Human Story: लंदन से आया ये शख्‍स दिल्‍ली वालों की प्‍यास बुझाता है, लोग इसे ‘मटकामैन’ कहते हैं

मैं लंदन में एक खुशहाल जिंदगी गुजार रहा था, तभी मेरी लाइफ में एक ऐसा मोड़ आया और मैं सबकुछ छोड़कर अपने देश वापस आ गया.

Nandini Dubey | News18Hindi
Updated: January 9, 2019, 10:03 AM IST
Human Story: लंदन से आया ये शख्‍स दिल्‍ली वालों की प्‍यास बुझाता है, लोग इसे ‘मटकामैन’ कहते हैं
अलगरत्नम नटराजन
Nandini Dubey | News18Hindi
Updated: January 9, 2019, 10:03 AM IST
ये उन दिनों की बात है, जब मैं लंदन में रहता था.एक अच्‍छी जिंदगी गुजार रहा था. बिजनेस बहुत अच्‍छा चल रहा था. गिफ्ट और नॉवेल शॉप थी मेरी. दिन भर काम और शाम को पत्‍नी और बेटी के साथ वक्‍त बिताता था. कह सकते हैं कि मैं एक ऐसी लाइफ जी रहा था, जिसे जीने की लोग ख्‍वाहिश रखते हैं. मगर एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि मैंने दोबारा अपने देश वापस आने के बारे में सोच लिया.

दरअसल मुझे कोलेन कैंसर हो गया था.उसके बाद तेज रफतार अचानक जिंदगी थोड़ी ठहर सी गई.  एक लंबा वक्‍त इलाज में गुजरा. उसके बाद ही मैंने तय कर लिया मुझे वापस अपने देश लौटना है और कुछ समय में लंदन में अपना सब कुछ समेट कर मैं भारत वापस आ गया लेकिन यहां आकर  मैं अपने शहर बेंगलुरु में नहीं रहा, बल्‍कि अपनी पत्‍नी के घर यानी कि दिल्‍ली आ गया.

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यहां साउथ दिल्‍ली में मैं पत्‍नी और अपनी सास के साथ रहने लगा था. एक ठीक-ठाक सेविंग्‍स की वजह से लाइफ बहुत आराम से चल रही थी. इसके अलावा कुछ एनजीओ के साथ खुद को जोड़कर मैं काम कर रहा था. यहां मैंने एक कैंसर अस्पताल में रोगियों की सेवा करता था. एक अनाथालय में वॉलंटियर रहा और वंचित तबके के लोगों का अंतिम संस्कार करने में मदद करता था.

एक दिन की बात है, मैं लोधी रोड से गुजर रहा था. मैंने एक स्‍काउट हाउस के बाहर गुजर रहा था. हाउस के बाहर एक वाटर कूलर से मैंने एक रिक्‍शे वाले को पानी पीते हुए देखा. बस यहीं से देखकर मेरे दिमाग में एक आइडिया कौंधा कि क्‍यों न लोगों की प्‍यास बुझाने के लिए मैं कुछ करूं. इसलिए मैंने अपने घर के बाहर एक वाटर कूलर लगा दिया ताकि उस रास्ते से गुजरने वाले राहगीर अपनी प्यास बुझा सकें. फिर धीरे-धीरे घर के बाहर से शुरू हुआ ये सफर रफ्तार पकड़ने लगा. ये सब देख कर मेरे परिवार वाले बहुत खुश थे. हालांकि पत्‍नी थोड़ी डरी हुईं थी कि ये सब मैं क्‍या कर रहा हूं लेकिन उन्‍होंने भी मुझे कभी रोका नहीं.


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मेरी इस पहल को और मजबूती तब मिली, जब एक बार मेरे वाटर कूलर से पानी भर रहे एक गार्ड को मैंने पूछा कि वह पानी लेने के लिए इतनी दूर यहां क्यों आया है, जहां काम करता है वहां क्यों नहीं पानी लेता है. उसने बताया कि वहां उसको पीने के लिए पानी नहीं दिया जाता है. ये जवाब सुनकर मैं स्‍तब्‍ध रह गया कि कैसे लोग अच्‍छा और साफ पीने का पानी के लिए तरस रहे हैं. बस इसके बाद से ही मैंने अपने इरादों को लेकर खुद को और मजबूत किया.

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मगर वाटर कूलर लगवाने में बहुत खर्चा आता. मैंने इसका रास्‍ता निकाला कि मिट्टी के मटके रखवा देता हूं. मैंने जब यह काम शुरू किया था, तब लोगों को लगता था कि सरकार ने उन्हें इस काम के लिए नियुक्त किया है लेकिन मुझे न तो सरकार से और न ही किसी संस्था से इस काम के लिए मदद मिलती है. अपनी जेब से ही पूरा खर्च उठाता हूं. इस काम को देखकर अब कुछ लोग मेरे साथ जुड़ चुके हैं. अब तो कुछ लोग मुझे दान के तौर पर मदद कर रहे हैं.



इसके लिए मैंने एक वैन में 800 लीटर का टैंकर, पंप और जेनरेटर लगवाया है, जिससे वह रोज़ मटकों में पानी भरते हैं. इसमे गर्मी के दिनों में मटके में हमेशा पानी भरा रखने के लिए मैं दिन में चार चक्कर लगाता हूं. गर्मी के महीनों में मटकों में पानी भरने के लिए रोज़ 2,000 लीटर पानी की ज़रूरत होती है. मैंने मटकों के अलावा जगह-जगह 100 साइकिल पंप भी लगवाए हैं. यहां गरीब लोग 24 घंटे हवा भरवा सकते हैं.

(ये कहानी बेंगलुरू से ताल्‍लुक रखने वाले अलगरत्नम नटराजन की है. 70 वर्ष के नटराजन फिलहाल दिल्‍ली में रहते हैं. लंदन में अपना बिजनेस छोड़कर भारत लौटे नटराजन साउथ दिल्‍ली के कई इलाकों में गरीब और जरूरतमंद लोगों की प्‍यास बुझाते हैं. दिल्‍ली के अलग-अलग इलाकों में उन्‍होंने 80 मटके लगवाएं हैं, जिनमें वे पानी उपलब्‍ध करवाते हैं.)  

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