खेत में मजदूरी कर रही थी, जब शहर से फ़ोन आया- बिटिया ने 12वीं में टॉप किया है

रिजल्ट वाले दिन अंधेरा टूटने से पहले इंटरनेट खंगालना शुरू कर देने वाले चेहरों के बीच एक चेहरा कीर्ति का है. खेत में भुट्टे तोड़ने के काम के बीच एक अस्पष्ट फोन कॉल आया. कीर्ति को तब भी अंदाजा नहीं था कि वे बारहवीं बोर्ड में टॉप कर चुकी हैं. गांवभर में सिर्फ एक घर में अखबार आता, वहीं से पता चला कि उनका नाम सूची में आठवें स्थान पर है.

News18Hindi
Updated: May 18, 2018, 12:01 PM IST
खेत में मजदूरी कर रही थी, जब शहर से फ़ोन आया- बिटिया ने 12वीं में टॉप किया है
मजदूर की बेटी ने बारहवीं में किया टॉप
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Updated: May 18, 2018, 12:01 PM IST
गांव के ही एक खेत में भुट्टे तोड़ने का काम मिला था. मां के साथ तड़के चली जाती और देर शाम लौटती. खेत में काम कर रहे थे कि फोन आया. मुझे भोपाल बुलाया गया था. वजह तब भी ठीक से समझ नहीं आई. मन में धुकधुकी लगी हुई थी. गांव में किसी घर में अखबार नहीं आता. शाम को प्रिंसिपल का फोन आया तब पता चला कि मैं मेरिट में आई हूं.

मध्य प्रदेश के हरदा जिले की कीर्ति कलम ने 12वीं की परीक्षा में मेरिट में आठवां स्थान बनाया है. लेकिन लिस्ट में नाम उनकी अकेली उपलब्धि नहीं. असल हासिल है सपनों के लिए हालातों के खिलाफ जाकर कोशिश.

18 साल की कीर्ति उस तबके से ताल्लुक रखती हैं, जहां खाने की प्लेट में रोटियां गिनकर फिटनेस के लिए नहीं रखी जातीं, बल्कि इसलिए रखी जाती हैं ताकि सबका पेट थोड़ा ही सही, भरा रहे.

मां-बापू दोनों सुबह 7 बजे करने चले जाते हैं. हमारा अपना खेत नहीं है. वे गांव के पटेलों के खेतों में मजदूरी करते हैं. दोपहर में खाने के लौटते और फिर चले जाते हैं. हम भाई-बहन ही दिनभर एक-दूसरे के लिए होते. आसपास के बच्चे खेलते. ज्यादातर घरों में कोई रोकने-टोकने वाला नहीं होता था. मन तो मेरा भी करता था लेकिन फिर शाम को लौटी मां का मुरझाया चेहरा याद आता, रात में पिता की कराह सुनती. मैं घर के काम करती, स्कूल जाती और बचे वक्त में पढ़ाई पर ध्यान देने लगी.



खेतिहर मजदूरों के घर पर कभी काम होता है तो बच्चों को भी मां-बाप के साथ शामिल होना पड़ता है. दिन-दिनभर काम चलता और फिर कई दिनों के लिए खाली हो जाते हैं.

कीर्ति अपवाद नहीं थीं. वे याद करती हैं, मैं पढ़ने का छोटे से छोटे मौका भी मैं नहीं छोड़ती थी क्योंकि जानती थी कि कभी भी काम आ सकता है. खेती के हजारों काम होते हैं. गोड़ना, निराई-रोपाई, सिंचाई, बोआई. मैं काम करते हुए भी मन में कोई सबक दुहरा रही होती. कई बार मां झुंझला जाती कि मैं इतना चुपचाप क्यों हूं तब मुझे बताना होता कि मैं कुछ याद कर रही हूं.

मां-बाप खेत में मजदूरी करते हैं. पढ़ाई-लिखाई की खास समझ नहीं. कई बार जब कुछ समझ नहीं आता तो ये बात खलती है. लेकिन फिर याद आता है कि वे हमें पढ़ाने के लिए इतनी मेहनत कर रहे हैं. गांव में ज्यादातर लड़कियों की जल्दी शादी हो जाती है. कम ही लड़कियां स्कूल पूरा कर पाती हैं.

कई बार तो ऐसा लगता है मानो घरवाले लड़की के फेल होने का इंतजार करते हैं. लड़की फेल हो तो उसे घर बिठा दें. मेरे घर का माहौल इससे अलग रहा. मां-बापू भले ही पढ़े-लिखे नहीं लेकिन बच्चों की इच्छाओं की कद्र है. मुझे पढ़ने का शौक है, ये जानकर हमेशा मुझे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया.



घर के काम करते, गाय-भैंस का गोबर पाथते हुए कीर्ति रोज कम से कम तीन घंटे पढ़ने की कोशिश करतीं. इसी बीच खाना पकाना और छोटे भाई की पढ़ाई में मदद भी करतीं. वे हंसते हुए बताती हैं, पढ़ाई की थी. यकीन था कि अच्छे नंबर आएंगे लेकिन पता नहीं था कि मेरिट में आ जाऊंगी. मैंने तो अभी तक अपनी आंखों से अखबार में अपना नाम भी नहीं देखा. एक दिन बाद अखबारों और टीवी से लोग आए. मेरे इंटरव्यू के लिए. उनसे डर गई. सारा गांव जमा था. सबने कहा कि जो टॉप कर सकती है, वो बात भी कर सकेगी. मैंने बोलना शुरू किया तो डर चला गया.

कोचिंग, इंटरनेट, रेफरेंस की ढेरों-ढेर किताबों से बगैर कोई वास्ता रखे कीर्ति ने ऐसे अच्छे मार्क्स लाए. अब आगे क्या करना है? सवाल पर उनका अनगढ़ लेकिन सच्चा जवाब आता है. पढ़ने के लिए किसी शहर जाऊंगी. कहां? अभी पता नहीं. और पढ़ाई के बाद 'पुलिस' बनना है. पुलिस क्यों? 'मैंने देखा है कई गांवों में स्कूल न होने के कारण लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं. कई जाती हैं तो लड़कों के फब्तियां कसने के कारण बीच में पढ़ाई छोड़ देती हैं. मैं उन सबको आश्वस्त करना चाहती हूं कि वे खुलकर पढ़ें-खेलें और जो चाहें करें. पुलिस बनकर मैं डर खत्म करना चाहती हूं',  बोलते हुए कीर्ति की आवाज का उतार-चढ़ाव उनके इरादों की मजबूती बताता है.
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