#HumanStory: पहली नौकरी के 13 महीने समुद्री डाकुओं की कैद में गुज़ारे...

हमारा जहाज हाईजैक हो चुका था. 13 महीने, 8 दिन की कैद और टॉर्चर के बाद अपनी सरजमीं पर लौटे तो जिंदगी के मायने सीख चुके थे. 

News18Hindi
Updated: August 4, 2018, 8:36 AM IST
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Updated: August 4, 2018, 8:36 AM IST
इंटरव्यू- कल्पना शर्मा

(आपबीती, सरफराज हुसैन की. शिप में बतौर रसोइया काम करने वाले सरफराज का जहाज हाइजैक हो गया. उन्होंने अपहरणकर्ताओं के चंगुल में सालभर से ज्यादा बिताया.) 

मर्चेंट नेवी का कोर्स पूरा करने के बाद मैंने अपनी पहली शिप साल 2012 में दुबई से जॉइन की. मैं रसोइया हुआ करता. हम दुबई से नाइजीरिया की ओर बढ़ रहे थे. जैसे ही इंडियन नेवी की सीमा से बाहर हटे, गोलियों की आवाज सुनाई दी. मैं तब किचन में कुछ पका रहा था. एकदम से चौंक गया. पढ़ाई और ट्रेनिंग के दौरान समुद्री डाकुओं के बारे में बताया गया था. उनके हमले के किस्से सुने थे लेकिन जानता नहीं था कि पहली ही नौकरी में उनसे मुलाकात हो जाएगी. यकीन करने में वक्त लगा कि ये सब फिल्म की कहानी नहीं.

खिड़की से झांका तो एक स्पीडबोट में लोग चले आ रहे थे. वे साथ में फायर कर रहे थे. केरल का एक साथी बाहर देखता रहा. मैंने कहा- भाई ये असल स्टोरी चल रही है. एक गोली और खेल खत्म.

ऐसे हालातों में सबसे पहला कदम क्या होता है? हमारे लिए साफ निर्देश थे कि पायरेट्स का हमला हो तो सबसे पहले अपने डॉक्युमेंट्स छिपा दो. सीनियर ने बताया था कि उनका नुकसान नहीं होना चाहिए वरना मुसीबत बढ़ सकती है. मैंने वही किया. कागज छिपाकर जैसे ही केबिन से बाहर आया, सामने 3 लंब-तड़ंग आदमी खड़े थे. आदमी क्या, दैत्य थे. छह-फुटे आदमियों में से 2 ने अंडरवीयर और एक ने शॉर्ट्स पहन रखा था. आते ही पूछा- तुम कैप्टन हो. मैंने कहा- नहीं.



तब कैप्टन कहां है? मैंने ऊपर की तरफ इशारा किया. उनमें से एक ने अपने शार्ट्स का नाड़ा निकाला और मेरे हाथ पीछे करके बांध दिए. उसी तरह से हिलते-डुलते जहाज में किसी तरह संतुलन बनाते हुए मैं ऊपर पहुंचा. वे तीनों दैत्य पीछे गन ताने चल रहे थे. देखने के बावजूद कैप्टन ने दरवाजा नहीं खोला. एक गोली चली, मेरा शरीर सन्न रह गया. दरवाजा तब भी नहीं खुला. मैं गुस्से में गालियां देने लगा. तब जाकर कैप्टन ने दरवाजा खोला. अब हमारा शिप हाइजैक हो चुका था.

हमारी गलती ये थी कि सोमालिया क्रॉस करते हुए हमारे पास किसी किस्म की सिक्योरिटी नहीं थी. उस गलती का खामियाजा हमें 13 महीने की कैद के रूप में भुगतना पड़ा. उसपर टॉर्चर 'कॉम्प्लिमेंट्री' था.

डाकुओं के दल ने खूब धमकाया और फिर मुझे नीचे खाना पकाने भेज दिया. किचन में पहुंचा तो वहां के हाल देखने लायक थे. सारा किचन अस्त-व्यस्त पड़ा था. 4-5 घंटों में शिप की रसोई तहस-नहस हो चुकी थी. आधा खाया, आधा फेंका सामान बिखरा पड़ा था. मैंने सफाई के बाद खाना बनाना शुरू किया. हफ्तेभर बाद सोमालिया पहुंचे. वहां उनका दल हमारा इंतजार कर रहा था. सबके पास हथियार थे. कई तरह के. तब पहली बार मैंने इतने करीब से हथियार देखे. एके 47, रॉकेट लॉन्चर, माउजर, हैंड ग्रेनेड-
इतना सारा सामान था कि हमारा शिप बंकर बन चुका था.

फिरौती की रकम के लिए जहाज के मालिक से उनकी बात चलती रही. रकम बड़ी थी. वक्त बीत रहा था. महीनेभर हमारी पिटाई शुरू हो गई. मैं खाना पकाता था, लिहाजा सबसे ज्यादा पिटाई मेरी होती. किसी भी बात पर वे पीट देते. हमारी पिटने की आदत होती जा रही थी. डाकू अक्सर मोबाइल पर अरबी में लोगों से बात करते. उनकी आदत थी कि सिम में एकाध डॉलर बचा होने पर उसे फेंक देते. हमने एक ऐसी सिम चुपके से उठा ली. छिपाए हुए फोन में सिम डालकर पहला फोन केरल में किया. पता चला कि हमारे हाइजैक होने की खबर मीडिया में आ चुकी थी. तब जहाज में 17 भारतीय, 3 नाइजीरियन, 1 पाकिस्तानी और 1 बांग्लादेशी था. गहमागहमी के उनमें से एक नाइजीरियन को मार दिया गया और शरीर समंदर में ही फेंक दिया गया.



मेरी भी घर पर जीजाजी से बात हुई. मैंने मां-बाप तक खबर पहुंचाने से मना कर दिया. वे बूढ़े और बीमार थे. जीजा और छोटा भाई दिल्ली आए. दूसरे लोगों के परिवार भी आए हुए थे ताकि हमें छुड़ाने की मांग बल पकड़े. इंतजार चलता रहा. इधर हमारा इंतजार चुक रहा था. रोज नए-नए हादसे होते. एक रोज हम सारे साथियों की तलब हुई. उन डाकुओं के हाथों नें रस्सी थी. मैंने देखा. साथियों को तसल्ली दी कि कुछ नहीं होगा, थोड़ी देर बाद वे खोल देंगे. मुझे कई बार बांधा जा चुका था. लेकिन मैं गलत था. इस बार उन्होंने नायलोन की रस्सी से हाथ-पैर दोनों को पीछे ले जाकर बांधा. हमारा शरीर 'ओ' के आकार में था. इसी हाल में हमें तपते हुए डेक पर छोड़ दिया गया. हम गर्मी और दर्द से रो-चिल्ला रहे थे. धीरे-धीरे आवाज सूख गई और आंसू भी.

घंटों बाद मुझे सबसे आखिर में खोला गया. फिर मुझे जान से मारने की बात हुई. पता नहीं क्या दुश्मनी थी जो वे मेरे साथ एकदम खेला लगाते थे. बोले, अब सरफराजा को मारेंगे. साथी रोने-गिड़गिड़ाने लगे कि मुझे न मारा जाए. एक बंदा आया और मेरे बाजू में खड़ा हो गया. उसके हाथ में चाकू था. मैं समझ गया कि हलाल होने का वक्त आ चुका है. सबको याद किया कि अब शायद मिलना न हो पाए, माफ करें.

इधर उसने गर्दन पर छुरी रखी और घिसना शुरू किया, मैंने कलमा पढ़ना शुरू कर दिया था. काफी देर तक छुरी घिसता रहा लेकिन मैं जिंदा रहा. मेरी आंखें बंद थीं. बाद में पता चला कि वो उल्टी छुरी चला रहा था और ये उनका मजाक था. सहारा देकर जैसे-तैसे मुझे उठाया गया. केबिन में पहुंचकर हम सब हंसने लगे. इतने ढीठ हो चुके थे कि तब भी ये याद करके हंस रहे थे कि कौन कैसे रो रहा था.



एक सुबह चाय बनाने के लिए जल्दी जागा तो देखा, एक बोट पर किसी बैग का लेन-देन चल रहा है. यानी हमारे छूटने के दिन नजदीक आ चुके थे. फिर उन्हीं लंब-तड़ंग भुजंगों में से एक ने हम सबको बाहर बुलाया. ये क्या! वे हमारे साथ फोटो खिंचवा रहे थे. अब हम आजाद हो रहे थे. सोमालिया की सीमा पार करने से पहले ही सबकी अपने घरवालों से बात हो चुकी थी.

ओमान पहुंचने पर सबका मेडिकल चेकअप हुआ. जैसे ही जमीन पर पैर रखे, पैर डगमगाने लगे. 13 महीनों बाद जहाज से नीचे उतरे थे. सबके-सब अजीब लग रहे थे. कपड़े चिथड़े-चिथड़े हो चुके थे. चप्पल घिस गई थी. इंडियन एंबेसी ने हमें कपड़े, जूते, बैग दिलवाए. यानी इतने वक्त बाद हमें इंसानों जैसे चेहरे देखने को मिले.

दिल्ली पहुंचे तो एयरपोर्ट पर सबके घरवाले आए थे. सब मिल-मिलकर रो रहे थे. सिर्फ एक लड़का जोर-जोर से हंस रहा था. वो लड़का मेरा छोटा भाई था. हंसते हुए ही उसने मुझे गले लगाया. कहा- भाई, इतने महीनों से तो तेरे लिए रो ही रहे थे, अब ये हंसने का वक्त है. आने के बाद पटरी पर लौटने में थोड़ा वक्त लगा.

उस हाइजैक ने हालांकि जिंदगी को नए मायने दिए. मौत से डर खत्म हो गया है. रिश्ते-नाते की कद्र और भी ज्यादा है. अब किसी की मदद करते हुए दिल दोबारा कभी नहीं सोचता.

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