Human Story: एक लड़की जिसका पेट नहीं है, मगर दुनिया इनके खाने की दीवानी है..

मैं कुछ भी खाती थी तो मेरे बांये कंधे में बेहिसाब दर्द होने लगता था. खाना-पीना मुश्‍किल हो चुका था. लोग समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर कंधे के दर्द का पेट से क्‍या लेना-देना है? डॉक्‍टर भी हैरान थे.

Nandini Dubey | News18Hindi
Updated: January 11, 2019, 7:24 PM IST
Human Story: एक लड़की जिसका पेट नहीं है, मगर दुनिया इनके खाने की दीवानी है..
मैं कुछ भी खाती थी तो मेरे बांये कंधे में बेहिसाब दर्द होने लगता था. खाना-पीना मुश्‍किल हो चुका था. लोग समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर कंधे के दर्द का पेट से क्‍या लेना-देना है? डॉक्‍टर भी हैरान थे.
Nandini Dubey | News18Hindi
Updated: January 11, 2019, 7:24 PM IST
दर्द अब मुझे दर्द नहीं देता. हां गुजरे वक्‍त में तकलीफ जरूर हुई थी लेकिन सोच लिया था. ऐसे घुट-घुट कर तो नहीं जीना. खुद को बेचारा नहीं समझना है. न ही दुनिया को समझने देना है. उस वक्‍त भी नहीं और आज भी नहीं. इन हालातों से बाहर निकलना है. मैंने ये सोचा भी और किया भी.

दरअसल ये उन दिनों की बात है, जब मुंबई में पढ़ाई-लिखाई पूरी करके शादी करके मैं दिल्‍ली शिफ्ट हो गई थी. यहां मैरिड लाइफ और प्रोफेशनल लाइफ दोनों बहुत अच्‍छी चल रही थी. मुंबई से होटल मैनजमेंट का कोर्स पूरा करने के बाद मैं दिल्‍ली के अलग-अलग दूतावासों में उनके शेफ के साथ काम करने का मौका मिल गया था. मैं बहुत खुश थी कि अलग-अलग देशों के लोकल शेफ के साथ काम करके मुझे वहां के लोकल स्‍वाद को समझने का मौका मिल रहा है.

मगर देखते ही देखते चीजें मेरे हाथ से छूटने लगी. मैरिड लाइफ बिगड़ने लगी थी. पति के साथ तालमेल ठीक से नहीं बैठ पा रहा था. संघर्ष काफी बढ़ गया था. बहुत सारी दिक्कतों के बाद आखिरकार मुझे पति से अलग होने का फैसला लेना पड़ा. साल 2005 में हमारा रिश्‍ता टूट गया. हालांकि मैं ये नहीं कहूंगी कि रिश्‍ता टूटने की वजह केवल मेरे पति थे. खामियां मुझमे भी रही होंगी. अलग होने के बाद मुझे काफी तकलीफ हुई. फिर मैंने सोचा कि ऐसा रिलेशनशिप जो हम दोनों को तकलीफ दे रहा था. हम दोनों को खुशी से दूर रख रहा था. ऐसे रिश्‍ते से अलग होना तो खुशी की बात है फिर मैं दुखी क्‍यों हो रही हूं? बस यही सोचकर मैंने आंसूओं को  खुद से दूर कर दिया.





हालांकि ये सब करना और सोचना इतना आसान नहीं था लेकिन मैं कर पाई क्‍योंकि मेरी फैमिली हर कदम  पर मेरे साथ थी. रिलेशनशिप टूटने के बाद मैंने पूरी तरह खुद को जॉब में समर्पित कर दिया. मैं दूतावास में लोकल शेफ के साथ उनका कल्‍चर समझ रही थी. नए-नए तरह की डिशेज बनाना सीख रही थी. इसी दौरान एक बार फिर मेरी जिंदगी ने करवट ली. मुझे प्‍यार हो गया. दूतावास में कार्यरत स्‍वीडिश ट्रेड कमिश्‍नर को मैं अपना दिल दे बैठी थी. हालांकि शुरूआती दौर में हम दोनों में सिर्फ अच्‍छी दोस्‍ती थी. मगर धीरे-धीरे हम दोनों को एक-दूसरे को पसंद करने लगे थे. इसी बीच उन्‍होंने बेंगलुरु जाने का फैसला कर लिया.

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वे अपना बिजनेस बेंगलुरू में शिफ्ट करना चाहते थे. अब मैं ये सोचकर घबरा गई कि लंबे वक्‍त बाद मेरी  जिंदगी में सच्‍चा प्‍यार आया है. अगर ये जुदा हो गया तो फिर मैं क्‍या करूंगीं. इसलिए हम दोनों ने मौका देखकर एक-दूसरे से बात की. फिर मैंने अपने पैरेंट्स से बात की मुझे कोई पसंद आ गया है. मैं उनके साथ अपनी जिंदगी बिताना चाहती हूं, लेकिन शादी करके नहीं. मुझे शादी का कोई ठप्‍पा नहीं चाहिए. मेरी ये बातें सुनकर मम्‍मी थोड़ी परेशान हुईं मगर पापा ने हामी भर दी. उन्‍होंने कहा जो कुछ भी तुम्‍हें सही लगता है. वैसे जिंदगी जियो. मैं तुम्‍हारे हर फैसले में तुम्‍हारे साथ हूं. बस फिर क्‍या था. निकल पड़ी मैं अपने दोस्‍त, प्‍यार के साथ. यहां हम दोनों साथ खुशी-खुशी जिंदगी बिताने लगे. मैंने यहां रियल स्‍टेट का बिजनेस शुरू कर दिया. सब कुछ ठीक चल रहा था.
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तभी एक दिन की बात है कि मेरे कंधे में दर्द शुरू हो गया. बांये कंधे में शुरू हुआ ये दर्द धीरे-धीरे बढ़ता गया. कुछ वक्‍त तो ऐसी नौबत आ गई कि मैं चीखने लगती थी. मुझे समझ नहीं आता था कि ये क्‍या हो रहा है?  हमने बेंगलुरु में कई डॉक्‍टर्स को दिखाया लेकिन वो लोग कुछ समझ नहीं पाए. तमाम आर्थोपैडिक डॉक्‍टर्स को दिखाया. न जाने कितने एक्‍सरे, सोनोग्राफी हो गए. मुझे तो इनकी संख्‍या तक नहीं याद है. डॉक्‍टर्स सब दवा पर दवा खिलाए जा रहे थे. बस जितनी देर दवा खाती थी, उतनी देर ही आराम मिलता था. उसके बाद वापस वही बेपनाह दर्द. डॉक्‍टर के पास वापस गई तो उन्‍होंने कहा कि तुमको दवा खाने की आदत हो चुकी है. मैं एडिक्‍ट हो चुकी हूं. मुझे गुस्‍सा आ गया. दोबारा उस डॉक्टर के पास नहीं गई. अब मैं कुछ भी खाती थी तो मेरे बांये कंधे में बेपनाह दर्द होने लगता था. खाना-पीना मुश्‍किल हो चुका था. मेरा वजन सिर्फ 38 किलो रह गया था. हीमोग्लोबिन 4 रह गया था. मेरी हालत देखकर लोग अब डरने लगे थे.

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इसी बीच मैंने और पति ने पुणे चलने का फैसला कर लिया. यहां हम सेट ही हुए थे तभी मुझे एक आंटी मिली. वे पुणे केईएम हॉस्पिटल में काम करती थीं. उन्‍होंने मेरी तकलीफ जानी तो डॉक्‍टर डॉ. सूर्यभान भालेराव मिलने के लिए दबाव बनाया. पहले तो मैं मना कर रही थी लेकिन बाद मैं मान गई. डॉक्‍टर को दिखाया तो उन्‍होंने कहा कि इस दर्द का कंधे से तो कोई लेना-देना ही नहीं है. ये बिल्‍कुल अलग केस है. ये बात जानकर मेरे पति, पापा, मम्‍मी सब हैरान थे. डॉक्‍टर ने कहा कि वो चेक करेंगे और देखेंगे. उन्‍होंने तीन घंटे की जांच-पड़ताल करके पता किया तो मालूम पड़ा कि मेरे पेट में दो-दो अलसर और एक ट्यूमर हैं. डॉक्‍टर ने मेरे पैरेंट्स को बताया कि मेरा पेट निकालना पड़ेगा. हालांकि मुझे नहीं बताया गया था कि मेरे साथ क्‍या हुआ है?



मुझे तो ये बात तक पता चली. जब मैं घर वापस आ गई थी. नौ दिनों से मैंने कुछ खाया नहीं था. बस जूस, दाल का पानी यही सब पिया करती थी.अचानक से मुझे बिस्‍किट दिखाई पड़ा तो मैं पागलों की तरह बिस्‍किट पर टूट पड़ी. जैसे ही मैंने बिस्‍किट अपनी जुबां पर रखा. मां ने देख लिया और वो बहुत तेज चीख पड़ींं कि ये क्‍या कर रही हो? तुम्‍हें कुछ खाना नहीं है. अब तुम्‍हारा पेट नहीं है.  सर्जरी में पेट निकाल दिया गया है. मैंने सोचा कि क्‍या हो गया मां को? बोल रही हैं कि पेट नहीं है. ऐसा भी कभी होता है.  मैंने ये न कभी पहले सुना था  फिर उन्‍होंने मुझे समझाया कि मेरे पेट निकाल दिया गया है. अब मैं कुछ खा-पी नहीं सकती. ये सुनकर ही मैं चौंक गई.  कोई पेट के बिना कैसे जिंदा रह सकता है?

मैं पहले की तरह नहीं खा सकती थी.  मुझे एक बार में ब्रेड स्लाइस के आधे टुकड़े के बराबर खाना खाने की इजाजत थी. यानी 38 साल की उम्र में मुझे फिर से खाना सीखना था.’ मगर अब ये सच्‍चाई मेरे सामने थी. मैंने न केवल इसे स्‍वीकारा बल्‍कि इसके साथ आगे बढ़ी. सर्जरी के बाद मेरी जिंदगी बिल्कुल बदल चुकी थी. अपने पैशन को फिर से फॉलो करना शुरू किया. इसके बाद भी मैंने खाने से प्‍यार करना बंद नहीं किया.  मैं कई होटल्‍स के लिए बतौर कंसल्टेंट काम करती हूंं. हालांकि अब मैं नौ से सात बजे की जॉब नहीं करती लेकिन हां मै इंस्‍टाग्राम पर एक्‍टिव रहती हूं. वहां अपनी डिशेज बनाती रहती हूं, जो लोगों को काफी पसंद आती हूं.

 (ये कहानी मुंबई से ताल्‍लुक रखने वाली नताशा दिद्दी की है. फिलहाल पुणे में रहती हैं. वे एक शानदार कुक हैं. वे कई नामी रेस्तरां के लिए बतौर कंसल्टेंट काम करती हैं. इसके अलावा इंस्‍टाग्राम पर वो अपनी बनाई हुई तमाम जायकेदार खाने की तस्‍वीरें सोशल मीडिया पर पोस्‍ट करती रहती हैं. उनके  खाने के दुनिया भर मेें  दीवाने हैंं. इस बात की तस्‍दकीक उनके सोशल मीडिया से  की जा सकती है.  उनके सोशल मीडिया पर 90 हजार से भी ज्‍यादा फॉलोवर हैं, जो उनके खाने को पसंद करते हैं.)

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