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#HumanStory: ट्रैवलर का तजुर्बा- जमा देने वाली बर्फ में दोस्त मुझे अस्पताल पटक गए

News18Hindi
Updated: October 7, 2019, 10:38 AM IST
#HumanStory: ट्रैवलर का तजुर्बा- जमा देने वाली बर्फ में दोस्त मुझे अस्पताल पटक गए
छोटे से शहर के छोटे से स्कूल की बित्तेभर लड़की ह्वेन त्सांग के ख्वाब देखने लगी

हम लड़कियां काजल लगाना चाहतीं. होंठ रंगना चाहतीं. नई काट के चटख-मटक कपड़े चाहतीं. खाला, फुफ्फी से होते हुए हमारी सहमी हुई मांगें अम्मी तक पहुंचती और वहां से फिर मर्दों के दालान तक...

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  • Last Updated: October 7, 2019, 10:38 AM IST
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फिरोजाबाद... कांच की हरबिरंगी चूड़ियों के शहर में उसे पहनने-वालियों की जिंदगी खास रंगीन नहीं थी. दिनभर घर के छिटपुट काम और दुपहरी में स्कूल में सबक दुहराना. एक रोज टाटपट्टी पर टीचर के सुर में सुर मिलाते हुए मैं ठिठक गई. चीनी यात्री ह्वेन त्सांग का किस्सा था. पैदल, ऊंट, घोड़ों पर चलते हुए कैसे उसने हजारों मील नाप लिए! उस छोटे से शहर के छोटे से स्कूल की बित्तेभर लड़की ह्वेन त्सांग के ख्वाब देखने लगी.

ये कहानी है डॉ कायनात काजी की. वो महिला सोलो ट्रैवलर, जिसकी जिंदगी का इकलौता मकसद है- सफर. वे कहती हैं- सफर मुझे जिंदा रखता है.

बचपन में बुरका नहीं था. लेकिन इसके अलावा तमाम वो चीजें थीं जो नजरबंदी से कम नहीं. हम लड़कियां काजल लगाना चाहतीं. होंठ रंगना चाहतीं. नई काट के चटख-मटक कपड़े पहनना चाहतीं. खाला, फुफ्फी से होते हुए हमारी सहमी हुई मांगें अम्मी तक पहुंचती और वहां से फिर मर्दों के दालान तक. मिनटभर की चुप्पी के बाद कड़कड़ाती आवाज आती- स्कूल क्या इसलिए जा रही हो! या फिर मांगें सुनकर भी अनसुनी हो जातीं. पहले हम रोया करते.

कई-कई बार हुक्मउदुली की भी कोशिश की लेकिन वक्त के साथ हमने भी हमउम्र साथिनों की तरह चुप्पी ओढ़ ली.

खनखनाती चूड़ियों के शहर में वो लड़की बड़ी होती रही. शायद एक रोज कहीं गुम हो जाती. शादी के बाद आसपास के किसी मंझोले शहर में बस जाती और फिर अपनी खालाओं की तरह ही हांडियां पकाते हुए बच्चियों को रोका-टोका करती. लेकिन एक रोज बच्ची ने एक पाठ पढ़ा. ह्वेन त्सांग के सफर की दास्तां. कैसे एक चीनी बौद्ध भिक्षु ने अपनी तमाम जिंदगी घुमकक्ड़ी को दे दी. वो भी तब, जब जहाई, हवाई जहाज या रेलगाड़ियां नहीं थीं.

लोग प्रार्थना करते हैं, वैसे ही मैं रोज ह्वेन त्सांग का वो सबक पढ़ती (फोटो- प्रतीकात्मक)


कायनात याद करती हैं- मैं दकियानूसी मुस्लिम परिवार से थी. उनका सारा खुलापन इसी में सिमटा था कि वे अपने घर की बच्चियों को पढ़ने की इजाजत दे रहे हैं. उसी परिवार की एक लड़की दुनिया घूमने का ख्वाब देखने लगी थी.
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सोते हुए लोग प्रार्थना करते हैं, मैं ह्वेन त्सांग का सबक पढ़ती.

कभी जोर-जोर से. कभी गुनगुनाते हुए. मैं महसूस करती थी कि कैसे कितने ही हरे-गहरे समंदरों और खाइयों-दर्रों को पार करता हुआ वो सनकी यात्री भारत आया होगा.

कागज पर छपा वो एक पाठ छोटे शहर की सलवार-कमीज वाली लड़की को दुनिया से जोड़ने वाला पुल बन गया था.

लोग डॉक्टर-इंजीनियर-टीचर बनना चाहते थे, मैं ट्रैवलर बनना चाहती थी. घंटों दुनिया का नक्शा देखती. नीले रंग से समंदर बनता है, हरा रंग जंगल बताता है और भूरा जमीन-पठार. मैं पेंसिंल से मार्क किया करती. मुझे इन देशों में जाना है. उस समंदर की लहरों में अपने पांव भिगोने हैं. वो डिश आजमानी है. सपने देखते हुए मैं फिरोजाबाद के ही गर्ल्स स्कूल से निकलकर गर्ल्स कॉलेज में पढ़ने लगी थी.

कभी-कभी थक जाती. लगता कि उस चीनी घुमक्कड़ की जिंदगी के लिए मुझे एक जन्म और लेना पड़ेगा लेकिन रात फिर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के सपने आते.

सही मायनों में शादी के बाद ही मैं आजाद हुई


साल 2008 में शादी हुई. वोट तो पहले भी दिया था लेकिन सही मायनों में शादी के बाद ही मैं आजाद हुई. शौहर ने हाथ पर हाथ धरकर कहा- खूब घूमो.

मैं उसी दम घर से निकल पड़ी. उसके बाद से हर वक्त लौटती हूं तो घर के दरवाजे और खाने की मेज उसी गरमाहट से मेरा इंतजार करते हैं. 2 साल पहले मां बनी. यात्राओं पर शायद विराम लग जाता लेकिन तभी मेरी मां ने मुझे थाम लिया. वे बच्चे को संभालती हैं और मैं अपने सपने को.

घर-बच्चा-नातेदार सब हैं लेकिन मैं तभी तक हूं जब तक मैं घूमती रहूं. सफर मुझे जीने की खुराक देता है.

पिछले 12 सालों के सफर में तमाम तरह के वाकयात घटे. एक बार लद्दाख में मुझे हाई एल्टीट्यूट सिकनेस हो गई.

आगे बढ़ने पर जान जा सकती थी. मैं तब फोटोग्राफरों की एक टीम के साथ हूं. उनकी दुनिया अलग होती है. किसी के लिए रुकती नहीं. अगर आप फोटोग्राफर हैं तो जगहों और चेहरों को कैद करने का जुनून रहेगा ही रहेगा. दोस्तों ने मुझे एक आर्मी अस्पताल में पटका और तस्वीरें लेते बढ़ गए. तब आर्मी के अनजान लोगों ने परिवार के जैसे मुझे देखा-भाला था. ऐसे तजुर्बे आपको ज्यादा इंसान बनाते हैं. ऐसे ढेरों वाकये हुए.

यकीन है कि दुनिया के किसी भी हिस्से में चली जाऊं, कोई न कोई मदद जरूर मिलेगी.

अकेले घूमने में आजादी है तो जिम्मेदारी भी है


शुरुआत में मेरी अंग्रेजी का हाल गरीब की थाली जैसा था, यहां से पिचका, वहां से टेढ़ा. छोटी जगह से हूं.

ठेठ सरकारी हिंदी मीडियम वाली. फन्ने-खां अंग्रेजी नहीं बोल पाती थी. हर हिंदी बोला-बोली वाले की तरह मुझे भी लगता था कि अंग्रेजी सुधर जाए तो जिंदगी संवर जाए. मैंने इसपर काम किया. हालांकि अपने देश में ही दिक्कत हुई. अंग्रेजी बोलने वाले देश भाषा के कच्चे-पक्के होने का मजाक नहीं बनाते.

औरत हूं. अकेली दुनिया घूमती हूं. लोग जानते हैं तो आंखें चौकोर कर लेते हैं. कहते हैं- बड़ी हिम्मती हो.

कई बार कोशिश की उन्हें समझाने की लेकिन हो नहीं सका. बहादुर वो होता है, जिसे किसी बात का डर हो और वो हिम्मत से उसे पार कर ले. अकेले यात्राएं करना मेरे लिए डर नहीं, मेरी इकलौता ख्वाब है. हां ये बात जरूर है कि अकेले घूमने में आजादी है तो जिम्मेदारी भी है. सीमाएं तय करनी होती हैं ताकि साबुत लौटें, वहां, जहां परिवार आपका इंतजार करता है.

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First published: October 7, 2019, 10:38 AM IST
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