Human Story: नक्‍सलियों की गोली किसी भी क्षण मेरा सिर चीरकर निकल सकती थी

नक्‍सली इलाके में रिपोर्टिंग के लिए गए पत्रकार मोर मुकुट शर्मा पर जब नक्‍सलियों ने हमला कर दिया. जिंदगी और मौत के बीच झूलते उस 40 मिनट की कहानी खुद उनकी जुबानी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 13, 2018, 12:56 PM IST
  • Share this:
मैं अपने जीवन को दो हिस्‍सों में बांट सकता हूं. उस क्षण के पहले, जब मैंने मौत को इतने करीब से नहीं देखा था और उस क्षण के बाद, जब मौत इतने बगल से होकर गुजरी कि हमारे कंधे और कोहनियों ने भी सटकर बात की.

मौत से वो मुलाकात आकर गुजर चुकी है. मौत टल चुकी है और मैं सही-सलामत लौट आया हूं. मैं अपने घर के नर्म बिछौने में हूं. मां मेरे बगल में है. अब सबकुछ ठीक है, लेकिन जब सोता हूं तो मौत बार-बार सपने में आती है. होश में आंखें बंद करता हूं तो गुजरा हुआ सबकुछ किसी फिल्‍म की रील की तरह दिमाग में घूमने लगता है. बंद आंखों के अंधेरे में एक बल्‍ब जलता हो मानो और फिल्‍म शुरू हो जाती हो.
हर बार की तरह उस दिन भी हम अपने ऑफिशियल एसाइनमेंट पर थे. दिल्‍ली से रायपुर की फ्लाइट ली तो आसमान साफ था. हम छत्‍तीसगढ़ जा रहे थे. वहां के कई नक्‍सली इलाकों में पहली बार चुनाव होने जा रहे थे. हममें उसकी रिपोर्टिंग करनी थी. छत्‍तीसगढ़ की सरकार मीडिया कवरेज को सपोर्ट कर रही थी. हमने रिपोर्टिंग की इच्‍छा जाहिर की तो उन्‍होंने हमारी मदद का वायदा किया. मदद मुहैया भी कराई. पुलिस फोर्स हमारे साथ थी. मैं और मेरा सहयोगी कैमरामैन अच्‍युतानंद साहू लालगढ़ में आ रहे लोकतंत्र की रिपोर्टिंग के लिए निकल पड़े.
उस दिन हम दंतेवाड़ा के अरनपुर थाना क्षेत्र में आने वाले नीलावाया जंगल से होकर गुजर रहे थे. दोपहर का समय था. आसमान बिलकुल साफ था. सिर पर सूरज चमक रहा था. हम ऊबड़-खाबड़ रास्‍तों से होते हुए जा रहे थे. दूर-दूर तक घने जंगलों और अनंत तक फैले खेतों के सिवा और कुछ नजर नहीं आ रहा था. सबसे आगे अच्‍युतानंद थे बाइक पर और उनके पीछे कुछ और जवान थे. अभी हम कुछ दूर ही गए होंगे कि गोली चलने की आवाज सुनाई दी. फिर दोबारा एक गोली आई और सीधा अच्‍युतानंद के सिर पर आकर लगी. वो कुछ छटपटाए और बाइक से गिर पड़े. उसके बाद दनादन कई गोलियां चलीं. जो जहां था, वहीं पत्‍थर हो गया. मैं बाइक से गिरा और सड़क किनारे एक गड्ढे में जा गिरा. गड्ढा ज्‍यादा गहरा नहीं था. मैं कुछ नीचे और लुढ़का, जितनी जितना नीचे जा सकता था. उसके आगे जगह नहीं थी. थोड़ा और खिसकता तो कहीं खाई में जाकर गिरता. मैं काफी देर तक सांस रोके उस गड्ढे में पड़ा रहा. फिर धीरे-धीरे अपने हाथ से ही मिट्टी हटानी शुरू की. थोड़ी और जगह हो जाती तो मैं अपना सिर उसमें छिपा सकता था. मैं हाथों से धीरे-धीरे मिट्टी हटाता रहा.



मैं वहां उस अवस्‍था में करीब 50 मिनट पड़ा रहा था. वो 50 मिनट जिंदगी के सबसे खौफनाक 50 मिनट थे. लेकिन जैसे-जैसे वक्‍त गुजरता गया, मैं मौत के भय से मुक्‍त हो गया. जब हम जीवित होते हैं, तब तक इस जीवन का कोई मूल्‍य नहीं समझते. हमें कभी नहीं लगता कि ये लगातार धड़कता हुआ दिल, आती-जाती हुई सांसें सबसे अमूल्‍य निधि है. इसका महत्‍व तभी समझ में आता है, जब इस पर कोई संकट आ जाए. जब लगे कि ये जो है, अब नहीं रहेगा. जब मृत्‍यु सामने खड़ी होती है, तभी हम जिंदा रहने का हर जतन करते हैं. उस दिन उस गड्ढे में लाल चींटियों का बिल था. थोड़ी ही देर में चींटियों ने बिल से निकलकर मुझे घेर लिया. कपड़ों के भीतर घुस गईं और बुरी तरह काटने लगीं. लेकिन फिर भी मैं पत्‍थर की तरह पड़ा रहा. चींटियां काटतीं रहीं और मैं मुर्दा शांति से भरा पड़ा रहा. सच तो ये है कि शायद उस वक्‍त चींटियों का काटना महसूस भी नहीं हो रहा था. रह-रहकर गोलियों की आवाजें आ रही थीं. कुछ ही देर पहले मेरी आंखों के सामने एक गोली मेरे दोस्‍त का सिर चीरते हुए निकल गई थी. मैंने उसे खून में लथपथ छटपटाकर जमीन पर गिरते हुए देखा था. उस क्षण लग रहा था कि मौत बेताल बनकर कंधे पर सवार हो गई है. क्‍या पता, कब कौन सी गोली हवा को चीरते हुए आए और मेरे सिर से होकर गुजर जाए. मेरी खोपड़ी, मेरे शरीर के परखच्‍चे उड़ा दे.
कुछ देर में गोलियों की आवाजें आनी बंद हो गईं और पूरा आसमान एक अजीब से शोर से गूंज उठा. दूर खेतों और जंगलों के बीच लोग अजीब सी आवाजें निकाल रहे थे. वो शायद खुशी मना रहे थे. बड़ा डरावना शोर था. हम दम साधे सुनते रहे.


कुछ वक्‍त और गुजरा. मुझे प्‍यास लग रही थी. मेरा मुंह सूखा जा रहा था. मुझे लगा कि बस कहीं से कुछ बूंद पानी मिल जाए. मैंने साथ पड़े जवान से पानी मांगा, उसने कहा चुपचाप पड़े रहो. अगर हिले तो वो लोग गोली चला देंगे.
मैं वैसे ही पड़ा रहा. अपने सिर को दोनों हाथों में दबाए आंखें बंद करके लेट गया और मुझे हल्‍की-हल्‍की नींद आने लगी. मैं सो गया. मैं ऐसे सोया, जैसे ये आखिरी बार हो. एक लंबी थकान के बाद जैसे सोती है देह गहरी नींद. नींद के कुछ ही देर पहले ही मैंने वो वीडियो रिकॉर्ड किया था. मैंने बताया कि हमारे ऊपर नक्‍सली हमला हो गया है. मैंने आखिरी बार अपनी मां को याद किया. मरते हुए मुझे उन्‍हीं का ख्‍याल आया. मैं आखिरी बार उनसे कहना चाहता था कि मैं उन्‍हें कितना प्‍यार करता हूं. फिर मैं सो गया.



करीब 50 मिनट बाद पता चला कि हमारी मदद के लिए फोर्स पहुंच चुकी है. हम बच गए थे.
वहां से सुरक्षित लौटने के बाद मैंने पहला फोन अपने बॉस को किया. उन्‍हें पता होना चाहिए था कि हमारा एक साथी हमें छोड़कर हमेशा के लिए जा चुका है. दूसरा फोन मैंने घर पर किया. भाभी ने फोन उठाया. मैंने उन्‍हें पूरी घटना बताई और सिर्फ इतना ही कहा कि जब तक मैं लौट न आऊं, मां को इस बारे में कुछ भी मत बताना. लेकिन जब तक मैं वापस आया, मां को खबर लग चुकी थी. मीडिया में खबर फैली तो लोग घर आने लगे. मां से किसी ने कुछ कहा नहीं, लेकिन उन्‍हें अंदेशा हो गया था कि कहीं कुछ तो गड़बड़ है.
जब मैं लौटा तो वो गले से लिपटकर रोईं. मेरी भी आंखों में आंसू आ गए. वह बहुत ही भावुक कर देने वाला लम्‍हा था.
मां ने सिर्फ इतना ही कहा, “तुम्‍हारा जो साथी चला गया, उसका बहुत दुख है. आखिर वो भी तो किसी मां का बेटा था.”

ये भी पढ़ें: 
Human Story: मर्दों के लिए मोटी लड़की मतलब हॉट बिग एसेट
Human Story: मैं चाहता हूं कि अंकित बस एक बार सपने में आकर मुझसे बात कर ले

Human Story: औरतों का डॉक्‍टर होना यानी देह के परे स्‍त्री को एक मनुष्‍य के रूप में देखना
मैं एक प्राइवेट डिटेक्टिव- मेरा काम लोगों की जासूसी करना, उनके राज खोलना
फेमिनिस्‍टों को क्‍या मालूम कि पुरुषों पर कितना अत्‍याचार होता है ?

कभी मैडमों के घर में बाई थी, आज मैडम लोगों पर कॉमेडी करती है
प्‍यार नहीं, सबको सिर्फ सेक्‍स चाहिए था, मुझे लगा फिर फ्री में क्‍यों, पैसे लेकर क्‍यों नहीं

एक अंजलि गई तो उसके शरीर से पांच और अंजलियां जिंदा हो गईं
मैं दिन के उजाले में ह्यूमन राइट्स लॉयर हूं और रात के अंधेरे में ड्रैग क्‍वीन
'मैं बार में नाचती थी, लेकिन मेरी मर्जी के खिलाफ कोई मर्द मुझे क्‍यों हाथ लगाता'
घर पर शॉर्ट स्‍कर्ट भी पहनना मना था, अब टू पीस पहनकर बॉडी दिखाती हूं
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज

corona virus btn
corona virus btn
Loading