#Human Story: हाथोंं में पड़ जाते थे छाले फिर भी नहीं रुकी, आज हैं देश की पहली ढोल बजाने वाली महिला

पांच मिनट ढोल बजाना एक घंटा जिम करने के बराबर होता है. रियाज करने के दौरान खून तक निकल आता था. हाथ में फ्रैक्‍चर तक हो जाता था फिर मैं रुकी नहीं.

News18Hindi
Updated: April 5, 2019, 6:49 PM IST
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Updated: April 5, 2019, 6:49 PM IST
(काले लहराते बाल.चमकदार आंखें. पटियाला सलवार और कुर्ता पहन जब गर्दन पर ढोल लटकार एक बार धुन छेड़ती हैं तो कोई भी अपने कदम थिरकाने से रोक नहीं पाता. अच्‍छे खासे लोगों को अपनी धुन  पर नाचने पर मजबूर कर देती हैं. लोगों  को नाचने  पर मजबूर करने वाली  इस शख्‍स का नाम है जहां गीत सिंह .चंडीगढ़ से ताल्‍लुक रखने वाली जहां गीत देश की पहली और दुनिया में दूसरी ढोल बजाने वाली लड़की हैं. मात्र 12 वर्ष की उम्र में बारीकियां सीखने वाली जहांगीत अब तक तमाम अवॉर्डस जीत चुकी हैं. साथ-साथ कई लाइव परफॉर्मेंस भी दे चुकी हैं. पुरुषों के क्षेत्र में  उन्‍होंने कैसे अपना कब्‍जा जमाया. इस महिला दिवस पर आइए जानते हैं उनकी ही जुबानी..)

दरअसल मैं बचपन से ही चाहती थी कि कुछ अलग करूं, तभी एक बार मैंने अपने आस-पास लोगों को ढोल बजाते हुए देखा तो उनकी एनर्जी देखकर खुद को बहुत एनर्जिटक महसूस करती थी.उनको देखकर खुश होती थी. इसके साथ-साथ सोचती थी कोई लड़की कभी ढोल क्‍यों नहीं बजाती ? ये सवाल अक्‍सर मेरे दिमाग में कौंधता था.शायद यहीं से मैंने तय कर लिया था कि क्‍यों न मैं ढोल बजाना सीखूं.

एक दिन की बात है, जब मैं स्‍कूल से लौट रही थी.उस दिन मैंने सोचा कि आज मुझे ढोल बजाना सिखाना ही है. ये बात मैंने पैरेंट्स से कही तो वे भी एक पल को सोच में पड़ गए. ये क्‍या कह दिया मैंने.उन्‍होंने बड़ी हैरानी भरी निगाहों से देखा, लेकिन हां उन्‍होंने मेरा साथ दिया. मना नहीं किया.पैरेंट्स ने पूरा सपोर्ट किया. उन्‍होंने कहा तुझे जो सीखना है सीख.

जहांगीत सिंह


इसके बाद मैंने प्रॉपर ट्रेनिंग लेने के बारे में सोचा. इसके लिए  हमें एक उस्‍ताद की जरूरत थी, जो हमें इसकी बारीकियां सिखा सकें. हम कुछ उस्‍ताद से मिले. वो बड़े खुशी से कहते थे कि हां-हां बिल्‍कुल सिखा देंगे जी. लेकिन जैसे ही उन्‍हें मालूम पड़ता था कि लड़की को सिखाना है तो वे हाथ खड़े कर देते. साफ इनकार कर देते. दरअसल वे सोचते थे कि एक लड़को को सिखाएंगे जो कि इस कला को आगे लेकर जाए. लड़की को सिखा कर क्‍या मिलेगा?

मगर फिर मुझे सरदार करतार सिंह जी मिले. वे राजी हो गए. वो भी शायद इसलिए क्‍योंकि उनके खुद के पांच बेटियां थीं. इसलिए उन्‍होंने सोचा कि अगर उनकी बेटी की ये ख्‍वाहिश होती तो वे क्‍या करते? बस इसीलिए उन्‍होंने हामी भर दी. अब मेरी प्रैक्‍टिस शुरू हो चुकी थी.अब मैं ढोल बजाने की रियाज के मैदान में उतर चुकी थी. उस वक्‍त मेरी उम्र केवल 12 वर्ष थी और 9 किलो को ढोल अपने गले पर डालकर मैं बजाना सीखती थी. मेरे पांच मिनट में ढोल बजाने से हाथ में छाले हो जाते थे. खून निकल जाता था.चुन्‍नी पसीने में भीग जाती थी. उस वक्‍त बेहद तकलीफ होती थी. यहां तक कि मेरे हाथ में फ्रैक्‍चर  हो जाता था.

जहांगीत सिंह
उस्‍ताद जी कहते थे कि रुकना नहीं है.. और बजा.. जोर से बजा... तुझे एक लड़की की तरह ढोल बजाना है मगर लड़कों से बेहतर बजाना है. उनकी ये बातें सुनकर मेरे भीतर जोश भर जाता था. मगर ये सबकुछ इतना आसान नहीं था. भले ही इस फैसले में पैरेंट्स मेरे साथ थे लेकिन सोसाइटी के लिए ये स्‍वीकार करना मुश्‍किल था. लोग तंज कसते थे. ये लड़कों के काम है.. तू कहां यहां आ गई.

याद है जब भी मैं सीखती थी. लगातार लड़कों से तुलना होती है.अच्छा,आप ये बीट बजा सकती हो. ये बीट मैं ऐसे बजा सकता हूं. आप मेरी बीट सुनिए. ताने सुनने पड़े.अच्छा,अब कुड़ियां भी ढोल बजाएंगी.नीचा दिखाया जाता. काफी बुरा लगता. कई बार लगा कि ये छोड़ देना चाहिए.लोग मुझे पसंद नहीं कर रहे. उस्तादजी ने उस वक्त मेरे भीतर जोश भरते थे.

जहांगीत सिंह


एक बार की बात है, जब मैं परफॉर्मेंस देती थी तो लोग तालियां तो बजाते थे. मगर पीठ पीछे कहते थे कि अच्‍छा अब लड़कियां भी अब ढोल बजाएंगी. अब लड़के क्‍या करेंगे. एक फंक्‍शन की बात है 100 ढोलियों को ढोल बजाना था. मैं भी इनवाइटेड थी,जो 101वीं थीं. मैं इकलौती लड़की 100 ढोलियों में खड़ी थी. सबसे छोटी उम्र की लड़की को ढोल बजाना था.

मैं जब उनके बीच गई. सबने मुझे बुरी तरह से देखा. ये हमारे बीच क्या कर रही है. फील करवाया कि आप यहां को बिलॉन्ग नहीं करती. यहां पर आपको नहीं होना चाहिए. उस वक्‍त बहुत बुरा लगता था.कई बार तो मुझे लगता था कि मुझे छोड़ देना चाहिए. लेकिन उस्‍ताद जी कहते थे कि लोगों की मत सुनो. सिर्फ अपने काम पर ध्‍यान दो. बस यहीं से मैंने खुद के बारे में सोचा. ठान लिया था कि बस रुकना नहीं है.

जहांगीत सिंह


तभी एक बार की बात है कि एक लाइव परफॉर्मेस के दौरान एक आंटी ने कहा कि हमें तुम्‍हें ढोल बजाते हुए देखकर बहुत अच्‍छा लगा. ये कहते-कहते आंटी रोने लगीं. मैंने उनसे पूछा कि आप रो क्‍यों रही हैं? तब उन्‍होंने कहा कि बेटा अच्‍छा लगा आपको देखकर. बस अफसोस इस बात का है कि हमने अपनी बेटी को आगे नहीं बढ़ने दिया.

दरअसल हमारी बेटी भांगड़ा सीखना चाहती थी लेकिन हमने उसे सिर्फ लड़की होने की वजह से सीखने नहीं दिया. अब हम उसे जरूर सिखाएंगे. जब मैंने ये कमेंट्स सुना तो कलेजे में ठंड पड़ गई. ऐसा लगा कि आज जो कुछ भी कर रही हूं. वो गलत नहीं है.अब तक मैं 200 से ज्‍यादा शोज में हिस्‍सा ले चुकी हूं. कई टीवी प्रोगाम में भी हिस्‍सा ले चुकी हूं.

स्‍टोरी- नंदिनी दुबे 

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