#HumanStory: 'मैंने ज़िंदगी के 23 साल जेल में काटे क्योंकि मैं मुसलमान हूं'

निसारुद्दीन अहमद

19 बरस का था, जब जेल में डाल दिया गया. 23 साल बाद 'बाइज्जत' रिहा हुआ. भीतर जेल काटता था, बाहर जिंदगी काट रहा हूं. 

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(कर्नाटक के निसारुद्दीन अहमद ने 23 साल सलाखों के पीछे बिताए. उनकी गलती- वे मुसलमान थे. और उस तबके से थे, जिसमें खुद को बेकसूर साबित करना आसान नहीं था.)

जनवरी 1994 की बात है. मैं फार्मेसी में डिप्लोमा कर रहा था. हैदराबाद हाइवे से होता हुआ कॉलेज जा रहा था, तभी एक जीप को अपने पीछे देखा. मेरे रुकते ही वो भी रुक जाती. मैंने देखा लेकिन डर की कोई बात नहीं थी. आखिर एक सूने रास्ते में उन्होंने मुझे अगवा कर लिया. बंधे हाथ-पैरों और बंद आंखों के साथ किलोमीटरों का फासला तय हुआ. जब आंखें खुलीं, मैं हैदराबाद की एक सूनी बिल्डिंग में था. मैं लगातार वजह पूछता रहा लेकिन किसी ने भी कोई जवाब नहीं दिया. वे सभी सादी वर्दी में पुलिसवाले थे.

मुझे हथकड़ी लगाकर कमरे की खिड़की से बांध रखा था. नीचे कोई सरकारी दफ्तर था. किसी बिल्डिंग का काम चल रहा था. लोग आते-जाते दिखते. वे हंसते-मुस्कुराते-बोलते-बतियाते. मैं सब देख पाता लेकिन आवाज नहीं दे सकता था. अव्वल तो मेरी आवाज उनतक पहुंच नहीं पाती. दूसरे, ऐसा करता तो साथ रह रहे गार्ड खिड़की बंद कर देते.

उन दिनों वो खिड़की ही मुझे दुनिया से जोड़े रखने का अकेला जरिया थी.

कुछ वक्त तक मुझसे कोई बोला-बताया नहीं. फिर शुरू हुआ टॉर्चर का दौर. जबर्दस्ती खाना खिलाते. नींद से बेहाल हो जाता लेकिन दिन-रात जगाए रखते. पैर के तलवे पर मारते. उल्टा लटकाकर मारते. बस मारते. खिलाते. और जगाए रखते.

प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर


कभी बंदूक की नली मुंह में डालकर एनकाउंटर की धमकी देते. इन सबसे ऊपर- 15 दिन बाद मेरा फाइनल एग्जाम था. सारी तैयारी हो चुकी थी लेकिन मैं हैदराबाद की एक सूनी बिल्डिंग में पड़ा था. खूब मिन्नतें कीं. रोया कि मुझे छोड़ दें. तब उन्होंने कुछ कागजों पर साइन करने को कहा. कुछ खाली कागज थे, कुछ हाथ से लिखे और कुछ टाइप किए हुए. मैंने मना कर दिया. टॉर्चर चलता रहा. एग्जाम की तारीख निकल गई लेकिन तकलीफों का दौर बढ़ता गया.

आखिरकार मैंने बिना पढ़े कागजों पर दस्तखत कर दिए. ये दस्तखत गवाह थे मेरे उन गुनाहों के, जिनके बारे में मैं जानता तक नहीं था.

अब 46 दिनों की गैरकानूनी कस्टडी के बाद मैं हैदराबाद जेल में था. दस सालों बाद कुछ और आरोपों के साथ मैं अजमेर की सेंट्रल जेल भेज दिया गया. यहां मेरे घरवाले भी मिलने नहीं आ सकते थे.

निसारुद्दीन अहमद
निसारुद्दीन अहमद


जेल में बंद होने से भी बड़ी सजा है, बाहर परिवारवालों के दर्द का अहसास होना. वे औलाद के गम में बेहाल थे.

अब्बू कर्नाटक ट्रांसपोर्ट में कंडक्टर हुआ करते. वे काम-धंधा छोड़कर मेरी रिहाई के लिए भटकने लगे. पेशी में भाग-दौड़ करते. औलाद की तकलीफों ने उन्हें बीमार कर दिया. ईद के रोज उनका इंतकाल हुआ था. मैं मिट्टी देने भी नहीं जा सका. उसके बाद से किसी ईद पर सेवइयां उतनी मीठी नहीं लगीं. मेरे साथ के कितने ही कैदी थे, कैद के दौरान ही जिनके तमाम घरवाले चले गए. उनसे कभी कोई मिलने नहीं आ सका.

पत्थर की वो तंग कोठरी मेरा नया आशियाना थी
खुला आसमान, बड़े हवादार घर में रहने के बाद 8/8 की वो कोठरी अपने में एक सजा थी. मैं 12 नंबर वार्ड में रखा जाता. ये खतरनाक कैदियों का वार्ड था, जिनके लिए जिंदगियों के कोई मोल नहीं. ऊपर-नीचे-अगल-बगल हर ओर मजबूत पत्थरों की दीवारें थीं. कोठरी में ही एक संकरा कमोड था, जो साल में दो बार कायदे से साफ होता. हम कपड़े धोने से बचा पानी डालकर उसे साफ रखने की कोशिश करते. गंध कमरे का हिस्सा हो चुकी थी.

प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर


अखबार भी सेंसर होकर मिला करता
जेल में एक हिंदी अखबार आया करता. हम तक आते-आते दोपहर हो जाती. उसमें भी कई हिस्से कटे होते. ये वे खबरें होतीं, जो कैदियों के काम की हो सकती थीं, या जो उनके हक की बात करती हों. उस अखबार को बीच में लेकर एक पढ़ता और बाकी सुनते. क्या तो पॉलिटिक्स पढ़ो, क्या तो क्रिकेट- मन ही ऊब जाता.

कई कैदियों को अरबी और अंग्रेजी भी पढ़ाता. ऐसे में सालों पहले के अपने कॉलेज के दिन और वो एग्जाम याद आता, जो मैं दे नहीं सका.

खाने की क्वालिटी इतनी खराब होती कि हर कौर के साथ एक घूंट लेना पड़ता था. वो सिर्फ इसलिए खिलाया जाता था कि कैदी भूख से न मरें. घर पर रमजान की सहरी और इफ्तार का इंतजार रहता. जेल में सहरी के वक्त गर्म दाल में ठंडा पानी मिलाकर बंद दरवाजे से चम्मच से टपकाया जाता. वो पनीली दाल हमारी सहरी होती. उसी तरह का खाना इफ्तार.

अब घर लौटने का नहीं, कोठरी से बाहर आने का इंतजार रहता
वक्त गहराने के साथ बाहर आने की उम्मीद हल्की पड़ रही थी. अब पहले की तरह मैं रिहाई की खबर का इंतजार नहीं करता था. बस, सुबह कोठरी से बाहर निकलने की बाट जोहता ताकि तंग कोठरी में फंसे हाथ-पैर सीधे कर सकूं. हाथ-पैर जाम हो जाया करते. उन्हें हिला-डुलाकर पानी भरता और ऐसे ही छुटपुट कामों के बीच अंदर जाने का वक्त हो जाता.

आज बाहर हूं तो यकीन नहीं आता है कि उतने साल मैंने उतने से पत्थरनुमा कमरे में बिताए.

प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर


मई, 2016 की वो रात...

23 साल बाद एक कोर्ट ने दूसरी कोर्ट के फैसले को गलत करार दिया. आखिरकार. 23 साल पहले एक ने सजा सुनाई. 23 साल बाद दूसरे ने कहा, तुम बेकसूर हो. दो लोग अपनी बात बोले और बात खत्म! मेरे 23 साल खत्म हो चुके, जनाब.

रिहाई का दिन निसार को कैद से भी ज्यादा बेहतर ढंग से याद है. फोन पर बात करते हुए उनकी आवाज की भरभराहट इसकी गवाही देती है. वे याद करते हैं, नियम के मुताबिक शाम 6 से पहले रिहा होना था लेकिन मैं रात के अंधेरे में बाहर आया. चकाचौंध में कुछ समझ नहीं आ रहा था. थोड़ी दूर चला तो भाई इंतजार करता दिखा. देखता रहा. कितने सालों बाद किसी ने गले लगाया. कितने सालों बाद मैं खुलकर रोया!

रात मुसाफिरखाना में बीती. वहां पलंग था. मोटे-गुदगुदे गद्दे थे. सोया तो धंसता ही जाऊं. मुझे जेल के पत्थर याद आ रहे थे, जिनके साथ इतनी रातें कटीं.

निसारुद्दीन अहमद
निसारुद्दीन अहमद


लौटने और मेल-मुलाकातों के बाद क्या! मेरे पास न डिग्री थी और न तजुर्बा. 23 साल बाद लौटा तो तमाम दुनिया बदल चुकी थी.

वालिद गुजर चुके थे. एक वक्त पर अपने इलाके का सबसे खूबसूरत घर अब खंडहर हो चुका था. अम्मी और बड़ा भाई उसी खंडहर से मिलते-जुलते दिखने लगे थे. मेरे साथ हमारा घर भी जमाने के हिसाब से बहुत पीछे जा चुका था. मैंने कभी पेजर नहीं देखा, यहां बच्चा-बच्चा मोबाइल चलाता. वे मुझपर हंसते. तब फार्मेसी कर लेता, घर के लिए कुछ करता. कुछ सपने थे, कुछ ख्वाहिशात थीं. पूरी करता. लेकिन सब छीन लिया. अब मेरे लिए जिंदगी और जेल में फर्क खत्म हो चुका है.

लौटा तो तमाम तरह के अनुभव हुए. काम कुछ मिला नहीं. हार्डवेयर की दुकान में काम किया. कुछ वक्त सेल्समैन रहा. ड्राइविंग लाइसेंस बनवाया लेकिन टैक्सी किराए पर लेने के पैसे नहीं. अब दुकानों में जाकर, नुक्कड़ पर खड़ा होकर टोस्ट (रस्क) बेचता हूं.

बदल सकें तो कौन सी एक बात बदलना चाहेंगे!

लंबी चुप के बाद निसार कहते हैं- 'वो 23 साल वापस चाहूंगा'. 

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