कूड़ा बीनते और सड़कों पर सोते हुए सोचा नहीं था, एक रोज़ कैमरा लटकाकर दुनिया घूमूंगा

रेलवे स्टेशन पहुंचा तो दिल्ली के लिए ट्रेन लगी देखी. मैं बैठ गया. जेब चुराए हुए सिक्कों से भरी हुई थी. कबाड़ी का काम करते, प्लेटफॉर्म पर सोते और ढाबे में बर्तन धोते हुए कैमरा थामा. कूड़ा बीनते हुए तस्वीरें बुनना आसान नहीं था. दास्तां, विकी रॉय की जो आज जाने-माने फोटोग्राफर हैं.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 31, 2018, 8:19 AM IST
कूड़ा बीनते और सड़कों पर सोते हुए सोचा नहीं था, एक रोज़ कैमरा लटकाकर दुनिया घूमूंगा
फोटोग्राफर विकी रॉय
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 31, 2018, 8:19 AM IST
कहानी शुरू होती है बंगाल के पुरुलिया से. गरीब बंगाली परिवार में जन्मा. पिता दर्जी थे और मां घर-बच्चे संभालती. मेरे अलावा 6 और भाई-बहन थे. पिता रोज एक ही सपना देखते कि उनके बच्चे 10वीं पढ़ सकें. ये सपना आंखों के लिए काफी बड़ा था- लगभग नामुमकिन-सा. यहां अपने घर पर भरपेट खाना भी मयस्सर नहीं था. टेलर मास्टर कहलाते पिता ने तंग आकर आखिर एक रोज मुझे ननिहाल छोड़ दिया. पहले तो मैं उनके लौटने का इंतजार करता रहा, फिर जाना कि अब मुझे यहीं रहना होगा.

नानी के घर पर खाना पूरा मिलता लेकिन बात-बात पर मार-पीट होती. मैं छुट्टियों में नानी-घर नहीं आया था, हमेशा के लिए आ चुका था और इसीलिए मैं और बच्चों से अलग था. एक रोज खूब मार खाने के बाद मैंने घर से भागने का फैसला लिया. उम्र तकरीबन 10 साल रही होगी. मैंने रात होने का इंतजार किया. मामा की जेब से पैसे चुराए और घर से निकल भागा. स्टेशन पहुंचा तो दिल्ली जाने वाली ट्रेन लगी दिखी. मैं दौड़कर उसी में बैठ गया.

दिल्ली से मेरा पहला साक्षात्कार...
इतना बड़ा स्टेशन पहली बार देखा था. इसमें मेरा पूरा गांव समा जाता. मैं यहां-वहां घूमता रहा, जब तक थक नहीं गया. भूख लग आई थी लेकिन किसी दुकान पर जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी. मैं रोने लगा. रोते हुए भटकने लगा, तभी कुछ बच्चों ने मुझे घेर लिया. वे भी मेरी तरह घर से भागे हुए बच्चे थे लेकिन तजुर्बे में मुझसे आगे थे. किसी-किसी को यहां रहते सालों हो चुके थे. मैं उन्हीं के साथ रहने लगा.

घर पर रहने और भात-मछली खाने वाला बच्चा अब सड़कों पर सोता.



कई काम आजमाए लेकिन फिर कूड़ा बीनने का काम मुफीद लगा. मैं साथी लड़कों के साथ स्टेशन पर घूमता और बोतलें जमा करता. उन बोतलों में ठंडा पानी भरकर जनरल बोगी में पांच रुपए में बेचते. यहां भीड़ के कारण लोग बाहर नहीं निकल पाते हैं, वे हमारी खुली हुई बोतलें खुशी से खरीदते. दिन तो काम करते, कमाते बीत जाता लेकिन रात में काफी दिक्कत होती. घर के भीतर सोने वाले लोग कल्पना भी नहीं कर सकते कि बेघर लोगों की रातें कितनी किस कदर भयावह होती हैं. सड़कों का अंधेरा घरों की तरह सांवला नहीं होता, वो खुलकर सामने आता है. प्लेटफॉर्म पर सोते तो पुलिसवाले मारकर भगाते. कभी कोई पैसेंजर शक शिकायत कर देता. पूरी रात की नींद बमुश्किल ही मिलती थी. धीरे-धीरे मैं गारबेज स्टोर में जाकर सोने लगा.

काफी वक्त तक मैं स्टेशन पर कूड़ा बीनने का काम करता रहा. फिर वहां से उकताकर ढाबे की तरफ रुख किया. आज भी याद है, अजमेरी गेट का वो सीलनभरे किचन वाला ढाबा. लोग लगातार आते रहते. मैं लगातार काम करता. अलसुबह जागकर सब्जी काटने, दोपहर में खाना परोसने और पूरा दिन बर्तन धोने का काम. रात में 12 बजे ही हाथ रुकते. शरीर थकान से चूर रहता लेकिन दर्द के कारण नींद भी नहीं आती थी. वो वक्त सबसे मुश्किल था. हाथ -पैरों में बर्तन धोने के कारण घाव ही घाव थे, उनसे खून रिसता रहता. तब लगता कि मैं घर से भागा ही क्यों.



फिल्मों में देखा था कि लोग शहर जाकर अमीर हो जाते हैं लेकिन मैं कमजोर और बीमार हो रहा था. एक रोज एक एनजीओ की मार्फत स्कूल में भर्ती हुआ. पढ़ने-लिखने लगा और यहीं से जिंदगी ने पलटा खाया. 10वीं के बाद फॉर्मल ट्रेनिंग के लिए मैंने सिलाई-बुनाई या कुकिंग की बजाए फोटोग्राफी चुनी. ट्रेनिंग के बाद मुझे प्लास्टिक का एक कैमरा मिला. उसे लटकाए घूमता और 5 रुपए में तस्वीरें खींचता. संस्था की ही मदद से मुझे एक फोटोग्राफर को असिस्ट करने का काम मिला. वहीं पहुंचकर लोन लेकर अच्छा कैमरा लिया. असिस्ट करने के लिए तो पगार मिलती थी लेकिन शौक पूरा करने को नहीं. मैं काम के बाद पार्ट-टाइम करने लगा. शादियों में लाइटें लेकर चलता, वेटर का काम किया, कहीं सब्जियां काटीं. जो पैसे मिलते, उनसे कैमरे के रोल लेता.

साल 2007 में एक प्रदर्शनी में असिस्टेंट का काम कर रहा था. तभी किसी ने अपनी प्रदर्शनी लगाने की सलाह दी. उसने अपना ई-मेल आईडी दिया और बजट बनाकर भेजने को कहा. फोटो खींचना जानता था लेकिन ई-मेल करना! मैं एक ऐसे लड़के को जानता था, जो अंग्रेजी में मेल कर सकता था. उसे पकड़ा, 20 रुपए का लालच दिया और उसने मेरे नाम पर मेल कर दिया. तब स्ट्रीट ड्रीम्स के नाम से मेरी पहली प्रदर्शनी लगी. इन तस्वीरों में वही बच्चे थे, जो सड़कों पर, रेड-लाइट पर, प्लेटफॉर्म पर रहते.
इन्हीं अनाम बच्चों ने मुझे पहचान दिलाई.



कूड़ा बीनने वाला लड़का मैनहटन के अपार्टमेंट में रहता
पिता किसी और की दुकान के आगे सिलाई मशीन लगाते. भूख की मार ने मुझे घर से भागने को मजबूर कर दिया. रेलवे स्टेशन पर रहा. ढाबे में बर्तन धोए. कभी सोचा भी नहीं था कि कैमरे का फ्लैश मेरी जिंदगी को ऐसे बदल देगा. जोड़ से जोड़ बुनते गए और मुझे वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का रिकंस्ट्रक्शन शूट करने न्यूयॉर्क बुलाया गया. भारत से मैं अकेला ही था. हर बात पर डरता. सबसे बड़ा डर अंग्रेजी न आना था. वहां पहुंचा तो देखा कि काम सीखने या करने के लिए अंग्रेजी आना जरूरी नहीं. मेरे साथ जापान से, योरोप से फोटोग्राफर थे, जिनकी अंग्रेजी मुझसे भी कमजोर थी. मैं मन लगाकर काम करने लगा. मैनहटन में फ्लैट मिला और इंटरनेशनल सेंटर फॉर फोटोग्राफी में एडमिशन. काम के साथ पढ़ाई भी करता.

पहली बार साल 2005 में फ्लाइट में बैठा था. 15 जून. दिल्ली से बैंगलोर. खूब संभालकर बोर्डिंग पास रखा. दो सालों तक बोर्डिंग पास जमा करता रहा, फिर यकीन हो गया कि ये मैं ही हूं और ये मेरी ही किस्मत. अब ई-मेल लिखने के लिए किसी दोस्त की मनुहार नहीं करता.

महंगा कैमरा लटकाकर देश-विदेश घूमते इस विकी को देखकर भला कौन जान सकेगा कि कितनी रातें वो भूख से जागा है!

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