#Human Story: पड़ोसियों ने पहले ही दी थी जहर देकर मारने की सलाह,बड़ी होकर बेटी ने किया ये काम...

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बिन्‍नी कुमारी

मुझे समझ नहीं आता था कि आखिर मैं ऐसी क्‍यों हूं ? मेरे माता-पिता भी मुझे अपनाना नहीं चाहते थे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 7, 2019, 12:53 PM IST
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मैं उस वक्‍त को कैसे भूला सकती हूं, जब छुट्टियों में पूरा हॉस्‍टल खाली हो जाया करता था. सबके मम्‍मी-पापा अपने-अपने बच्‍चों को लेकर चले जाते थे. मगर मैं छुट्टी में भी वहीं रूकी रहती था, क्‍योंकि मेरे घर से कोई नहीं आता था. अकेले मैं कहीं आ- जा नहीं सकती थी. कमरे की खिड़की के बाहर इंतजार किया करती थी कि शायद आज मुझे कोई लेने आ जाएगा या फिर कल कोई आ जाएगा. मगर कोई नहीं आता था कि मुझे लेने.

एक बार का वाकया याद आता है होली त्‍योहार की छुट्टियां हो गई थी. सब बच्‍चों ने अपने-अपने बैग पैक कर लिए थे. सब बेहद खुश थे कि अगले दिन सबके मम्‍मी-पापा या भाई-बहन उन्‍हें लेने आ रहे हैं. बहुत एक्‍साइटेड थे.अगले दिन एक-एक करके शाम होते-होते पूरा हॉस्‍टल खाली हो गया. सारे बच्‍चे चले गए थे. देर शाम तक तो हॉस्‍पटिल बंद होने की नौबत आ गई. वहां के वॉर्डन ने मुझसे कह दिया कि तुम्‍हारे घर से कोई नहीं आएगा क्‍या? अब तो हॉस्‍टल भी बंद होने वाला है. ये सुनकर बस मैं फफक कर रो पड़ी. मुझे ही ऐसा क्‍यों बनाया? मेरे माता-पिता ही मुझे अपनाना नहीं चाहते.

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आज मैं जो कुछ भी हूं, क्‍या वो मैं अपनी वजह से हूं? क्‍या कोई भी ये तय कर सकता है कि वो कैसा पैदा होगा. वो खुद कैसे जिएगा? उसकी जिंदगी कैसी होगी. क्‍या ये सब किसी के भी हाथ में है? मगर ये बातें मेरे पैरेंट्स कभी समझ नहीं पाए. वो तो बस ये चाहते थे कि मैं जिंदा न रहूं. इसलिए उस दिन भी मुझे कोई लेने नहीं आया था. अकेले बैठे-बैठे थक चुकी थी फिर मुझे हॉस्‍टल के वॉर्डन की मदद से बड़े भाई के पास छोड़कर आ गए. मेरे माता-पिता चाहते थे कि मुझे कुछ ऐसा हो जाए कि मेरी जिंदगी खुद-ब खुद खत्‍म हो जाए, क्‍योंकि मैं जन्‍म से अंधी जो पैदा हुई थी. इसलिए मैं उन पर बोझ थी.

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मैं देख नहीं सकती. इस बात का खुलासा तब हुआ जब मैं सिर्फ छह महीने की थी. उस वक्‍त मैं अपनी मां के साथ कहीं जा रही थी. उस वक्‍त एक अंजान महिला ने मुझे खिलाते हुए कहा कि इस लड़की की नजर में कोई दिक्‍कत है. शायद इसकी रोशनी में कोई दिक्‍कत है. इसलिए एक बार डॉक्‍टर को जरूर दिखा लेना. मां-पापा मान भी गए क्‍योंकि इसके पहले मेरे बड़े भाई भी जन्‍म से अंधे थे. इसलिए उन्‍हें आसानी से इस बात का यकीन हो गया था. उसके बाद वे मुझे फौरन डॉक्‍टर  के पास चेकअप के लिए ले गए. वहां डॉक्‍टर ने ये बता दिया था कि मुझे ग्‍लोकामा और माइक्रोथैल्‍मिया है.ग्‍लोकामा में धीरे-धीरे आंखों की रोशनी चली जाती है, जबकि माइक्रोथैलमिया में आईबॉल डेवलेप नहीं होते है. इसकी वजह से मैं देख नहीं सकती थी.



डॉक्‍टरों के ये क्‍लीयर करने के बाद तो जैसे मेरे घर में शोक की लहर दौड़ गई.अरे एक तो लड़की उस पर वो भी अंधी. क्‍या होगा इसका आगे का भविष्‍य? आखिर इसे कौन ब्‍याह करेगा. कैसे इसकी जिंदगी कटेगी. आस-पास के लोगों ने तो माता-पिता को ये सलाह तक दे दी थी कि इसको जहर वाला इंजेक्‍शन दे दो. ये ज्‍यादा बेहतर है. ये काम मेरे मम्‍मी-पापा ये कर तो नहीं पाए. मगर हां उन्‍होंने इसको लेकर कोई कसर भी नहीं छोड़ी थी.

उसके बाद कह सकते हैं कि मेरे घर में होना या नहीं होना. इस बात का कोई खास फर्क नहीं पड़ता था. हालात बद से बदतर न हो इसके लिए मैंने सोच लिया था कि बस मुझे इन हालातों से निकलने के लिए कुछ  तो करना होगा. इसके लिए एक मात्र सहारा है और वो है पढ़ाई. अच्‍छी पढ़ाई ही सिर्फ  मुझे अपनों के ही बीच बोझ बन गई स्‍थिति से उबार सकती है.

मैंने जिद की मम्‍मी-पापा ने मुझे दिल्‍ली में नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्‍लाइंड में पढ़ने भेज दिया. यहां मैंने बारहवीं तक की पढ़ाई की. मगर इसके बाद मेरे सामने फिर सवाल आगे आकर खड़ा हो गया कि अब क्‍या करना है, क्‍योंकि आगे की पढ़ाई के लिए मम्‍मी-पापा के पास पैसे नहीं थे. इसके बाद मेरे लिए आगे की पढ़ाई करना नामुमिकन हो गया. मुझे इन हालातों का अंदाजा था. इसलिए मैंने पहले ही अपनी नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्‍लाइंड में टीचर से बात कर ली थी तो उन्‍होंने मुझे भरोसा दिलाया था कि वो आगे की पढ़ाई मेरी स्‍पांसरशिप पूरी करवा दी थी. उनके स्‍पांसरशिप के पैसों से मैंने डीयू से पॉलटिकिल साइंस में ग्रेजुएशन किया. इसके बाद मैंने कंप्‍यूटर में डिप्‍लोमा कोर्स किया. इस कोर्स के आधार पर स्‍कोर फाउंडेशन से जुड़ने का मौका मिल गया.

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मगर संघर्ष यहां खत्‍म नहीं हुआ. रोजमर्रा की जिंदगी इतनी आसान नहीं थी. मेरे सामने नई चुनौतियां थी. हॉस्‍टल के बाद दिल्‍ली में अकेले रहना. सारा काम खुद मैनेज करना.एक लड़की और उस पर भी उसकी आंखों की रोशनी न हो तो कितना मुश्‍किल होता हर दिन जिंदगी को जीना. एक-एक काम आपके लिए एवरेस्‍ट की चढ़ाई के बराबर ही होता है. ये ठीक है कि हमें ट्रेनिंग दी जाती है. हमें बताया जाता है. मगर ये सब कुछ आसान नहीं होता.  इसके बाद भी मैंने हिम्‍मत नहीं छोड़ी.



स्‍कोर फाउंडेशन में मैंने काम किया. इसके बाद अब आईवेडॉटओआरजी के साथ जुड़ने का मौका मिल गया. यहां मैं नेशनल हेल्‍प डेस्‍क की मैनेजर बन गई हूं. यहां मैं अपने जैसे दृष्‍टिबाधित लोगों के लिए काम करती हूं. वे जिंदगी के साथ कैसे  तालमेल बिठाएं. उन्‍हें कैसे रोजगार मिल सके. वे कैसे अपनी पढ़ाई पूरी कर सके. अब मैं इन सब मुद्दों पर काम कर रही हूं. आज खुशी मिलती है कि मैं इन लोगों के लिए काम कर रही हूं.

सबसे बुरा ये नहीं होता है कि आप दिव्‍यांग हैं.आप में कोई कमजोरी है.मुश्‍किल इस बात की होती है कि आपके माता-पिता भी आपको अकेला छोड़ देते हैं. बुरा आपको तब लगता है, जब वो आपका साथ नहीं देते. आप अकेले पड़ जाते हैं. इंसान हर तकलीफ से लड़ सकता है, वो अपनों से नहीं जूझ सकता.अगर आपके अपने ही साथ नहीं है तो फिर मुश्‍किलें हो जाती हैं. फिर आपको समझ नहीं आता कि आप कहां जाएं.  किससे अपनी दुख-तकलीफ कहें.  मुझे लगता है दुनिया में सबसे बड़ी बीमारी अकेलेपन की है.  मगर आज मैं खुश हूं कि मैं अपने जैसे तमाम लोगों की मदद कर पा रही हूं.

( ये कहानी बुलंदशहर से ताल्‍लुक रखने वाली बिन्‍नी कुमारी की है. बिन्‍नी पेशे से आईवे डॉट ओआरजी वेबसाइट में नेशनल हेल्‍प डेस्‍क की आपरेशन मैनेजर हैं. बचपन से ही वह देख नहीं सकती हैं. उनकी दोनों आंखों की रोशनी नहीं है. मगर आज वे अपने जैसे तमाम और सामान्‍य लोगों की जिंदगी में उजाला फैला रही हैं. आईवे डॉटओरजी के माध्‍यम से वे तमाम लोगों की जिंदगी को आसान बना रही हैं.)
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