#HumanStory: एंबुलेंस ड्राइवर की दास्तां- रास्ता देना दूर, लोग सायरन की आवाज़ से भड़क जाते हैं

मरीज बेहोशी की हालत में है. भीतर अटेंडेंट गाड़ी और तेज भगाने को कह रहा है. सड़क पर जाम है. लोग रास्ता देने को तैयार नहीं. ऐसे में रेड लाइट तोड़कर एंबुलेंस को उल्टा-सीधा कैसे भी दौड़ाते हैं. बस, जान बचनी चाहिए. 

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 1, 2018, 12:42 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 1, 2018, 12:42 PM IST
पटरी पर तकरीबन एक किलोमीटर तक कटे हाथ-पैर पड़े हैं. एक ओर उसका बाकी हिस्सा तड़प रहा है. हमें कॉल मिलती है. तेजी से पहुंचते हैं. इधर मिनटभर की देर और उधर किसी की जान चली जाएगी. जाते ही पहले जिंदा हिस्से को संभालकर स्ट्रेचर पर रखते हैं. तब बाकी हिस्से जमा कर एंबुलेंस में रखते हैं. गाड़ी को हवाई जहाज की रफ्तार से दौड़ाते हैं और ट्रॉमा सेंटर पहुंचकर ही रुकते हैं.

दिल्ली की सड़कों पर नीली बत्ती चमकाती, दिल बैठा देने वाले सायरन के साथ तेजी से भागती एंबुलेंस देखी है! हो सकता है, नरेंद्र कुमार उसकी ड्राइविंग सीट पर बैठे हों. वे दिल्ली सरकार की एंबुलेंस चला रहे हैं. जो हादसे आपने अब तक फिल्मों में देखे होंगे, नरेंद्र के लिए वे रुटीन का हिस्सा हैं.

वे कहते हैं, 'दिन या रात, किसी भी वक्त कॉल आ सकती है. हार्ट अटैक से अधमरा आदमी, जलकर अपनी पहचान खो चुका चेहरा, तेज रफ्तार ट्रेन के सामने खुदकुशी के लिए लगी छलांग...हमारे लिए हर कॉल इमरजेंसी है'.



एंबुलेंस में ड्राइवर सिर्फ ड्राइव नहीं करता
थोड़ी देर बात के दौरान ही नरेंद्र खासी अस्पताली भाषा बोलने लगते हैं. मुश्किल मेडिकल टर्म बोलते हुए उनकी जबान लड़खड़ाती नहीं. इसके पीछे उनकी ट्रेनिंग है. कहते हैं, 12वीं के बाद 2013 में इस काम के लिए चुना गया. इसमें सड़क का सेंस ही काफी नहीं. इंसानी शरीर से भी जान-पहचान होनी चाहिए. हमें एंबुलेंस के अकेले पैरामेडिक स्टाफ की मदद करनी होती है. फर्स्ट-एड देकर उसे स्टेबल करते हैं. एक्सिडेंटल केस है तो सबसे जरूरी है, उसे किस तरह से एंबुलेंस के भीतर लेना है.

हड्डी टूटी हो और हाथ-पैर पकड़कर जानवर की तरह सीधा स्ट्रेचर पर डाल देंगे तो इंसान कभी ठीक ही नहीं हो सकेगा.

एंबुलेंस का सायरन भी लोगों को भड़का देता है
पेशे की सबसे बड़ी मुश्किल क्या है! बगैर एक पल गंवाए नरेंद्र कहते हैं- रास्ता देना दूर, लोग एंबुलेंस की नीली बत्ती और सायरन की तेजी से गुस्सा हो जाते हैं. कितनी ही बार ऐसा हो चुका है. ट्रैफिक में हैं, निकलने के लिए सायरन बजा रहे हैं और गाड़ी से कोई उतरकर आता है. खिड़की पर हाथ मारकर चिल्लाते हुए पूछता है कि भीतर कोई मरीज है भी! अरे भाई, जरूरी नहीं कि एंबुलेंस में मरीज हो. सायरन तो तब भी बजेगा जब हम सड़क पर बुरी तरह घायल किसी आदमी को लेने जा रहे हैं. या फिर घर पर किसी मरते हुए आदमी को हमारी जरूरत हो. किसी घर में, किसी चौराहे पर कोई मरीज इंतजार कर रहा है.



टैक्सी की तरह घूमते-घामते जाएंगे तो कहां से उसकी जान बचेगी.

पहले-पहल घबरा जाया करता. तब केवल गाड़ी की स्टेयरिंग संभालनी आती थी, भीतर बैठे लोगों के जज्बात नहीं. सड़क दुर्घटना में घायल को उठाओ तो वो बेहोश सा पड़ा रहता. घर से किसी मरीज को लो तो परिजन साथ चलते. वे रोते. गाड़ी की रफ्तार को कोसते. उनका गुस्सा, उनकी तकलीफ ड्राइवर पर असर डालेंगे तो एक को बचाने की बजाए सड़क पर कई जानें जा सकती हैं. वक्त के साथ सब संभालना सीखा. खुद शांत रहते हैं. उन्हें भी तसल्ली देते चलते हैं.

एंबुलेंस में अपने हाथों से डिलीवरी भी कराई
काम के शुरुआती दिन नरेंद्र को अच्छी तरह से याद हैं. वे कहते हैं, एक बार एक घबराए हुए पति की कॉल आई. उसकी पत्नी को लेबर पेन हो रहा था. कम जानकारी के कारण उन्होंने इतनी देर से फोन किया कि हमें अस्पताल के रास्ते में एंबुलेंस में ही डिलीवरी करानी पड़ी. ऐसे में पहले मुश्किल हुआ करती. एंबुलेंस में फीमेल पैरामेडिक स्टाफ नहीं के बराबर है. हम ही डिलीवरी कराते. धीरे-धीरे औरत-मर्द में भेद खत्म हो गया और मरीज सिर्फ मरीज रह गया.



 

आपके लिए एंबुलेंस का मतलब क्या होता है?
कई बार रात-बेरात कोई कॉल आता है. फलां जगह किसी की हालत खराब है. हम पहुंचते और पाते हैं कि मरीज को सिर्फ एक दवा और थोड़ी तसल्ली की जरूरत थी. बड़े शहरों के बड़े-बड़े घरों में लोग कितने अकेले हैं. अक्सर ऐसे किसी अकेले बुजुर्ग का फोन आता है. उसे कोई चेहरा देखना है. बुखार या पसीना आना उसे इसे इसकी वजह दे देता है. हम आते हैं. उसे प्राइमरी ट्रीटमेंट देते हैं और थोड़ी देर रुककर चले जाते हैं. अगर कोई अस्पताल जाना ही चाहे तो उसे छोड़ देते हैं.

कई बार बेवजह लोगों का गुस्सा भी झेलते हैं. ट्रैफिक में फंसने पर देर हो जाए तो लोग तोड़फोड़ पर उतर आते हैं. ये वही लोग होते हैं जो किसी वक्त हमारे सायरन की आवाज को सुनकर अनसुना कर चुके होते हैं.

अच्छा हुआ जो सही वक्त पर ले आए! फिल्मों के शौकीन कितनी ही बार ये सुन चुके होंगे. असल जिंदगी में एंबुलेंस ड्राइवर उसी 'सही वक्त' का जरिया होता है. मिनटभर की देर और एक जिंदगी खत्म. सड़क कितनी ही व्यस्त क्यों न हो, लोग कितना ही क्यों न झुंझलाएं, हम अपना सायरन और स्पीड कम नहीं कर सकते वरना भीतर एक जिंदगी दम तोड़ देगी.

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