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#Human Story: व्‍हीलचेयर पर जिंदगी, फिर भी लोगों को अपनी धुन पर नचाता है ये डीजे

#Human Story: व्‍हीलचेयर पर जिंदगी, फिर भी लोगों को अपनी धुन पर नचाता है ये डीजे

वरुण खुल्‍लर

वरुण खुल्‍लर

ढाई साल तक मैं दूसरों पर मोहताज था मगर आज मैं लोगों को नचाता हूं.

कहते हैं न कि सब साथ छोड़ जाएं लेकिन अगर अपने आपके साथ हैं तो आप बड़ी से बड़ी मुश्‍किल से भी निकल जाते हैं. मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही रहा. हालांकि कभी-कभी मां और भाई मेरी हालत देखकर परेशान हो जाया करते थे. मगर फिर मैं उन्‍हें हिम्‍मत बंधाता तो उन लोगों के भीतर भी हिम्‍मत आ जाती थी.

हां ये अलग बात है कि कभी-कभी मैं खुद बुरी तरह टूट जाता था. समझ नहीं पाता था कि अब करूंगा तो क्‍या? एक झटके में पूरी जिंदगी बदल चुकी थी. याद आता है वो दिन, उस वक्‍त मैं कितना खुश था. दिल्ली यूनिवर्सिटी से फॉरेन ट्रेड और इंटरनेशनल प्रैक्टिस में ग्रैजुएशन करने के बाद मॉस कम्‍युनिकेशन में मास्‍टर डिग्री हासिल कर चुका था. पत्रकार बनना चाहता था.

वरुण खुल्‍लर


एक कंपनी में इंटर्नशिप भी पूरी हो चुकी थी. जल्‍द ही जॉब लगने वाली थी. इस खुशी में दोस्‍तों के साथ हमने मनाली जाने का प्‍लान किया था. हम रास्‍ते में ही थे कि अचानक हमारी कार के सामने एक ट्रक आया और उसके बाद क्‍या हुआ मुझे कुछ नहीं पता. आंख खुली तो हॉस्‍पटिल में था. कई घंटों चले आपरेशन के बाद पता चला कि मेरे दोनों पैर खराब हो चुके थे.

अब मैं दूसरों पर मोहताज हो चुका था.एक आम इंसान नहीं था. लोगों की नजर में बेचारा था. एक कमरे और चार दीवारे मेरी दोस्‍त  थीं. दो से ढ़ाई सालों तक तो मैंने एक कमरे की बाहर दुनिया को देखा ही नहीं था. हां बस निकलता था तो केवल कुछ घंटों के लिए. वो भी तक जब मैं फिजियोथैरेपी के लिए निकलता था. इसके अलावा बस घर पर ही रहता था. बहुत कोफ्त होती थी कभी-कभी सोचता कि आखिर मैं जिंदगी के किस मोड़ पर आ पहुंचा.

वरुण खुल्‍लर


मगर मैंने ठान लिया था कि मुझे ऐसे हालत में नहीं रहना है. इसलिए बस कोशिश करता रहता था  कि कैसे भी करके मैं इन परिस्थितयों से खुद को बाहर निकाल सकूं. मैंने सोचा कि क्‍यों न बचपन की दबी हुई इस ख्‍वाहिश को पूरा करने का शायद ये सही वक्‍त है. दरअसल मैं बचपन से ही डीजे बनना चाहता था, लेकिन परिवार वाले ऐसा नहीं चाहते.

उनकी ख्‍वाहिश थी कि मैं अपनी पढ़ाई पूरी करूं. उनकी सोच गलत भी नहीं थी, क्‍योंकि हम जिस सोसाइटी में रहते हैं. वहां इस तरह के किसी भी प्रोफेशन को अपनाना सही नहीं समझा जाता. आज भी हम लोग कुछ सेट प्रोफेशन को ही बेस्‍ट करियर ऑपश्‍न मानते हैं. मगर मैंने सोच लिया था कि बस अब जो कुछ भी हो जाए, मैं पीछे नहीं हटूंगा. शायद इससे बेहतर मुझे दूसरा कोई वक्‍त नहीं मिलेगा.

बस फिर क्‍या था यूट्यूब से मैंने म्‍यूजिक की बारीकियां सीखनी शुरू कर दीं. मेरे भाई ने मुझे कुछ बुक्‍स लाकर दीं, जिन्‍हें भी दिन भर बिस्‍तर पर बैठे-बैठे पढ़ता रहता था. इसके अलावा दिन-रात देश और दुनिया के म्‍यूजिक को सुनता था. मगर मुझे लगा कि मैं सीख तो रहा हूं लेकिन क्‍या जो कुछ भी मैं सीख रहा हूं वो ठीक है. इसके लिए मैंने उसके बाद आईएलएम अकैडमी गुड़गांव को ज्‍वाइन  कर लिया. बस यहां से संगीत की बारीकियां सीखने के बाद मैंने जॉब ढूंढना शुरू कर दिया.

वरुण खुल्‍लर


यहां तक आगे बढ़ने के बाद आखिरकार फिर मैं फिर काफी पीछे हो चुका था. उसकी वजह थी कि मैं जहां-जहां भी जॉब के लिए जाता था लोग मुझे रिजेक्‍ट कर देते थे. मुझे बेचारा समझते थे. मुझे घर पर रहने की सलाह देते थे या फिर कहते थे कि आप चल-फिर नहीं सकते. आपको सीढ़ियों से ऊपर  लेकर कौन आएगा? आपको जॉब देने का मतलब है कि आपके लिए अलग से एक आदमी रखना पड़ेगा. इस तरह की अलग-अलग बातें सामने आती थीं. ये सब कुछ सुनकर कई बार बहुत रोना आता था. मगर मैं बस चुप रहता था. शांत रहता था.

हालांकि कई बार  मेरी हालत देखकर मेरा परिवार भी बहुत दुखी हो जाता था. मगर फिर मैं उन्‍हें हिम्‍मत बंधाता था. फिर कुछ दिनों के बाद इंतजार, लगन और मेहनत तीनों रंग लाए और मुझे एक अच्‍छी जॉब मिल गई. आज मैं डीजे आमिष बनकर जब फ्लोर पर पहुंचता हूं तो कोई भी अपने पैरों को थिरकने से नहीं रोक पाता.

(ये कहानी भारत के दिल्‍ली से ताल्‍लुक रखने वाले वरुण खुल्‍लर की है. तीन साल पहले एक सड़क हादसे में वरुण के दोनों पैर खराब हो गए थे. इस हादसे ने उनको और उनके पूरे परिवार को बुरी तरह तोड़ दिया था. मगर उन्‍होंने कभी हार नहीं मानी. वे उन कठिन हालातों से जूझते रहे. साथ ही अपने पैशन को फॉलो किया. इसका ही नतीजा है कि आज वे दिव्‍यांग डीजे बन गए हैं. अपनी धुनों पर  सबको नचाते हैं) 

(इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human story पर क्लिक करें.)   

Tags: Delhi news, Human Stories, Human story, Lifestyle

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