#HumanStory: दास्तां, उस औरत की जो गांव-गांव जाकर कंडोम इस्तेमाल करना सिखाती है

पहली बार कंडोम हाथ में लिया तो बहुत झेंप लगी. लुगाइयों से बोलते हुए भी शर्म आती. कोई कहता, पेट में फट जाएगा. कोई फब्तियां कसता. गांव की बहू हैं. घूंघट की आड़ में बात करते लेकिन टारगेट पूरा करना था इसलिए मर्दों को भी कंडोम बांटते. 

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 10, 2018, 1:14 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 10, 2018, 1:14 PM IST
(स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की योजना के तहत ग्रामीण महिलाएं गांवों में कंडोम बांटती हैं. राजस्थान की सविता धोलिया भी इनमें से एक हैं. वे कंडोम वितरण के दौरान आने वाली परेशानियों पर बात करती हैं.)

राजस्थान अपने भव्य किलों, सुर्ख रंगों और चटक खाने के लिए ही सैलानियों को नहीं लुभाता. दो एकदम अलग चीजों को साथ देखना हो तो भी राजस्थान जा सकते हैं. एक ओर फिरंगियों को भी अपनाने की उदारता तो दूसरी तरफ ठेठ संस्कृति.

यहां औरतें घूंघट संभालते हुए ही चिता में जाती हैं. परदे की ओट से ही घर के सारे काम निपटाकर यही औरतें दोपहरों में थैला उठाए नजर आएंगी. वे थैले का मुंह खोलती हैं और पसीजे हाथों से गांव की लुगाइयों और मर्दों को एक पैकेट पकड़ाती हैं. ये पैकेट है कंडोम का. इसपर बनी तस्वीर ही इसका इस्तेमाल बता देती है. 



'आज से 15 साल पहले पहली बार कंडोम का नाम सुना. कुछ अधिकारियों ने महिलाओं की बैठक बुलाई. कहा- ये बच्चों में अंतराल में मदद देगा. माला डी और कॉपर टी से बढ़िया है. हम सारी लुगाइयां लाल हो गईं. फिर उसके इस्तेमाल का तरीका समझाया. इसके लिए 6 दिनों की ट्रेनिंग मिली. शुरू-शुरू में झिझक लगती लेकिन फिर समझ में आया कि ये चीज हम औरतों की ही मदद करेगी.'

सहज ढंग से अपनी बात कहती सविता राजस्थान के चुरु जिले के छोटे से गांव सादुलपुर की बहू हैं. आबादी- लगभग 2000. यहां चाचा-ताऊ-बुआ-मौसी संबोधनों के बिना बात नहीं होती. ऐसे माहौल में 'सेफ-सेक्स' पर बात वर्जित सेब है. सविता का अनुभव भी इससे अलहदा नहीं. 

मैं वैसे तो शुरू से बोल्ड रही. लोग संभलकर बात करते लेकिन इस काम में मुझे भी झेंप लगती. पति से छोटी उम्र के मर्द हमारे देवर लगते हैं. देवरों को तो बांट पाती लेकिन बड़ी उम्र के मर्दों से झिझक लगती. उनकी लुगाइयों को कंडोम देते. समझाते. कोई-कोई समझता तो कोई इन्कार कर देता. कोई उल्टे सवाल करता. ऐसे कई लोग हैं, जो कंडोम के इस्तेमाल से डरते हैं. एक जोड़े ने 10 बच्चे पैदा किए. मैंने खूब समझाया कि इसे 'यूज़' करो लेकिन लुगाई ने साफ मना कर दिया. उसे लगता है कि ये पेट में जाकर फट जाएगा. ऐसे और भी लोग हैं.
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फिर कंडोम के पैकेटों को घर में रखना भी एक मुश्किल है. लोग-बाग दवा जैसी चीजें बच्चों की पहुंच से दूर रखते हैं. हम गांववाले कंडोम को बच्चों से छिपाते. पैकेट के भीतर पैकेट रखते ताकि किसी की नजरें न पड़ें.

'साल 2003 में कंडोम पहली बार हाथ में लिया. पहली बार ही हमने भी इस्तेमाल किया.'

'गांव के औरत-मर्द कुछ नहीं जानते थे. उन्हें अंगूठे में लगाकर पूरी प्रक्रिया समझाते कि कैसे और कब लगाना है. अजीब लगता. लेकिन टारगेट मिला था इसलिए करना ही होता था. कुछ वक्त पहले महीने में 10 लोगों को कंडोम बाटंने का टारगेट हुआ करता. चाहे वे 10 औरतें हों या फिर 10 मर्द. हम औरतों को खोजते ताकि खुलकर बात कर सकें. अब टारगेट नहीं रहा.



लोग पढ़-लिख गए हैं और फ्री का कंडोम नहीं लेना चाहते. वे खुद दुकान जाकर अपनी पसंद का लेते हैं. इक्का-दुक्का लोग ही 'सरकारी कंडोम' लेते हैं.'

काम का सबसे मुश्किल हिस्सा क्या है?
गांव की कमउम्र बहुओं के साथ लोगों का बर्ताव. वे इस काम में आती हैं लेकिन कम उम्र होती हैं. उतनी बोल्ड नहीं होतीं. डरती हैं. लोग फब्तियां कसते हैं. मजाक उड़ाते हैं. बहुत सी औरतों को ये सब झेलना होता है. आजकल के लड़के ज्यादा सवाल-जवाब करते हैं. कई बार फोन पर भी परेशान करते हैं.

मुझे वैसे ऐसी परेशानी नहीं झेलनी पड़ी. कोई कुछ कहे तो फट से जवाब दे देती हूं. लेना है तो लो वरना जाओ. सब औरतें ऐसे बोल नहीं पातीं, न अपने पति पर इसके इस्तेमाल का दबाव बना पाती हैं.

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