Human Story: इस रिसेप्शनिस्ट की नॉलेज देख दंग रह गए थे डॉक्टर्स, जापान से पूरा किया कैंसर रिसर्च का सपना

अपनों की मौत आपको जिंदगी भर का गम देकर जाती है. वो भी असमय मौत हमेशा मरने वाले के पीछे रह गए लोगों का ताउम्र का सदमा देकर चली जाती है. मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था.

Nandini Dubey | News18Hindi
Updated: January 10, 2019, 8:23 AM IST
Human Story: इस रिसेप्शनिस्ट की नॉलेज देख दंग रह गए थे डॉक्टर्स, जापान से पूरा किया कैंसर रिसर्च का सपना
अपनों की मौत आपको जिंदगी भर का गम देकर जाती है. वो भी असमय मौत हमेशा मरने वाले के पीछे रह गए लोगों का ताउम्र का सदमा देकर चली जाती है. मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था.
Nandini Dubey | News18Hindi
Updated: January 10, 2019, 8:23 AM IST
अपनों की मौत आपको जिंदगी भर का गम देकर जाती है. वो भी असमय मौत हमेशा मरने वाले के पीछे रह गए लोगों का ताउम्र का सदमा देकर चली जाती है. मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. जब एक हंसती खिलखिलाती जिंदगी एक पल में बिखर गई थी.

आज भी याद करता हूं तो आंखें आंसूओं से भर जाती हैं. दरअसल उन दिनों मैं आराम से अपनी जिंदगी गुजर-बसर कर रहा था. पापा खेती करते थे. हम दोनों भाई पढ़ते थे. उस वक्‍त मैं सातवीं क्‍लास में था. हालांकि मेरा पढ़ाई में दिल कम ही लगता था. मगर तभी एक दिन बड़ी मम्‍मी यानी कि ताई की तबियत खराब हो गई. इलाज शुरू हुआ तो उन्‍हें ‘ब्‍लड कैंसर’ निकला. कैंसर आखिरी स्‍टेज में था. कुछ ही दिनों में उनकी मौत हो गई. बड़ी मम्‍मी की मौत ने मेरे पर दिमाग गहरा असर किया. मैं बहुत दुखी तो हुआ ही. इसके साथ-साथ मैं परेशान रहने लगा.





सोचने लगा कि कैसे एक बीमारी ने मेरी बड़ी मम्‍मी की जिंदगी ही उनसे छीन ली. एक पल में ही वो हमको छोड़कर चली गईं. ये सब सोच-सोचकर मैं बहुत परेशान रहने लगा था. यहीं से मैंने सोचा कि बस अब तो इस मर्ज से लड़ने के लिए खुद ही कुछ करना है. कुछ तो ऐसा करना पड़ेगा कि जिससे अब और लोगों की जिंदगी बचा सकूं. बस यहीं से मैंने तय कर लिया था कि कैंसर के मर्ज पर कुछ करना है. किसी भी बीमारी से लड़ने के लिए जाहिर है कि अच्‍छी पढ़ाई करनी जरूरी होती है. इसके बिना तो आप कुछ नहीं कर सकते.

इसीलिए मैंने तय किया कि अब भले मेरा दिल न लगे पढ़ने में लेकिन अब मैं अच्‍छी पढ़ाई करुंगा. उसके बाद से मैंने पढ़ाई में दिल लगाना शुरू कर दिया. इसके बाद मेरे दसवीं में अच्‍छे मार्क्‍स आए. फिर बारहवीं में भी मैंने अच्‍छे नंबर पाए. मगर इसके बाद की पढ़ाई कराने के लिए मेरे पापा के पास पैसे नहीं थे. वे चाहकर भी मेरी मदद नहीं कर सकते थे. इसलिए मैंने उन्‍हें कोलकाता आकर कोई नौकरी करने का निर्णय लिया. घर में नौकरी और अपने उद्देश्‍य के बारे में बताया तो मम्‍मी-पापा भी बहुत ज्‍यादा फिक्र में पड़ गए. लेकिन फिर मान भी गए. मैं यहां आ गया.



यहां आकर मैंने हॉस्‍पटिल में एक रिसेपशनिस्‍ट की जॉब शुरू कर दी. यहां जॉब के साथ-साथ मैं डॉक्‍टरों से पूछता रहता था कि कौन सी कौन बीमारी किस वजह से हो जाती है? जब भी डॉक्‍टर किसी का इलाज करते. कुछ लिखते, मरीजों से कुछ पूछते हर चीज को बहुत गौर से सुनता. हर बीमारी को डायरी पर नोट कर लेता था. खासतौर पर कैंसर से संबंधित. फिर घर आकर हर छोटी-मोटी बड़ी बातों को इंटरनेट पर सर्च करता. यूट्यूब पर वीडियो देखता. इस तरह से मैं कुछ बातें जानने लगा था. रोज रात में वीडियो देखता और सुबह उठकर मैं डॉक्‍टर से अलग-अलग सवाल करता.
Loading...

एक वक्‍त ऐसा आ गया था कि मेरी नॉलेज को देखकर डॉक्‍टर्स भी दंग रह गए थे.उन्‍होंने भी सोचा कि एक रिसेप्‍शनिस्‍ट को इतनी बारीक नॉलेज कैसे है? इसके बाद वो मेरे सवालों के जवाब देने लगे थे. वो मुझे छोटी-छोटी चीजें बताते थे लेकिन इस नौकरी से मैं कुछ हासिल नहीं कर पाऊंगा. इसलिए मैंने कुछ और सोचा टाटा कैंसर हॉस्‍पटिल में टेलीफोन ऑपरेटर के लिए अप्‍लाई किया था. यहां भी मैं यही करता था. डॉक्‍टरों से खूब पूछता. अलग-अलग बीमारियों पर बात करता था. यहां के डॉक्‍टर  मुझे बताने लगे थे.

Human Story: उस दिन अगर मैंने जींस न पहनी होती तो शायद अब तक मर चुकी होती   

इस तरह मेरी नॉलेज तो धीरे-धीरे बढ़ रही थी लेकिन बात यही थी कि अब भी अपने मकसद से दूर था. इसलिए मैंने आगे की पढ़ाई करने की ठानी लेकिन मुश्‍किल ये थी कि मैं कोलकाता यूनिवर्सिटी से पढ़ नहीं कर सकता था. दरअसल वहां दो साल का गैप होने की वजह से रेग्‍यूलर एडमिशन नहीं मिलता. इसलिए मैंने इंटरनेट पर खोजा कि कहां दो सालों के गैप में बीएससी में एडमिशन ले सकता हूं. इसलिए मैंने कानपुर के आने का ठान लिया. सोच तो लिया था कि बात वही थी कि आखिर इतने पैसे कहां से आएंगे? क्‍योंकि कोर्स की फीस 65 हजार रुपये थी. मेरे पास इतने पैसे नहीं थे. साथ ही जॉब छोड़नी पड़ी थी. पापा को जब ये बात पता चली तो उन्‍होंने मेरी लगन देखकर कुछ  खेती बेचकर मुझे पैसे दिए.



यहां मैंने कानपुर यूनिवर्सिटी से पैरामेडिकल साइंस में एडमिशन ले लिया. पढ़ने के साथ-साथ  मैं काकादेव की कोचिंग में बॉयोलाजी की क्‍लास लेने लगा. हालांकि पहले कोई टीचर मुझे जॉब पर रखने को तैयार नहीं था लेकिन बाद में आदर्श सर मेरी नॉलेज देखकर मान गए. अब मेरी रूकी हुई पढ़ाई शुरू हो गई थी. मगर अब भी अपने लक्ष्‍य से दूर था. इसीलिए मैंने अब आईआईटी के बॉयोटेक्‍नो लॉजी के प्रोफेसर डॉ. प्रदीप सिंहा को अप्रोच किया. वो जिस सब्‍जेक्‍ट पर रिसर्च कर रहे थे उसी से संबंधित एक टॉपिक पर उनको एक सब्‍जेक्‍ट एक टॉपिक लिखकर उन्‍हें पसंद आया तो उन्‍होंने मुझे रिसर्च कराने के लिए तैयार हो गए थे.

Human Story: कल तक जो मुझे नचनिया कहते थे, आज उनके बच्चे मेरे साथ सेल्फी को तरसते हैं..   

यहां आकर मैं उनके साथ कैंसर के उस सब्‍जेक्‍ट पर काम करने लगा, जिस पर करना चाहता था. दरअसल प्रोफेसर सिन्‍हा एक कैंसर की उस सेल्‍स पर काम कर रहे थे, जिसमे ये पता लगाया जाता है कि एक सर्जरी के बाद दोबारा कैंसर कैसे हो जाता है. मैं उनके साथ रिसर्च करने लगा. यहां मैंने बहुत कुछ सीखा.

इसके बाद मैंने दिल्‍ली के ऑल इंडिया इंस्‍टीयूट ऑफ मेडिकल साइंस में मास्‍टर डिग्री के लिए अप्लाई  किया.मेरा सेलेक्‍शन हो गया. मास्‍टर डिग्री लेने के दौरान ही दिल्‍ली में मिनस्‍ट्री साइंस ऑफ फैलोशिप का फॉर्म सामने आ गया. मैंने उस फैलोशिप के लिए अप्‍लाई कर दिया. मेरा सेलेक्‍शन हो गया. मैं छह महीने के लिए जापान चला गया. वहां से रिसर्च के बाद अब मैं पश्‍चिम बंगाल के कल्‍याणी शहर में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल जेनोमिक में सीनियर रिसर्च फैलो कर रहा हूं. मुझे लगता है कि जल्‍द ही अपने मकसद में कामयाब हो पाऊंगा.

(ये कहानी पश्‍चिम बंगाल के बुधुपुरा से ताल्‍लुक रखने वाले शोवेन आचार्य की है. वे एक कृषि परिवार से ताल्‍लुक रखते हैं. बचपन में कैंसर की वजह से ताई की असमय मौत से शोवेन को बहुत दुख हुआ. उनके दिमाग पर  ताई की मौत ने गहरा असर छोड़ा. इसके बाद उन्‍होंने ठान लिया था कि वो कैंसर जैसी बीमारी से लड़ेंगे. इसी संबंध में  वे पहले आइआइटी कानपुर और जापान से रिसर्च करके लौटे शोवेन फिलहाल बतौर सीनियर रिसर्च फैलो कैंसर जैसी बीमारी से लड़ने में जुटे हैं.)

(इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human stories पर क्लिक करें.)

एक क्लिक और खबरें खुद चलकर आएगी आपके पास, सब्सक्राइब करें न्यूज़18 हिंदी  WhatsApp अपडेट्स     
Loading...

और भी देखें

पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...