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#HumanStory: पीट-पीटकर मार दिया गया था अलीमुद्दीन, सालभर बाद भी 'डेथ सर्टिफिकेट' के लिए भटक रही बेवा

मरियम खान

'बस यही पता नहीं चल रहा कि मौत कहां हुई. दुख क्या मनाऊं! थाना-अस्पताल के चक्कर काट रही हूं. डेथ सर्टिफिकेट मिले तो घर में खाने के पैसे आएं. भात खाते सालभर हुआ.'

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    सालभर पहले 29 जून को गौमांस लाने-ले-जाने के शक में भीड़ ने अलीमुद्दीन को पीट-पीटकर मार दिया था, उसकी बेवा मरियम खान तब से शौहर के मृत्यु प्रमाणपत्र के लिए भटक रही है. अस्पताल वाले थाने भेजते हैं, थाने वाले अस्पताल. सर्टिफिकेट नहीं है. न तो बैंक से पैसे निकल पा रहे हैं और न ही बीमा की सुविधा का लाभ मिल सका है. महीनों पहले मिले मुआवजे के आश्वासन का भी अब कहीं जिक्र नहीं.

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    पोस्टमार्टम रिपोर्ट लेकर रांची गए तो रिम्स (राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़) वालों ने मृत्यु प्रमाणपत्र देने से इन्कार कर दिया. उनका कहना है कि अस्पताल में तो बॉडी लाई गई है. मौत तो पहले ही हो चुकी थी. अस्पताल अपनी तरफ से जो कर सकता था, उसने किया. यानी पोस्टमार्टम रिपोर्ट देना.

    अस्पताल से मरियम रामगढ़ थाने पहुंचीं. वहां भी थाना प्रभारी ने सर्टिफिकेट जारी करने से मना कर दिया. उनका कहना है कि जब भीड़ की हिंसा से बचाया गया तब अलीमुद्दीन की सांस चल रही थी. 'शायद' अस्पताल ले जाते हुए गाड़ी में उसकी मौत हो गई. तब मृत्यु प्रमाणपत्र भला कैसे दिया जा सकता है!



    पति की मौत के कुछ समय बाद से ही यहां-वहां के चक्कर काट रही मरियम पूछती हैं, 'किसी को पता ही नहीं कि मौत कहां हुई. कोई प्रमाणपत्र देने को तैयार नहीं. ऐसे में मरहूम का परिवार क्या करे? हम हर जगह जाकर गिड़गिड़ाते हैं. डॉक्युमेंट्स पूरे दे रहे हैं, फिर भी सालभर से घूम रहे हैं'.

    अलीमुद्दीन ड्राइवर का काम करते थे. तब भला गौ-मांस तस्करी का आरोप क्योंकर लगा? आग होती है, धुआं भी तभी उठता है! पीड़ित परिवार इस तरह के तमाम संदेहों से रोज गुजरता है. भलमनसाहत से पूछते हुए भी हर कोई थोड़ा-सा शक जता ही जाता है. 'अब इसका असर नहीं होता. शौहर जिस मारूति कार में ड्राइवरी करते थे, गुस्साई भीड़ ने उसे भी जला दिया. घर में हम पति के लिए रोते हैं. कोर्ट में तो गाड़ी के लिए भी रोए. साहब लोग कहे कि 2 महीने के भीतर मुआवजा मिलेगा लेकिन सालभर से ऊपर होने को आया. अब उसका भी इंतजार नहीं'.



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    शादी के 26 सालों में कभी कोई चिंता ही नहीं करनी पड़ी थी. वे थे तो सब खुद ही संभाल लेते थे. छहों बच्चों का स्कूल में दाखिला करवाया. बेटी ब्याह दी. त्यौहार-बार पर खाना-कपड़े सब हमारे सोचने से पहले आ चुके होते. उनके बिना ये दूसरी ईद थी. पहली ईद मौत के तुरंत बाद थी. तब इतना बौखलाए हुए थे कि कुछ समझ नहीं आता था. इस बार पड़ोसियों के घर से इफ्तारी आती रही. रसूख वाले लोग 'खैरात' दे जाते, उसी से हमारी ईद मनी. बाकी दिनों में हाल और बुरे रहते हैं.

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    'सालभर से भात खा रहे हैं क्योंकि राशन में यही मिलता है. रिश्तेदार आते हैं. हमें देखके किसी को अफसोस लगता है तो थोड़े रुपए थमा जाते हैं.'



    गौमांस के धोखे में मार दिए गए अलीमुद्दीन के घर पर गाय पाली हुई है. मरियम उसके बारे में बड़े प्रेम से बात करती हैं.

    'वो भी परिवार का हिस्सा है. उसके खाने का भी सोचना होता है. धान की फसल कटती है तो मांग-मूंगकर खिला देते हैं. बाकी चरवाहा चराने के लिए ले जाता है तो उसका पेट थोड़ा-मोड़ा भर जाता है. उसकी निकली हड्डियां कलेजे में चुभती हैं लेकिन कुछ कर नहीं सकते.'



    तमाम तकलीफों के बावजूद मरियम को 'अपने' घर का आसरा है. बताती हैं, ससुर अपने जीते-जी हमारे लिए इंतजाम कर गए. हम मियां-बीवी तो छह बच्चों को पालने-पोसने में लगे हुए थे. आधा पेट खाकर भी सोएं तो कम से कम सिर पर अपने छत की तसल्ली रहती है. लेकिन कब तक इस तसल्ली के साथ अधपेट सो पाएंगे!

    'वो चले गए. अब बड़का लड़का को लेकर दफ्तर के जितने चक्कर काटें, ऊपरवाला जैसे रखेगा, वैसे ही रहना होगा ', ठंडी सांस भरते हुए मरियम कहती हैं.

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