#HumanStory: ये हैं असल जिंदगी के ‘सुल्तान’, अखाड़े में इस बड़े दिग्‍गज को भी दे चुके हैं मात

#HumanStory: ये हैं असल जिंदगी के ‘सुल्तान’, अखाड़े में इस बड़े दिग्‍गज को भी दे चुके हैं मात
वीरेंद्र सिंह

अखाड़े में मुझे सीटी नहीं सुनाई देती तो बॉक्‍सर कहते थे कि ये क्‍या पहलवानी करेगा… अच्‍छा तो अब गूंगा भी पहलवानी करेगा.. इसकी तो शादी करा दो.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 20, 2019, 11:43 AM IST
  • Share this:
(वह जब अखाड़े में उतरते हैं तो बड़े-बड़े पहलवानों को धूल चटा देते हैं. अब तक देश और विदेश में कुश्‍ती लड़ चुके हैं.अब तक वह छह अंतर्राष्ट्रीय पदक जीत चुके हैं. हाल ही में उन्‍हें अर्जुन अवॉर्ड’ से भी नवाजा गया था. हम बात कर रहे हैं हरियाणा के झज्जर से ताल्‍लुक रखने वाले पहलवान वीरेंद्र सिंह की. वे सुन और बोल नहीं सकते  लेकिन उन्‍होंने अपनी काबिलियत के दम पर देश और दुनिया में नाम कमाया है. लोग उन्‍हें गूंगा पहलवान’ के नाम से भी जानते हैं. मगर  उनका कहना है कि लोग उन्‍हें गूंगा पहलवान नहीं बल्‍कि उनकी काबिलियत से उन्‍हें पहचाने. आइए जानते हैं उनके इस सफर के बारे में उनके इंटरप्रेटर और उनके दोस्‍त रामवीर सिंह से…)

अगर मैं खेल की बात करूं तो मुझे कुश्‍ती में दिलचस्‍पी तो बचपन से हो गई थी. दरअसल मेरे पिता खुद एक पहलवान थे. इसलिए उनको अखाड़े में लड़ता हुआ  देखकर ही मैंने इस क्षेत्र में आगे बढ़ने का सोचा था. मगर उस वक्‍त अपने पिता से कुछ कह नहीं पाया. इधर दिव्यांगता की वजह से मेरा बचपन बिल्कुल भी आसान नहीं था. यहां मेरे साथ के बच्चे मेरी इस कमजोरी का मजाक बनाते थे और घर पर भी मैं ज्‍यादा किसी को कुछ समझा नहीं पाता था लेकिन कहते हैं न कि अगर कुछ करने की मन में इच्‍छा हो तो रास्‍ता निकल ही जाता है.

वीरेंद्र सिंह




एक बार की बात है, मेरे पैर में अचानक से कुछ इंफेक्‍शन हो गया. इसकी वजह से गांव के डॉक्‍टर से इलाज नहीं मिलने की वजह से मैं दिल्‍ली आ गया. यहां मेरा इलाज शुरू हो गया. इसी दौरान मैं यहां चाचा सुरेंद्र सिंह के पास रहने लगा. चाचा को मुझसे काफी लगाव हो गया था. वो मुझे अपने साथ ‘सीआईएसएफ अखाड़ा’ ले जाने लगे. यहां आकर मेरी कुश्ती में दिलचस्पी और बढ़ने लगी और मैंने इस खेल में अपना हाथ आजमाना शुरू कर दिया. इधर मेरा इलाज पूरा हो गया लेकिन उन्‍होंने फिर मुझे वापस गांव जाने नहीं दिया. उन्‍होंने मुझे ट्रेनिंग दी. फिर कुश्ती के लिए मेरा जुनून को देखते हुए पूरे परिवार ने भी उनका साथ दिया.



मैंने अखाड़े में कोच के होठों की फड़कन और पहलवानों को देखकर दांव-पेंच के पैंतरे सीखा और फिर खेलता रहा. हालांकि ये सफर इतना आसान नहीं था. मेरे सुन और बोल नहीं पाने की वजह से मुझे काफी दिक्‍क्‍ते होती थीं, जैसे अखाड़े में मुझे सीटी नहीं सुनाई देती तो बाकी के बॉक्‍सर कहते थे कि ये क्‍या पहलवानी करेगा… अच्‍छा तो अब गूंगा भी पहलवानी करेगा..

वीेरेंद्र सिंह


इसी तरह कुछ लोग तो ये भी कहते थे कि अब इसकी तो शादी करा दो. एक आराम की जिंदगी जिए. इस तरह के ताने सुनता था लेकिन मैंने भी ठान लिया था कि मुझे रुकना नहीं है. मैं उनकी बातों का जवाब बातों से नहीं बल्‍कि अपने खेल से दूंगा. बस इसलिए चुप रहा और खेलता रहा.

दिल्ली हरियाणा और आस-पास के राज्यों के दंगलों में अपनी धाक जमाने के बाद, साल 2002 में राष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने का मुझे मौका मिला. वर्ल्ड कैडेट रेसलिंग चैंपियनशिप 2002 के नेशनल राउंड्स में मैंने गोल्ड जीता. इस जीत से उनका वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए जाना पक्का था, पर मेरी दिव्यांगता को कारण बताते हुए फेडरेशन ने मुझे आगे खेलने के लिए नहीं भेजा. हालांकि,फिर भी मैं डटा रहा मैदान पर.

वीरेंद्र सिंह


अबकी बार साल 2005 में डेफलिम्पिक्स (पहले इन खेलों को ‘द साइलेंट गेम्स’ के नाम से जाना जाता था) के बारे में पता चला. मैंने इसमें भाग लिया और गोल्ड जीता. इसके बाद ‘डेफ केटेगरी’ में मुझे जहां-जहां भी मौका मिला, मैंने देश के लिए खेला.

निराशा होती है जब आपके साथ दिव्‍यांग होने की वजह से भेदभाव किया जाता है. ऐसा ही मेरे साथ हुआ. साल 2016 में केंद्र सरकार ने उन्हें पैरा-एथलीट केटेगरी के बजाय डंब केटेगरी में रखा, जबकि नियमों के मुताबिक, उन्हें पैरा-एथलीट केटेगरी में रखा जा सकता था. खैर फिर भी मैं डटा हूं. आगे बढ़ रहा हूं.

हालांकि बस इस बात का अफसोस है कि देश के लिए कई मेडल जीतने के बाद भी मुझे मुख्‍य धारा के खिलाड़ी से अलग रखा गया.आज तक मुझे वो सम्‍मान पहलवान सुशील कुमार, योगेश्वर दत्त जैसे खिलाड़ियों को मिलता है लेकिन ये सब भूलाकर फिलहाल मैं साल 2020 के ओलिंपिक खेलों की तैयारी में लगा हुआ हूं.

यह भी पढ़ें: #Human Story: जब स्‍टेज पर मिली थी जोकर को बीवी की मौत की खबर....

यह भी पढ़ें: #HumanStory: मां की दूसरी शादी के लिए बेटी को दे दिया था जहर,आज वही बेटी बचा रही जिंदगियां 

 
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज

corona virus btn
corona virus btn
Loading