#HumanStory: जींस पहनने वाली औरतें तो खूब देखी होंगी, 'साड़ी पहनने वाला मर्द' देखा है!

जयपुर के साड़ी-मैन हिमांशु वर्मा से अक्सर औरतें पूछती हैं, वे साड़ी क्यों पहनते हैं. हिमांशु का जवाब होता है- 'क्योंकि आपने पहननी बंद कर दी'. 

News18Hindi
Updated: September 6, 2018, 12:09 PM IST
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Updated: September 6, 2018, 12:09 PM IST
इंटरव्यू- कल्पना शर्मा

(मिलिए, हिमांशु वर्मा से, जिनकी जिंदगी में साड़ी की इतनी खास जगह है कि वे पिछले 13 सालों से साड़ी पहन रहे हैं.)

बात साल 2006 की है. मैंने एक प्रोजेक्ट के लिए साड़ी पहनने का इरादा किया. पहले-पहल ये प्रयोग के तौर पर किया. उस वक्त पता भी नहीं था कि साड़ी से मेरा इतना गहरा रिश्ता बन जाएगा. हिमांशु वर्मा जब ये कहते हैं तो उनकी बात में जरा भी अतिशयोक्ति नहीं होती. वे तब से लगातार साड़ी पहन रहे हैं.

हिमांशु कहते हैं, साड़ी के जरिए भारतीय सुंदरता और सभ्यता के बारे में काफी कुछ सीखने का मौका मिला. उससे जुड़े नए-नए आयामों से परिचय हुआ. धीरे-धीरे एक प्रयोग ने जिंदगी में स्थाई जगह बना ली. साड़ी पहननी सीखी. उसे परखा और उसके साथ जीना शुरू कर दिया.

देश के बड़े शहरों में किस तरह मस्कुलैनिटी यानी पौरुष के मायने बदल रहे हैं, अपने प्रोजेक्ट के जरिए हम यही सामने लाने की कोशिश कर रहे थे. इसी के तहत पहली बार साड़ी पहनी. एक दोस्त ने इसमें मेरी मदद की. परिधानों पर काफी कुछ पढ़ा था. परिधानों का लैंगिक बंटवारा बीते 200 सालों में हुआ. पहले मर्द और औरत दोनों साड़ी पहनते. दोनों ही उसमें समान रूप से सहज थे. वक्त के साथ ये यूनिसेक्सुअल परिधान औरतों तक सीमित रह गया. अब तो हाल ये हैं कि कोई धोती पहने तो वो पंडित बन जाता है, कुरता तभी पहना जा सकता है, जब कुछ खास हो. यानी सिर्फ साड़ी ही नहीं, दूसरी पोशाकें भी गिरफ्त में आ चुकी हैं.



बहुत साल साड़ी पहनीं. तब जाकर साल 2014 में साड़ी फेस्टिवल की शुरुआत की. लोगों की प्रतिक्रिया बहुत अच्छी रही. बहुत से लोग उत्सुकता में आते तो कुछ लोग अपने साथ नकारात्मक टिप्पणियां भी लेकर आते. मुझे इसकी कोई परवाह नहीं. ज्यादातर लोगों को मेरी पहल पसंद आ रही थी. तब से लगातार साड़ी फेस्टिवल देश के अलग-अलग शहरों में आयोजित किया जा रहा है. इसमें साड़ी पर शोध होती है कि कैसे वक्त के साथ इसका स्वरूप बदल रहा है.
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साड़ी-मैन सुनना कैसा लगता है
ये टाइटल मैंने ही पहली बार खुद को दिया. तब सोचा नहीं था कि ये मेरे नाम जितनी ही मेरी पहचान बन जाएगा. लोग लिखने लगे, पुकारने लगे और मैं साड़ी-मैन बतौर मशहूर होता गया. साड़ी पहनना सीखने के बाद नई-नई शैलियां सीखने लगा. अब मेरे पास अपने कई तरीके हैं जो जगह और जरूरत के हिसाब से बदलते हैं. बारिश हो रही है तो साड़ी ऊंची कर सकते हैं. व्यस्त बाजार में जा रहे हैं तो कमर पर बेल्ट की तरह बांध सकते हैं. पर्सनलाइज स्टाइल बना सकते हैं. बस एक बार साड़ी की भाषा सीख लें तो ये बातें अपने-आप ही समझ आ जाती हैं.

साड़ी पहनकर बाहर जाता हूं तो कई बार लोग हंसते भी हैं. इससे फर्क नहीं पड़ता. साड़ी को दो टुकड़ों में काटें तो वो धोती बन जाती है. मैं अपने पारंपरिक परिधान से जुड़ा हूं और मुझे किसी की प्रतिक्रिया की परवाह नहीं.

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