#HumanStory: '30 साल बाद फौज से लौटा तो इस देश ने मुझे अवैध प्रवासी बता दिया'

सेना में भर्ती हुआ तब दाढ़ी-मूंछ भी नहीं आई थी. 30 साल तक देश की तमाम सरहदों पर तैनाती रही. अब घर लौटा तो ये जानने के लिए कि मैं इस देश का नागरिक नहीं.

News18Hindi
Updated: August 6, 2018, 11:30 AM IST
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Updated: August 6, 2018, 11:30 AM IST
(राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी का फाइनल ड्राफ्ट जारी होने के बाद से असम में भूचाल आया हुआ है. इसके अनुसार लगभग 40 लाख लोग अवैध प्रवासी हैं. भूतपूर्व आर्मी अफसर मोहम्मद अजमल हक भी इन्हीं में से एक हैं.)

साल 1968 में कामरूप जिले के एक छोटे से गांव में जन्म हुआ. गांव की आबादी बहुत कम थी. घर से ज्यादा पेड़-पोखर हुआ करते. हम बच्चे दिनभर पेड़ों पर चढ़ते, पोखरों में डुबकियां लगाते. पोखरों से फूल निकालते. घने जंगलों के कोने-कूचों से मेरी वाकिफियत थी. पता ही नहीं था, कहां से जंगल शुरू होता है या फिर कहां पर गांव खत्म होता है. हरे-भरे गांवों में बिताया गया बचपन नाम का ही हिस्सा बन जाता है. मैं उसे वैसे ही याद करता हूं जैसे किसी से अपना नाम बताता हूं.

पढ़ने की उम्र हुई तो अलग से स्कूल जाने की जरूरत नहीं पड़ी. मेरे घर के आंगन में ही चौथी तक स्कूल था. आगे की पढ़ाई के लिए जिले के स्कूल गया. 11वीं पास की और 12वीं में ही सेना में भर्ती हो गया.



तब मेरे दाढ़ी-मूंछ भी ठीक से निकली नहीं थी, अजमल याद करते हैं. वहां जाकर कई चीजें सीखीं. तकनीकी चीजों में हाथ तेज था, लिहाजा मुझे कंप्यूटर और नेटवर्किंग का जिम्मा मिला. मैं देश की सेना के कुछ सबसे अहम विभागों में से एक में काम करता था. और अब वे कहते हैं, मैं देश का हिस्सा नहीं!

बात करते हुए अजमल का गुस्सा उन्हें उनके बचपन से हालिया हालातों की ओर खींच ले जाता है. वे फिर वापस लौटते हैं. एक बार छुट्टी पर घर आया तो मां-बाप ने मेरी शादी की बात की. पत्नी का गांव मेरे गांव से कुछ किलोमीटर ही दूर था. मैं उससे मिला. पिता, स्कूल में हेड मास्टर, वो खुद पढ़ी-लिखी. कुछ महीने बाद साल 1999 में मेरी शादी हो गई. परिवार बढ़ा. अब मेरे दो बच्चे हैं.

पहला ड्राफ्ट निकला तो उसमें पत्नी और मां का नाम था. थोड़ी उलझन हुई लेकिन यकीन था कि अगले ड्राफ्ट में नाम निकल आएगा. मैंने अपने सारे कागजात छोटे भाई को सौंपे और ड्यूटी पर लौट गया. सारे कागज दे चुके. आधार कार्ड, फौज के कागजात, ड्राइविंग लाइसेंस तक. फौज में भर्ती होते हैं तो सारी जांच होती है. मूल भारतीय नागरिक को ही सेना में लिया जाता है. मैं तो 30 साल की सेवा देने के बाद रिटायर हो चुका लेकिन अब मेरे भारतीय होने पर सवाल हो रहा है.
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वे सारी पीढ़ियां, जिनका मैं नाम जानता हूं, असम में रहीं. 1920 से या उससे भी पहले से मेरे दादे-परदादे रहते आए थे. बचपन में उनके बचपन के किस्से सुने कि दादा के भाई को बाघ ने खा लिया. अब उससे आगे का भला कोई कैसे बता सकता है! याद में तो हम पूरे-पक्के भारतीय हैं.

साल 2016 में फौज से लौटा. परिवार गुवाहाटी शहर में बस चुका था. मैंने सोचा, जिंदगी के बाकी बचे साल इत्मीनान से परिवार और दोस्तों के बीच बिताऊंगा लेकिन एक फैसले ने जिंदगी तितर-बितर कर दी. जिसका खून बहता है, उसे ही दर्द होता है, बाकियों को तो बस खून का रंग दिखाई देता है. अभी मैं और मेरे जैसे कितने ही फौजी हैं जो इस दर्द को जी रहे हैं. इस देश में जन्मा. यहां की हवा में पला-बढ़ा. इसी की सरहदों में अपनी पूरी जवानी बिता दी. अब मैं यहां अवैध हूं!

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