कुछ सालों बाद. मैं बड़ा हो रहा था और इसके साथ ही मेरे शरीर में बदलाव हो रहा था. सपाट सीने पर अब उभार नजर आने लगा था. आवाज भी लड़कों की तरह भारी न होकर कुछ अलग ही लगने लगी थी. शरीर का ऊपरी हिस्सा लड़कियों की तरह लगता और निचला भाग लड़कों जैसा.

कोई हिजड़ा कहता तो कोई जनखा. मेरी पहचान बदल गई. और घरवालों की खुशी मातम में बदल गई.

लड़कियों का बचपन गुड्डे-गुड़ियों के साथ बीतता है. लड़के फुटबॉल खेला करते हैं. मेरे लिए कोई खेल नहीं था. जहां भी जाता, ग्रुप से बाहर कर दिया जाता. मैं लड़कों की तरह तेज दौड़ नहीं सकता था. उनकी तरह क्रिकेट या फुटबॉल नही खेल सकता था. वो लड़कों का ग्रुप था, जिसमें उभरे सीने वाले लड़के की कोई जगह नहीं थी. लड़कियों के पास जाता तो वे मुझे देख मुंह दबाकर हंसती और आपस में फुसफुसातीं. मैं यहां भी फिट नहीं था. तब बहुत सारा वक्त खुद को आईने में देखते बीतता. मैं खुद को पहचानने की कोशिश कर रहा था.



बात आज से तकरीबन 17 साल पहले की है. कोलकाता महानगर तब काफी पीछे था.

स्कूल जाता तो सहमा हुआ रहता. टीचरों को मेरा स्कूल आना और यहां तक कि मेरा होना भी नापसंद था. वहां पढ़ाई में तेज बच्चे आगे बैठा करते. मैं भी पढ़ने में खूब अच्छा था लेकिन स्कूल की रवायत से अलग मुझे पीछे की बेंच पर बैठना होता. टीचर सवाल करते. अक्सर मुझे जवाब पता होता था लेकिन वे मेरे उठे हुआ हाथ को नजरअंदाज कर किसी और से पूछते. स्कूल के वो दिन किसी डरावने सपने से कम नहीं थे.

तब पहली बार यौन उत्पीड़न झेला
ट्रांसजेंडर हैं तो कदम-कदम पर आपसे सवाल होंगे. आपको पीछे रखने की तमाम कोशिशें होंगी, लेकिन इन सबसे ऊपर एक और चीज है. सेक्सुअल एब्यूज. तब मैं आठवीं में था. एक टीचर ने बात करने के बहाने मुझे बुलाया. मेरे भीतर आते ही दरवाजा बंद कर दिया. वो अपना शरीर मेरे शरीर से रगड़ रहा था. मैं रोता जाता लेकिन उसके चेहरे पर अजब से संतोष का भाव था. आंखें किसी बाज की तरह चमक रही थीं, जिसके हाथों में नन्हा शिकार हो. पूरे तीन घंटे बाद मैं कमरे से बाहर निकला. कई दिनों तक स्कूल जाने की हिम्मत नहीं जुटा सका. साल बीते. मैं मजबूत हुआ लेकिन ये बात किसी से नहीं बता सका.

स्कूल खत्म हुआ तो सारे बच्चे आजादी की खुशियां मना रहे थे. ड्रेसकोड से, बंदिशों से. मैं एक नई जंग की तैयारी में व्यस्त था. मैंने लड़कों की तरह छोटे-छोटे बाल कटवाए. अपने पसंदीदा कपड़ों को सूटकेस में बंद कर दिया और लड़कों वाले कपड़े खरीदे.



मैं लड़कों की तरह दिखने, उनकी तरह चलने और उनकी तरह बोलने की तैयारी में लगा था. इसके बिना मेरा कॉलेज में एडमिशन नामुमकिन था. हालांकि रास्ते इसके बाद भी आसान नहीं थे. कॉलेज में एडमिनिस्ट्रेशन वालों ने मेरा सिर से पैर तक मुआयना किया. मेरे चेहरे पर हाथ लगाकर देखा.

बहुत सारी ज्यादतियां करने के बाद आखिरकार वे कॉलेज में एडमिशन को राजी हुए, लेकिन उनकी शर्तें थीं. मैं किसी भी काम से इन्कार नहीं कर सकता था. मैं राजी था.

यहां हालांकि स्कूल से बेहतर हालात थे. क्लास में कम ही बच्चे शेक्सपियर समझ पाते. मैं उनमें से एक था. जो लड़के-लड़कियां पहले मुझसे कटे-कटे रहते, किताबों को लेकर मेरी समझ उन्हें मेरे करीब लाने लगी. कल्चरल ग्रुप का पूरा भार मुझपर था.



स्कूल-कॉलेज से कामकाज की दुनिया में आया तो नए सिरे से तिरस्कार मिला. बीएएमएस यानी आयुर्वेद में ग्रेजुएशन के बाद मैं भी साथी डॉक्टरों की तरह इंटर्नशिप कर रहा था. मरीज आते लेकिन मुझे देखकर बिदक जाते थे. वे सीधे कहते- ये डॉक्टर मुझे नहीं देखेंगे. मैं सीट पर बैठा इंतजार करता रहता.

लोगों को अच्छा डॉक्टर चाहिए या फिर औरत और मर्द! इंतजार इतना लंबा खिंचा कि मैं कभी प्रैक्टिस नहीं कर सका.

औरत और मर्द आपस में बराबरी की लड़ाई लड़ रहे हैं. हमारी लड़ाई पहचान की लड़ाई है. कोई फॉर्म भरो तो मेल-फीमेल कॉलम होता है. हम खुद को कहां रखें! कपड़ों को लेकर यही समस्या होती है. सड़क पर निकलो तो नजरें घूर रही होती हैं. लाइन में लगो तो लोग उपलब्ध मानकर छूने की कोशिश करते हैं. इन सबसे ऊपर है आंखों में तिरस्कार का भाव. ज्यादातर लोग हमें यूं देखते हैं मानो उनसे अलग होना हमारी गलती है.

पहचान की लड़ाई जो लड़ाई पहले खुद से लड़ी, वही अब बाहरी दुनिया से लड़नी है.

ये भी पढ़ें-


#HumanStory: मॉडल बनने के बाद मुझसे एक रात की कीमत पूछी, 'नहीं' पर बोले- तेरी औकात ही क्या है...

#HumanStory: '30 साल बाद फौज से लौटा तो इस देश ने मुझे अवैध प्रवासी बता दिया'

#HumanStory: 'बरेली के उस 'ख़ुदा' के घर में 14 तलाक हो चुके थे, मैं 15वीं थी'

#HumanStory: नक्सलियों ने उसकी नसबंदी कराई क्योंकि बच्चे का मोह 'मिशन' पर असर डालता

#HumanStory: दास्तां, उस औरत की जो गांव-गांव जाकर कंडोम इस्तेमाल करना सिखाती है

#HumanStory: गोश्त पर भैंस की थोड़ी-सी खाल लगी रहने देते हैं वरना रास्ते में मार दिए जाएंगे

HumanStory: गंदगी निकालते हुए चोट लग जाए तो ज़ख्म पर पेशाब कर लेते हैं गटर साफ करने वाले

34 बरस से करते हैं कैलीग्राफी, ये हैं खत्म होती कला के आखिरी नुमाइंदे

दास्तां एक न्यूड मॉडल की: 6 घंटे बगैर कपड़ों और बिना हिले-डुले बैठने के मिलते 220 रुपए


इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human stories पर क्लिक करें.

पूरी ख़बर पढ़ें
अगली ख़बर