#HumanStory: नक्सलियों ने उसकी नसबंदी कराई क्योंकि बच्चे का मोह 'मिशन' पर असर डालता

प्रतीकात्मक तस्वीर: फर्स्टपोस्ट

16 साल की थी जब शादी से भागकर 'पार्टी' से जुड़ी. बंदूक थामी. गोला-बारूद की ट्रेनिंग मिली. दल के ही एक साथी से प्यार हो गया. शादी की. पार्टी में बच्चा करने की 'मनाही' है. हमने पुलिस में सरेंडर कर दिया. पहले पुलिस से खतरा था- अब नक्सलियों से.

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(छत्तीसगढ़ का बस्तर देश के चुनिंदा नक्सल-प्रभावित क्षेत्रों में शुमार है. जिंदगी के 15 बरस नक्सल आंदोलन को दे चुकी श्यामवती अब हथियार छोड़कर मुख्यधारा से जुड़ने की कवायद कर रही हैं.)

लंबे कद और सतर कंधों वाली श्यामवती सधे हुए हाथों से रसोई संभालती हैं. रंगीन साड़ी पर नफासत से कढ़ाई की मुश्किल डिजाइन उकेरती हैं. बच्चे का ख्वाब बांटती हैं. श्यामवती किसी भी मामले में पड़ोस की किसी 'श्यामा' से अलग नहीं. जब तक कि वे अपनी बीती जिंदगी का जिक्र न छेड़ें. जब तक कि उनके तने हुए कंधों में आप सालों की सैनिक ट्रेनिंग की झलक न देख लें.

श्यामवती की जिंदगी किसी कहानी से अलग नहीं. 

'बात साल 2003 की है. मेरे लिए रिश्ता आया. मुझे शादी-ब्याह के फसाद में नहीं पड़ना था. मां-बाप को खूब समझाया. वे अड़े रहे. मैं भी अड़ गई. शादी मेरे लिए मुमकिन नहीं थी. मैं 'पार्टी' से जुड़ गई', श्यामवती बताती हैं.

तब नक्सली लोग अक्सर गांव आते. मीटिंग करते. सबसे बोलते थे, कमउम्र में शादी मत करना. 'मनपसंद' शादी ही करना. मैंने सोचा, उनसे जुड़ जाऊंगी तो वे बचा लेंगे. मैं चली गई.



जंगल-जंगल फिरते और रात में कहीं सो जाते

शादी से भागकर नक्सलियों से जुड़ी तब उनके बारे में ज्यादा पता नहीं था. वे गांव आते. हमसे भली तरह से बात करते. समस्या पूछते. हल सुझाते. और चले जाते. कहां जाते हैं- ये उनके साथ जाकर मालूम पड़ा.

घने जंगल हमारा घर हो गए. दिनभर जंगल-जंगल घूमते. कभी-कभार गांव जाते. गांववालों से बात करते. रात में फिर जंगल लौट आते. वहीं अपने टेंट गाड़ते, वहीं सो रहते. जंगली जानवर से अलग नहीं थे हम. इसी बीच मुझे दूसरे नए साथियों के साथ कई तरह की 'ट्रेनिंग' मिली. बंदूक चलानी सिखाई गई. दिन-दिनभर ट्रेनिंग चलती. मैंने पूछा- बंदूक क्यों, तो बताया 'आत्मरक्षा' के लिए.

'पुलिस को कैसे मारना है, सब सिखाया. वे हमारे पीछे आते हैं तो हमें तो खुद का बचाव करना होगा.'

श्यामवती को अपनी पहली बंदूक भी याद है. कहती हैं- पहली बंदूक छोटी थी, 12 बोर की. सालभर बाद थ्री-नॉट-थ्री मिल गई. फिर वही साथ रही. लेकिन मुठभेड़ के दौरान मैं हमेशा हवा में गोलियां चलाती. खून देखकर मन कैसा-तो होता था. आखिर तक ऐसा ही रहा.



हर दूसरे महीने मलेरिया होने लगा, दवा नहीं मिलती थी

नई-नई थी तो जंगल में रहने से डर लगता. सांप-बिच्छू-जानवर का डर लगता. सोते नींद नहीं आती थी लेकिन तब शादी से भागना ज्यादा जरूरी था. बाद में बीमार रहने लगी. बार-बार मलेरिया होने लगा. शरीर तेज बुखार में तपता रहता लेकिन तब भी जंगल में चलते रहना होता. इसमें कोई छूट नहीं थी. ये सुरक्षा के लिहाज से भी जरूरी था और ट्रेनिंग का भी हिस्सा था. छोटी-मोटी बीमारियों की दवा तो रहती लेकिन मलेरिया या बड़ी तकलीफ की कोई दवा नहीं मिलती थी. तब 'उसने' बड़ा ख्याल रखा.

साइड की मांग काढ़ गहरा सिंदूर और लंबी-चमकती बिंदी लगाए श्यामवती की आवाज उसके जिक्र पर नर्म हो आती है. कहती हैं, तब वो दल का साथी था. 

मिलते, बात होती. हम दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे. दल के लीडर को बताया. वहीं जंगल में हमारी शादी हुई. शादी से भागकर दल में शामिल हुई और फिर बाद में शादी को बनाए रखने के लिए ही हथियार छोड़ दिए.



पति की जबर्दस्ती नसबंदी करा दी गई

वो वक्त काफी मुश्किल था. हमारी शादी तो हो गई लेकिन साथ नहीं रह सकते थे. दोनों को अलग-अलग रहना पड़ता. खुलकर बात करने का भी मौका नहीं मिलता था. कुछ और भी मुश्किल बातें घटीं. पति की नसबंदी करा दी गई. दल में बच्चा नहीं चाहिए होता है.

लीडरों का मानना है कि बच्चे से मिशन में रुकावट आती है. जिम्मेदारी उठानी पड़ती है. मोह बढ़ता है. तभी से हमने पार्टी छोड़ने का मन बना लिया. हालांकि ये पार्टी में शामिल होने से कहीं ज्यादा मुश्किल था.

पति चिट्ठी छोड़कर जा चुका था...

मैंने कहा- 'चलो, चलते हैं. दोनों घर में जाके ठीक से रहेंगे'. श्यामवती याद करती हैं. उसने दल के लोगों से बात की कि खेती-बाड़ी करने लौट रहा हूं. साथियों ने उसे आगाह किया, किसी भी हाल में पुलिस के पास मत जाना. वो राजी हो गया. वो जब जा रहा था, मैं अपने ग्रुप में थी. उसने चिट्ठी धरी और चला गया. गांव पहुंचते ही पुलिस ने उसे धर लिया. नक्सलियों की जानकारी लेने के वास्ते रायपुर ले गए.

पूछताछ की तो मेरे बारे में बताते हुए उसने मदद मांगी. उन्हीं की मदद से मैं लौटी. वहां दोनों से लंबी पूछताछ हुई. कहां रहते थे. दल में कितने लोग थे. क्या करते थे. कितने दिनों से थे. आदि-अनादि...



नक्सली कुछ बातों में एकदम साफ रहते हैं. वे खुद में शामिल होने के लिए किसी से जबर्दस्ती नहीं करते. ऐसे ही जब कोई पार्टी छोड़ना चाहे तो उससे भी जबर्दस्ती नहीं करते.

जो जाना चाहता है, वो मना करने के बाद भी जाएगा ही. रोकेंगे तो भाग जाएगा. तो वे रोकते नहीं. फैसला करके भेज देते हैं. पुलिस के सामने 'सरेंडर' नहीं करना अकेली शर्त होती है. हम सरेंडर करना तो नहीं चाहते थे लेकिन पुलिस ने हमें खोज निकाला. अब पुलिस की निगरानी में ही सरकारी क्वार्टर में रहते हैं.

मायके जाने में जान का खतरा है

15 साल पार्टी के साथ बिता चुकी श्यामवती को क्या कभी मायके की याद नहीं आई? क्या मायके को कभी बेटी की याद नहीं सताई? मायके के जिक्र पर श्यामवती का लहजा बदल जाता है. फोन पर लंबी चुप के बाद कहती हैं, 'गांव में मीटिंग के लिए गए तो बाप एक बार मिला था. खूब मनाया कि घर चल लेकिन लौटना मुमकिन नहीं था. नक्सली तब मार देते. लौटी तो भी हाल वही हैं. मां को फोन किया, घर आने का कहा. उन्होंने मना कर दिया. बाप ने कहा, तू घर आएगी तो नक्सली भी पहुंच जाएंगे, फिर घर-द्वार छोड़कर भागना होगा.'

'बूढ़े लोग जमीन-बाड़ी छोड़के कहां जाएंगे, इसलिए मैंने ही मन को मार लिया.'



जिन हाथों ने सालोंसाल बंदूक थामी, अब कढ़ाई सीखते हैं

अगस्त 2016 में श्यामवती ने आत्मसमर्पण किया. बाद के कई महीने जंगल के बाद घर से सामंजस्य बिताते बीते. बताती हैं, जंगल में कैसे जंगली जानवर असन (जैसे) रहते थे. खाना-सोना-रहना-बारिश-पानी-धूप, सब वहीं.

अब सिर पर छत है. बारिश हो तो भागकर कहीं बचने की जुगत नहीं लगानी होती. रात में किसी जानवर की आहट से नींद नहीं टूटती. हाथ डरकर बंदूक का घोड़ा नहीं दबाते. पास-पड़ोस वाले घुलने-मिलने लगे हैं. पति को पुलिस ने गोपनीय सैनिक रखा है. वो हर महीने पगार लाता है. हमें बच्चा चाहिए, रायपुर जाकर उसने नस खुलवा दी है. अच्छा लगता है. कहीं भाग नहीं रहे. मैं बंदूक और बम-बारूद छोड़कर 'गिरस्थी' के काम सीख रही हूं.

'16 बरस की थी जब पार्टी ने नाम बदलकर श्यामवती से लक्ष्मी बना दिया. अब 15 साल बाद मैं वापस श्यामवती हूं.'

(सहयोग: कृष्ण कुमार सैनी, छत्तीसगढ़ )

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