#HumanStory: धोनी बनना चाहता था ये शख्‍स लेकिन एक्सीडेंट में पैरों से हुआ लाचार,अब है पैरा-एथलेटिक्स चैंपियन

एक सड़क के किनारे भूसे से भरा ट्रक लुढ़कने लगा और जब तक मैं कुछ समझ पाता, मैं उसकी चपेट में आ चुका था. मेरी छाती की हाथ-पैर की, लगभग सभी हड्डी टूट गयी थी. चार सालों तक तो हिल भी नहीं सकता था.

Nandini Dubey | News18Hindi
Updated: April 11, 2019, 7:59 PM IST
#HumanStory: धोनी बनना चाहता था ये शख्‍स लेकिन एक्सीडेंट में पैरों से हुआ लाचार,अब है पैरा-एथलेटिक्स चैंपियन
शेखर चौरासिया
Nandini Dubey | News18Hindi
Updated: April 11, 2019, 7:59 PM IST
उस दिन घर में पूजा थी.पूजा में शामिल हुए एक मेहमान को गांव के बाहर छोड़ने जा रहा था. उसी दौरान मुझे प्‍यास लगी तो मैं पानी पीने के लिए एक हैंडपंप पर रूक गया तभी एक सड़क के किनारे भूसे से भरा ट्रक लुढ़कने लगा और जब तक मैं कुछ समझ पाता, मैं उसकी चपेट में आ चुका था. पता ही नहीं चला कि कब वह ट्रक मेरे ऊपर आ गिरा और  मैं उसके नीचे दब गया. मेरी छाती की हाथ-पैर की, लगभग सभी हड्डी टूट गयी थी. कई दिनों तक आईसीयू में रहा.

जैसे- तैसे डॉक्टरों ने मेरी जान बचाई, लेकिन मेरे हाथ और पैर की हालत इतनी खराब थी कि उन्होंने कह दिया था कि हाथ-पैर दोनों काटने पड़ेंगें. ये बात सुनकर मेरे माता-पिता बुरी तरह घबरा गए. उन्‍हें समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर वो करें तो क्‍या? किसी के भी माता-पिता पर क्‍या गुजरेगी, अगर उसकी अच्‍छी-भली संतान के साथ ऐसी स्‍थिति पैदा हो जाए तो कौन शख्‍स ये सदमा बर्दाश्‍त कर पाएगा.

#HumanStory: मेरे दोस्त जब लड़कियों के पीछे भागते थे, मैं लड़कों के ख्‍वाब देखता था

मेरे माता-पिता का भी ये जानकर बुरा हाल था.हालांकि मैं तो उस दौरान बदहवास हालत में था लेकिन जितना कुछ याद है. उसके मुताबकि मम्‍मी-पापा ने कई डॉक्‍टर बदले. उसके बाद जाकर हमें पटना में ही एक ऐसे डॉक्‍टर मिले, जिनसे इलाज करवाकर मेरे हाथ-पैर तो बच गए लेकिन अब मेरे सामने ये स्‍थिति आ गई थी.  दरअसल डॉक्‍टर ने कह दिया था कि शायद ही मैं कभी चल पाऊंगा.

शेखर चौरासिया


ये जानने के बाद मुझे तो अपनी जिंदगी ही बोझ लगने लगी थी. समझ नहीं आता था कि आखिर अब कैसे और क्‍या कर पाऊंगा? इस दौरान करीब चार साल तक मैं बिस्‍तर पर ही रहा. हिल-डिुल भी नहीं सकता था. मैंने तो हार मान ली थी लेकिन मेरे परिवार ने नहीं.

मेरे परिवार ने जैसे-तैसे करके मेरे इलाज के लिए पैसे जुटाए.उन्‍होंने गांव के घर-घर जाकर चंदा मांगा और कई बार इधर-उधर से कर्ज भी लिया. जैसे- जैसे मैं थोड़ा ठीक हुआ. मैंने एक्‍सरसाइज शुुरू कर दी. इससे  मैंने बैसाखी के सहारे चलना शुरू किया. फिर धीरे- धीरे खुद खड़ा होना शुरू किया. अभी भी मेरा पूरा पैर मुड़ता नहीं है. एक हाथ भी बहुत अच्‍छी तरह काम नहीं करता. हमारे एक पैर की एड़ी नहीं है लेकिन फिर भी मैं रूका नहीं हूं. इन हालातों में भी मैंने चार साल के ब्रेक के बाद साल 2015 में बारहवीं कक्षा की परीक्षा दी. हालांकि मेरा एमएस धोनी जैसा खिलाड़ी बनने का सपना तो टूट चुका था लेकिन फिर भी मैं थमा नहीं.
Loading...

#HumanStory: उस शख्स की कहानी, जिसके हर रात बनते हैं नए दुश्मन 

मैं पटना आ गया. यहां एक कमरा लेकर रहना शुरू कर दिया. इसके साथ-साथ कोई न कोई काम ढूंढने लगा, जिससे घरवालों की मदद कर सकें. इसलिए कोई भी छोटा-मोटा काम कर लेता था. इससे  300- 400 रुपये मिल जाते थे. ये पैसे मेरी कमरे के किराए और दवाओं के खर्चे में मदद करते थे. इसी दौरान एक दिन की बात है, जिनके साथ मैं कमरा शेयर करता था. उनमे से एक दोस्‍त ने मुझे पाटलिपुत्र स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में दिव्यांगों के लिए हो रही राज्य-स्तरीय खेल प्रतियोगिताओं के बारे में बताया, क्‍योंकि मैं अपने स्कूल में खेलने-कूदने में बहुत अच्छा था.

मैं अपने दोस्त के साथ वहां पहुंच गया. यहां अपने जैसे बहुत से खिलाड़ियों को देखा और फिर दिव्यांगो की T35- 38 केटेगरी के तहत के तहत दौड़ में भाग लिया. इस राज्य-स्तरीय प्रतियोगिता में मैंने 400 मीटर, 800 मीटर और 1, 200 मीटर की दौड़ में गोल्ड मेडल जीते. ये तो मुझे नहीं पता कि आखिर उस दिन मैं कैसे इतना दौड़ लिया लेकिन हां उस दिन के बाद से जीने का एक मकसद मिल चुका था.

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर


राज्य-स्तरीय प्रतियोगिता के बाद, साल 2018 में नेशनल पैरा-एथलीट चैंपियनशिप में खेलने का मौका मिला. इसकी तैयारी करने के लिए मैंने ‘अकैडमी ऑफ़ जिमनास्टिक, पटना’ ज्वाइन की. वैसे तो, दिव्यांगों के लिए अकादमी की फीस है, लेकिन अकादमी के कोच संदीप कुमार जी ने मेरे हालातों को समझते हुए, बिना किसी फीस के ट्रेनिंग देने का निर्णय लिया. आखिरकार  मेरे कोच की मेहनत रंग लाई और साल 2018 की चैंपियनशिप में तीन गोल्ड मेडल हासिल किये. इसके बाद मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. जगह- जगह पर होने वाले टूर्नामेंट्स में लगातर भाग लेता रहा.

वहीं अभी तक मैं कई अवॉर्ड्स जीत चुका हूं, जैसे कि राष्ट्रीय दिव्यांग श्रेष्ठ खेल सम्मान, अजातशत्रु अवॉर्ड, उत्तर- प्रदेश रत्न आदि से सम्मानित किया जा चुका है. इसके अलावा मां  कमलावती चौरसिया को भी ‘राष्ट्रमाता जीजा माँ’ पुरस्कार से नवाज़ा गया है, क्योंकि हर हाल में, वे अपने बेटे का सहारा बनीं और उसे आगे बढ़ने का हौसला दिया गया है.

(ये कहानी पटना से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर बसे दिनारा जिले के एक छोटे से गांव गुनसेज के रहने वाले शेखर चौरासिया की है. पढ़ाई-लिखाई में अव्‍वल में रहने वाले शेखर एमएस धोनी जैसा खिलाड़ी बनने की ख्‍वाहिश रखते थे लेकिन एक सड़क दुर्घटना ने उनकी जिंदगी बदल दी थी. इस दुर्घटना में उनके हाथ और पैर काटने की नौबत आ गई थी. इन हालातों में भी शेखर ने हार नहीं मानी. अपनी हिम्‍मत के बल पर उन्‍होंने साल 2018 में नेशनल पैरा-एथलीट चैंपियनशिप में गोल्‍ड मेडल जीता है. इसके अलावा भी कई अवॉर्ड उनके नाम है.)
Loading...

और भी देखें

पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...

वोट करने के लिए संकल्प लें

बेहतर कल के लिए#AajSawaroApnaKal
  • मैं News18 से ई-मेल पाने के लिए सहमति देता हूं

  • मैं इस साल के चुनाव में मतदान करने का वचन देता हूं, चाहे जो भी हो

    Please check above checkbox.

  • SUBMIT

संकल्प लेने के लिए धन्यवाद

काम अभी पूरा नहीं हुआ इस साल योग्य उम्मीदवार के लिए वोट करें

ज्यादा जानकारी के लिए अपना अपना ईमेल चेक करें

Disclaimer:

Issued in public interest by HDFC Life. HDFC Life Insurance Company Limited (Formerly HDFC Standard Life Insurance Company Limited) (“HDFC Life”). CIN: L65110MH2000PLC128245, IRDAI Reg. No. 101 . The name/letters "HDFC" in the name/logo of the company belongs to Housing Development Finance Corporation Limited ("HDFC Limited") and is used by HDFC Life under an agreement entered into with HDFC Limited. ARN EU/04/19/13618
T&C Apply. ARN EU/04/19/13626