#HumanStory: लेखक बनने का है सपना, कैंसर से जूझते हुए 15 साल की उम्र में लिखी किताब

अब मैं दसवीं के छात्र से कैंसर का मरीज बन चुका था. हिंदी, इंग्‍लिश, साइंस और मैथ्‍स के नोट्स को याद रखने की जगह अलग-अलग एंटीबायोटिक्‍स के नाम रटने लगा था.

Nandini Dubey | News18Hindi
Updated: February 11, 2019, 2:32 PM IST
#HumanStory: लेखक बनने का है सपना, कैंसर से जूझते हुए 15 साल की उम्र में लिखी किताब
तुषार ऋषि तस्‍वीर फेसबुक से साभार
Nandini Dubey | News18Hindi
Updated: February 11, 2019, 2:32 PM IST
मुझे वो दिन आज भी अच्‍छी तरह याद है.उस दिन मम्‍मा ने कहा था कि तुम्‍हारा स्‍कूल खत्‍म होने के बाद हम सीधा डॉक्‍टर के पास चलेंगे. मैंने हामी भी भर दी थी. उस दिन क्‍लास में कुछ बेचैनी महसूस हो रही थी. अंदर ही अंदर डर खाए जा रहा था कि पता नहीं डॉक्‍टर क्‍या कह देंगे? न जाने मुझे क्‍या बीमारी निकलेगी. आखिर इतने दिनों से मुझे दर्द क्‍यों हो रहा है? इन सभी सवालों के जवाब मुझे जल्‍द से जल्‍द जानने थे. इसलिए मैं बस उस दिन शिद्दत से बस छुट्टी का इंतजार कर रहा था.

मैं ये सब सोच ही रहा था कि फाइनली सारे पीरियड खत्‍म हो गए और छुट्टी हो गई. मम्‍मा स्‍कूल के बाहर  मेरा इंतजार ही कर रही थीं. हम सीधा वहां से निकलकर डॉक्‍टर के पास पहुंच गए. काफी देर जांच-पड़ताल के बाद उन्‍होंने बताया कि कुछ गड़बड़ है. फिर उन्‍होंने तमाम तरह के टेस्‍ट लिख दिए. कुछ दिनों के बाद जब टेस्‍ट का रिजल्‍ट आया तो डराने वाला था. मालूम पड़ा कि मुझे बांये घुटने में कैंसर हैं. ये सुनकर मम्‍मी-पापा तो डर गए थे. मम्‍मा तो इस कदर परेशान हो गईं कि वहीं मेरे आगे रोने लगीं. बाद में उन्‍होंने देखा कि मैं कमजोर पड़ जाऊंगा. इसलिए उन्‍होंने खुद को संभाला. वहीं मेरी हालत को तो बयां करना मुश्‍किल है.

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अब बीमारी के सामने आने के बाद तो सब कुछ एक झटके में बदल चुका था. अब मैं दसवीं के छात्र से कैंसर का मरीज बन चुका था. हिंदी, इंग्‍लिश, साइंस और मैथ्‍स के नोट्स को याद रखने की जगह अब मैं अलग-अलग एंटीबायोटिक्‍स के नाम रटने लगा था. रांची से हम लोग इलाज के लिए दिल्‍ली आ गए थे. यहां  क्‍लास और कोंचिग की जगह अब दिल्‍ली के एम्‍स अस्‍पताल के एक वार्ड ने ले ली थी. यहां मैं एक कमरे में कैद हो चुका था, जहां चारो तरफ दवाईयों की महक से मेरा सिर फटता था.लगातार बड़ी-बड़ी मशीनों के कभी कोई टेस्‍ट तो कभी कुछ और जांच. अब यही मेरा डेली रूटीन हो चुका था. उस पर रिलेटिव्‍स आते थे और मुझ पर सहानुभूति जताते थे. एक पल को तो मैं खुद को भी बेचारा समझने लगा था.

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इसी बीच शुरू हो गया था दर्द का खत्‍म नहीं होने वाला सफर.कीमोथैरेपी के वो भयानक ग्‍यारह महीने शुरु हो चुके थे. इस दौरान मेरे शरीर में सुई से चुभने वाली तमाम सुईयां लगा दी गई थीं.डॉक्‍टर और नर्स  कुछ-कुछ घंटों में इंजेक्‍शन लगाते रहते थे. दवाईयों के अलावा कभी-कभी मुझे बहुत दिक्‍कत होती थी.  कभी पेट दर्द तो कभी उल्‍टी जैसी समस्‍या हो जाती थी. अस्‍पताल में अजीबो-गरीब ख्‍याल आने लगे थे. कभी-कभी रात में जाग उठता था. मै अपने आप से लड़ने की भरपूर कोशित तो कर रहा था. मगर मैं हार रहा था. जैसे- तैसे खुद को ठीक रखता तो  लोग एम्‍स में आने वाले तरह-तरह के मरीज को देखकर मैं कभी-कभी बिलख कर रोने लगता था. उनकी हालत मुझसे देखी नहीं जाती थी.
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तुषार ऋषि


देखकर बुरा लगता था कि कैसे लोग तरह-तरह की बीमारियों के शिकार हैं. कैसे वो भयानक से भयानक बीमारियों से लड़ रहे हैं. मैं  इस दौरान खुद को तो एक पल के लिए भूल ही जाता था. बेचैन हो उठता था. इन हालातों से निकलने के लिए और खुद को शांत रखने के लिए मैं एक रास्‍ता तलाश रहा था

इसी दौरान मुझे याद आया कि मुझे अपनी हॉबी पर ध्‍यान दिया. दरअसल मुझे पढ़ने और लिखने का बहुत शौक था. इसीलिए मैंने अपने हॉस्‍पटिल के रूम और बेड को किताबों से सजा लिया था, जब भी मुझे आराम मिलता या दर्द रहता मैं बस किताब उठकार पढ़ने लगता था. इससे मुझे बहुत राहत मिलती. कुछ पल के लिए मैं एक अलग ही दुनिया में चला जाता था, जहां मुझे सुकून मिलता था. उसके बाद मैंने केवल पढ़ना ही नहीं लिखना भी शुरू कर दिया था. मैंने कीमोथैरेपी के ग्‍यारह महीनों के अनुभव को एक किताब की शक्‍ल दे दी. इस तरह से मेरे वो दर्दनाक महीने गुजर गए.  ये बात जब मेरे पैरेंट्स को पता चली तो वे बेहद खुश हुए. इसके बाद मैंने किताब को पब्‍लिश करने का ठाना. इसके लिए मैंने ऑनलाइन पब्‍लिशर की तलाश की. कुछ लोगों के मना करने के बाद एक पब्‍लिशर मान गए.

बस फिर क्‍या था.  इधर मेरी किताब पब्‍लिश होकर आ गई. वहीं एक साल बाद वापसी करके दसवीं का एग्‍जाम दिया और 10 सीजीपीए हासिल किए, फिर 12वीं की परीक्षा में मैंने 95 प्रतिशत अंक तक जा पहुंचा. आज मैं ग्रेजुएशन कर रहा हूं. भविष्‍य में बस लेखक बनने की ख्‍वाहिश है.

 ( ये कहानी रांची से ताल्‍लुक रखने वाले तुषार ऋषि की है. तुषार फिलहाल डीयू में इंग्‍लिश से ग्रेजुएशन कर रहे हैं. मगर जब वे दसवीं क्‍लास में थे, उस वक्‍त उन्‍हें  बांये घुटने में  कैंसर हो गया था. कैंसर से जूझ रहे तुषार ने हिम्‍मत नहीं हारी. 11 महीने तक चलने वाले कीमोथैरेपी के दर्दनाक इलाज से  न केवल वे मजबूती से खड़े रहे, बल्‍कि अपने मुश्‍किल भरे सफर को शब्‍दों  में पिरोकर एक किताब की शक्ल भी दे दी. उनकी किताब का नाम  है 'द पेंशट पेंशट.' उनकी ये किताब पब्‍लिश भी हो चुकी है.)
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