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#HumanStory: हापुड़ की इस महिला ने जब 'पीरियड्स' पर की बात, अमेरिका ने दी पहचान

सुमन

सुमन

मुझे 'बिगड़ी हुई औरतों' में शुमार कर दिया गया था, गांव के मर्द अपनी पत्‍नियों से कहते थे कि मेरी संगत ठीक नहीं है. मैं ...अधिक पढ़ें

    (हाल ही में यूपी के हापुड़ शहर से सटे गांव काठीखेड़ा की रहने वाली सुमन चर्चा में रहीं. वजह थी कि सुमन ने सात सात समंदर पार यानी कि अमेरिका में देश का मान बढ़ाया था.उनकी  अभिनीत फिल्‍म 'पीरियड: द एंड ऑफ सेंटेंस'' को  ऑस्‍कर अवॉर्ड  से  नवाजा  गया  है .हापुड़ जैसे  छोटे से  शहर निकलकर  अमेरिका तक  सुमन यूंं  नहीं  पहुंची  हैं. एक लंबे  अरसे से  वे  कड़ी मेहनत कर रही हैं. गांव में तमाम विरोध सहकर माहवारी यानी कि पीरियड्स और महिलाओं से  जुड़े मुद्दे पर  लोगों को  जागरूक  करने का काम कर रहीं हैं. कैसे  कर  पा रही हैं  वो ये सब कुछ. आइए उनसे ही जानते हैं. )

    मैं आज भी बिल्‍कुल वैसी ही हूं, जैसी कल थी. कहीं कुछ भी नहीं बदला. अगर कुछ बदलाव हुआ है तो वो हैं हालात. स्‍थितियों में परिवर्तन आया है. हां अब लोगों की सोच में फर्क दिखता है. कल तक जिस मुद्दे पर लोग खुलकर बात तक नहीं करना चाहते थे. आज उसी पर लोग डिस्‍कस करते दिखते हैं. पीरियड्स और सैनेटिरी पैड पर खुलकर बोलते हैं.  महिलाएं खुद भी प्रेरित हुई हैं लेकिन गुजरते वक्‍त में ऐसा नहीं था.

    मुझे याद है. आज से करीब दस साल पहले मैं एक स्‍कूल में टीचर थी. उस वक्‍त मेरे भीतर महिलाओं के मुद्दे को लेकर कुछ करना चाहती थी. इसी दौरान मुझे 'एक्शन इंडिया' संस्‍था के बारे में पता चला तो मैंने ज्‍वाइन कर लिया. ये संस्‍था महिलाओं के तमाम मुद्दों पर काम करती है, जैसे महिला सशक्‍तीकरण, घरेलू हिंसा, महिला पंचायत और महिलाओं के लिए तमाम रोजगार.

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    'पीरियड : द एंड ऑफ सेंटेंस' फिल्‍म का एक सीन


    मैं भी संस्‍था के साथ जुड़कर अपनी टीम के साथ घर-घर जाकर महिलाओं को माहवारी (पीरियड्स) के दिनों में माहवारी को लेकर जागरूक करने जाया करती थी. उस दौरान महिलाओं को जब भी इससे जुड़ी जानकारी देने के लिए हम घर-घर जाते थे तो बकायदा हमें एक बंद कमरा देखना पड़ता था. हम खोजते थे कि कहीं कोई मर्द हमारी आवाज न सुन रहा हो. खिड़की-दरवाजे बंद करके हम महिलाओं को पीरियड से जुड़ी जानकारी देते थे.

    ऐसा लगता था कि जैसे हम कोई चोरी कर रहे हों, तब महिलाओं को समझाते थे कि पीरियड्स के दौरान कपड़े का इस्‍तेमाल करते वक्‍त कुछ बातों का ध्‍यान रखना जरूरी है, जैसे कपड़े को धूप में सुखाना जरूरी है. ऐसा नहीं करने पर क्‍या-क्‍या इंफेक्‍शन हो सकते हैं.

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    'पीरियड : द एंड ऑफ सेंटेंस'


    उस पर भी अगर उन महिलाओं के पति या परिवारजनों में किसी को कुछ पता चलता था तो कहते थे कि हमारे घर में लड़ाई करवाने चली आती है. इनका तो काम यही है. इनको इसी बात के पैसे मिलते हैं. अगर कहींं ये कह दो कि इस जगह पर प्रोगाम है महिलाओं से जुड़ा यहां आना तो ये सुनकर उनके घरों के मर्द तो बिफर जाते थे. कहते थे कि ये महिलाएं बाहर ले जाकर तुम्‍हें बेच देंगी. इस तरह की बातें बोलते थे.

    संस्‍था के साथ काम करने के दौरान मैंने जाना था कि महिलाओं की अपनी बीमारी कोई बीमारी का ध्‍यान नहीं रहता. अगर घर के किसी सदस्‍य को कुछ हो जाए तो पूरा घर सर पर उठा लेती हैं. खुद पर तो ध्‍यान नहीं देती हैं. एक रिसर्च के मुताबिक मां खुद कभी सैनिटेरी पैड का इस्‍तेमाल नहीं करतीं. वो अपनी बेटी को तो देती हैं लेकिन खुद माहवारी के दिनों में कपड़े  का इस्‍तेमाल करती हैं. इसकी वजह से न जाने कितनी इंफेक्‍शन झेलती थीं. वे कभी खुद पर कोई ध्‍यान नहीं देती हैं. इन हालातों में भी हम महिलाओं को अपने बारे में सोचने के लिए प्रेरित करते थे.

    इसी दौरान एक दिन संस्‍था की गौरी चौधरी ने बताया कि माहवारी और स्‍वच्‍छता  को लेकर एक शार्ट फिल्‍म बनानी है. मैं तैयार हो गई. मैंने सोचा कि चलो एक शार्ट फिल्‍म ही तो बनानी है. कैमरा ही तो फेस करना है. कर लेंगे.अगले कुछ दिनों बाद शूटिंग शुरू हो गई. मगर ये सबकुछ इतना आसान  नहीं था. लोग हंसते थे. कल तक जिस अभियान को हम घर-घर जाकर करते थे. आज वो स्‍क्रीन पर दिखने वाला था. लोग हमारे काम को देखकर मजाक बनाते थे. मगर हम सब एक धुन में बस अपने काम पर केंद्रित  रहते थे.

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    'पीरियड : द एंड ऑफ सेंटेंस' फिल्‍म का एक सीन


    मुझे याद है कि फिल्‍म में एक सीन था कि छोटी सी लड़की से सीन करवाना था. 13 से 14 वर्षीय लड़की को खेत से वापस एक कपड़ा लेकर आना था. उस सीन के माध्‍यम से संदेश देना था कि माहवारी  के दिनों  में गंदा कपड़ा इस्‍तेमाल करने से क्‍या-क्‍या बीमारियां हो सकती हैं. इस सीन को फिल्‍माने में बहुत दिक्‍क्‍तें झेलनी पड़ी. लोगों की भीड़ इकठ्ठा हो जाती थी. आते-जाते हम पर ताने कस के जाते थे. हम अंधेरा होने का इंतजार करते थे, जब लोग थोड़ा अपने घर चले जाएं. खेतों में न रहे कोई तब.

    इसी तरह एक फिल्‍म में एक और सीन था कि एक महिला के घर पैड बेचने जाना था. वो दरवाजा ही नहीं खोलती थी. मर्दों के डर की वजह से. आखिरी बार मैं इतने गुस्‍से में थी कि बोल पड़ी कि ‘बाहर आ जाओ मैं काटूंगी नहीं’. इस तरह से फिल्‍म शूट हो पाई. ये सब करते वक्‍त भी हमने सोचा नहीं था कि हमारी मेहनत इस तरह रंग लाएगी.

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    सुमन


    अगर ऑस्‍कर की बात करूं तो मैंने बस इतना सुना था कि हां ऑस्‍कर कोई अवॉर्ड होता है. इससे ज्‍यादा मुझे कुछ नहीं पता था.  ये तो बिल्‍कुल नहीं सोचा था कि ये अवॉर्ड हमें मिल जाएगा. जब मुझे ये पता चला कि हमारी फिल्‍म को ऑस्‍कर मिलने वाला है तो  दिमाग जैसे 'नील बट्टे सन्‍नाटा हो गया' था.

    आज अफसोस होता है कि मैंने तो आइब्रो भी नहीं बनवाई थी. ढंग के कपड़े भी नहीं पहने थे ऐसे ही सारी दुनिया के सामने आ गई, लेकिन अब आ गई तो आ गई. मगर खुश हूं कि आज हमारे इस काम को लोग सरहाना कर रहे हैं.

    Tags: Human Stories, Human story, Lifestyle

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