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#HumanStory: 'पापा तो चोरी करते थे लेकिन हमें उन्होंने अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ाया'

दक्षिण छारा

दक्षिण छारा

पापा स्टार-चोर थे. खूब तेज. खूब मजबूत. ठीक-ठाक कमा लेते, लेकिन पता नहीं क्यों अपने बच्चों को चोरी सिखाने की बजाए पढ़ाना चाहते थे.

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    (अहमदाबाद स्थित बुधन थिएटर के संचालक दक्षिण छारा  की कहानी)

    पापा नामी चोर थे. सरपट भागते. और सबसे बड़ी बात, वो जन्मजात एक्टर थे.

    चोरी करते हुए इस बात का पूरा ख्याल रखते कि किसी को चोट न लगने पाए. उसका ध्यान भटकाकर सामान उठा लेते. कई-कई बार वो महीनों घर नहीं आते थे. फिर अचानक किसी दोपहर मां गायब हो जातीं, लौटतीं तो पापा साथ होते. काफी बाद में पता चला, पापा चोरी करते हैं और अक्सर जेल भी जाते हैं. हमारा पूरा खानदान, पास-पड़ोस और यहां तक कि पूरा मोहल्ला यही करता था. मैं इस बात पर कुछ खास अपसेट नहीं हुआ.

    मेरी पैदाइश अहमदाबाद के छारानगर की है. हम घुमंतु समुदाय के हैं, जिन्हें अपनी उठाईगिरी के कारण अंग्रेजों से जमाने में ही बाकी दुनिया से अलग कर दिया गया.

    समुदाय के लोग छारानगर में ही रहते. कहीं भी बाहर जाने पर पुलिस का चक्कर रहता. कोई काम भी नहीं देता था इसलिए गुजारे के लिए चोरी करते. परिवार के सभी पुरुष यही काम करके परिवार चलाते.

    पापा परिवार के पहले बाप थे, जिन्होंने अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में भेजा.

    मुझे तब अंग्रेजी बिल्कुल समझ नहीं आती थी. चौथी में दो बार फेल हो गया तो मुझे इंग्लिश मीडियम से निकालकर गुजराती मीडियम में डाल दिया. मेरा फिर भी पढ़ने में मन नहीं लगता था लेकिन अब भाषा का बहाना काम नहीं करने वाला था. मैं स्कूल जाता और क्लास में बैठकर अगले दिन न आने के बहाने सोचा करता.

    दक्षिण छारा


    ऐसा ही एक दिन था, जब सारे भाई-बहन स्कूल में थे और मैं पेटदर्द के कारण घरपर. मां बाहर निकली तो मैं छिपकर उनके पीछे चलने लगा. मां रिक्शे में बैठी तो मैं रिक्शे के पीछे लटक गया.

    अब मां का मुझपर ध्यान गया. उन्होंने मुझे उतरने के लिए कहा लेकिन मैं लटका रहा. मां ने उतरकर रिक्शेवाले को पैसे दिए और मुझे पीटना शुरू कर दिया. वो पीटती जाती और मैं कहता, जहां जा रही हो, मैं साथ चलूंगा. पीटते-पीटते ही वो मुझे सिनेमाहॉल ले गई. वहां मैंने अपनी जिंदगी की पहली फिल्म देखी. फिल्म गुजराती में थी, जिसका टाइटल था- 'मां से बढ़कर संसार में कुछ भी नहीं'. मां रो रही थी.

    फिल्म को देखते हुए मैं जितना हैरान रहा, उसके बाद की चीजों ने मुझे और हैरान किया. लौटते वक्त मां की मुझसे सुलह हो चुकी थी और हम साथ-साथ रिक्शे में लौट रहे थे. तब मैंने पहली बार सड़क पर बिजली की रौशनी देखी. तेजी से दौड़ती गाड़ियां देखीं.

    मैं सम्मोहित सा देखता रह गया कि छारानगर के बाहर की दुनिया इतनी हसीन, इतनी चमकीली है!

    चोरी के अलावा हमारी कम्युनिटी के लोग शराब भी बनाया करते. इसके लिए गुड़ का पानी भी घोलना होता था. मुझे भी विरासत में पिता की तरह मजबूत शरीर मिला था. तो मैं गुड़ का पानी बनाने का काम करता. ये मेहनत का काम था, घोलते हुए कंधे दर्द करने लगते लेकिन मैं खुशी-खुशी करता था क्योंकि बदले में मुझे 1 रुपए मिलता था.

    दक्षिण छारा


    इन रुपयों से फिल्में देखने लगा. सोचता था कि फिल्मों के चरित्र परदे के पीछे बैठ रहते हैं और हैलोजन से उन्हें बड़ा दिखाया जाता है. मैं पागलों की तरह घंटों थिएटर के दरवाजे पर इंतजार करता कि ये लोग बाहर निकलेंगे और मैं मिलूंगा. अपने एक दोस्त को हॉल के पिछले दरवाजे पर बिठाता ताकि पीछे से निकलें तो वो पकड़ ले. फिल्में देखने का मेरा शौक बढ़ता ही चला गया और जल्दी ही मेरी रही-सही पढ़ाई का भी दम निकल गया.

    संगीत की ओर



    समुदाय के लोग बाहरी लोगों से मिल-जुल नहीं पाते थे तो मनबहलाव के लिए संगीत बनाया करते. डंडा, चम्मच, कड़छी, डिब्बा, ड्रम, थाली, जो मिल जाए, उसी से संगीत की धुन बनाया करते.

    मैंने 17 की उम्र में अपने उन्हीं संगी-साथियों के साथ मिलकर पहली वीडियो फिल्म बनाई थी. इसके बाद से मैं छारा समुदाय के अपने हमउम्र लोगों के साथ मिलकर थिएटर करने लगा. अपनी मुश्किलें छारानगर से बाहर के लोगों तक पहुंचाने लगा. इसी सिलसिले में ऐसे लोगों से भी मुलाकात हुई जिन्होंने आगे पढ़ने की प्रेरणा दी. 2010 में एक इंटरनेशनल फैलोशिप मिली. मैं पहली बार फ्लाइट और इंटरनेशनल फ्लाइट में बैठा. यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स से थिएटर एंड ग्लोबल डेवलपमेंट में मास्टर्स किया. तब से मैं लगातार फिल्में और थिएटर कर रहा हूं. कुछ महीनों पहले फीचर फिल्म समीर का वर्ल्ड प्रीमियर भी हुआ.

    पिता ने अपनी सारी खूबियां मुझे विरासत में दीं, उनकी मजबूती, उनकी एक्टिंग और उनकी सादगी. बस, एक बात बदल गई. चोरी की बजाए उन्होंने मुझे किताबें पढ़ने की प्रेरणा दी. और जिंदगी का मकसद दिया.

    (अहमदाबाद स्थित बुधन थिएटर के संचालक दक्षिण छारा से बातचीत पर आधारित) 

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