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#HumanStory: मेरे दोस्त जब लड़कियों के पीछे भागते थे, मैं लड़कों के ख्‍वाब देखता था

गौतम यादव

गौतम यादव

स्‍कूल में जब लड़के लड़कियों के साथ वक्‍त बिताते थे तब मैं एक लड़के के साथ कुछ पल गुजारना चाहता था.सोचता था कि काश मैं ...अधिक पढ़ें

    मेरी परवरिश एक ऐसी जगह हुई थी, जहां लोगों ने कभी गे, ‘बाईसेक्‍सुअल’,‘हेट्रोसैक्‍सुअल’,‘लेसबियन’ जैसे शब्‍द सुने तक नहीं थे. लोग जानते ही नहीं थे कि स्‍त्री और पुरुष के अलावा और भी कुछ हो सकता है. ऐसी जगह में मैं बड़ा हो रहा था. यहां के इलाके मेरे पापा ऑटो रिक्‍शा ड्राइवर थे और मां हाउसवाइफ. मैं स्‍कूल जाता था. पढ़ाई में अच्‍छा था. धीरे-धीरे स्‍कूल से मुझे ये महसूस हुआ कि मैं लोगों से कुछ अलग हूं. हालांकि क्‍या? ये मुझे भी नहीं पता था. दरअसल जब मैं छठवीं क्‍लास में पहुंचा तो अक्‍सर लड़के लड़कियों की तरफ रूझान रखते थे. उनके साथ लंच,प्‍लेग्राउंड में साथ रहते थे. एक-दूसरे के साथ वक्‍त बिताने का बहाना ढूंढते थे

    जबकि मैं उन लड़कों से अलग था. मेरा दिल करता था कि मैं एक लड़के के साथ वक्‍त बिताऊं. उनके साथ रहूं. अपनी इस सोच पर मुझे थोड़ा अजीब लगता था लेकिन कभी किसी से कुछ कह नहीं पाया, तभी मैंने दरअसल मैं ओखला में पला-बढ़ा. यहीं मेरे पापा ओखला में ऑटो रिक्‍शाड्राइवर थे.मां हाउस वाइफ हैं. ऐसी जगह में लोगों को समझाना आसान काम नहीं था.

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    हालांकि कुछ वक्‍त तक तो मुझे खुद भी पता नहीं था कि मुझमे अलग क्‍या बात है? हां ये पता था कि कुछ तो है जो अजीब है. इसके बाद एक दिन टीवी पर मैंने ‘गे’ मानवेंद्र सिंह को सुना. वो अपनी जिंदगी के बारे में कुछ बता रहे थे, जो कुछ अपना से मिलता-जुलता महसूस हुआ. इसके बाद मैंने उनको जानने और समझने की कोशिश की. इसके लिए इंटरनेट का सहारा लिया.

    गौतम यादव

    अगले दिन ही मैं साइबर कैफे पहुंचा. यहां मानवेंद्र सिंह के अलावा इससे जुड़ी और जानकारी जुटाईं. इसके बाद मुझे अहसास हुआ कि मैं गे हूं. कुछ वक्‍त बाद ये बात पैरेंट्स को बताई. इसके बाद ये बात उन्‍हें समझने में भी काफी वक्‍त लगा. हालांकि पापा ने मेरा पूरा सपोर्ट किया लेकिन हां उन्‍हें भी काफी वक्‍त तक कुछ समझ नहीं आया. इसमें मम्‍मी-पापा की भी गलती नहीं है. आप किसी को भी रातों-रात ये बात समझा नहीं सकते. धीरे-धीरे उन्‍होंने मुझे स्‍वीकार कर लिया. कहते हैं न कि ये सबकुछ इतना आसान नहीं होता.

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    मैं जब आठवीं क्‍लास में था तो मेरी हाव-भाव, तौर-तरीकों को देखकर उन्‍होंने मुझे चिढ़ाना शुरू कर दिया था. बहुत बुरा लगता था लेकिन मैं चुप रहता था. कभी किसी से कुछ नहीं कहता लेकिन एक बार तो हद हो गई. स्‍कूल की छुट्टी हुई थी. मैं घर जा रहा था. कुछ लड़के मुझे चिढ़ा रहे थे. पीछे से टोक कर कह रहे थे मुझे तुम्‍हारी हकीकत पता है. सुन कहां जा रहे हो? इसके बाद मैं रोता हुआ तेजी से घर की तरफ दौड़ पाया. बस उस दिन के बाद से कभी स्‍कूल नहीं गया. मेरी पढ़ाई अधूरी रह गई. इसके बाद से ही मैं ‘एलबजीबीटी’ की प्रोटेस्‍ट में शामिल होने लगा था. यहां से मेरा सफर शुरू हो गया.

    प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

    इतना कुछ हुआ ही था कि कुछ वक्‍त बाद मुझे एचआईवी की जांच करानी पड़ी. जांच का रिजल्‍ट आया तो मालूम पड़ा कि मैं एचआईवी पॉजिटिव हूं. मुझे झटका लगा. मैं टूट गया. डिप्रैशन में चला गया था. फिर मैंने  खुद से सवाल किया कि या तो इस तरह घुट-घुट कर अपनी जिंदगी बर्बाद कर दूं या फिर अपनी परेशानी से उबर मेरे जैसे और लोगों को जीने का रास्‍ता सुझाऊं. इस तरह से मैं ‘द हमसफर ट्रस्‍ट’ से जुड़ गया.

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    इस मंच पर आकर लोग मुझसे बात करते हैं. सवाल पूछते हैं. लोग कहते हैं कि क्‍या मैं अपने घर में बताऊं या नहीं? घर में तो कैसे बताऊं तो उन्‍हें ये कहता हूं कि पहले आप खुद को आत्‍मनिर्भर हो जाए उसके बाद ही दुनिया को बताना, क्‍योंकि ऐसे किसी की खुद बताने की जरूरत नहीं होती है. एचआईवी वाले पूछते हैं कि मैं कितने साल जिंदा रह सकता हूं. मैं मर तो नहीं जाऊंगा. इस तरह से मैं लोगों को समझाता हूं कि  अगर आप प्रॉपर मेडिकेशन लेते हैं तो आप एक बहुत अच्‍छी जिंदगी जी सकते हैं.

    गौतम यादव

    आज खुश हूं कि लोगों मेरी बात सुनते हैं. हां कभी-कभी कोफ्त होती है जब मैं भी अपना हमसफर ढूंढने के लिए टिंडर जैसी वेबसाइट पर लोग कहते हैं कि तुम्‍हे तो मर जाना चाहिए. तुम्‍हेंं एचआईवी है. तुम्‍हें साथी की क्‍या जरूरत है. इस तरह की बयानबाजी थोड़ी देर  तकलीफ देती है लेकिन फिर हंसी भी आती है कि इतना पढ़ने-लिखने के बावजूद इन लोगों की सोच इस तरह की है लेकिन मुझे फर्क नहीं पड़ता, क्‍योंकि इन्‍हींं लोगों में मुझे कुछ ऐसे लोग भी मिले हैं, जो मेरे साथ जुड़े. उन्‍होंने मुझसे मोहब्‍बत की. मेरी सच्‍चाई जानने के बावजूद. उन्‍होंने मुझसे प्‍यार किया. मुझे कोई गम नहीं है.

    आज खुश हूं. लोगों की मदद करके. अब चाहता हूं कि स्‍कूल में जो मेरे साथ हुआ वो किसी और के साथ न  हो. इसके लिए  स्कूलों में काउंसलर हों. काउंसलर बच्चों को भी बेहतर गाइड कर सकते हैं, जो जानकारी के अभाव में इन बच्चों को मेंटली और फिजिकली चोट पहुंचाते हैं.

    (ये कहानी दिल्‍ली के ओखला से ताल्‍लुक रखने वाले गौतम यादव की है. बचन में गे होने की वजह से उन्‍हें 15 साल की उम्र में स्कूल से छोड़ना पड़ा. इसके कुछ वक्‍त बाद मालूम पड़ा कि वे एचआईवी से पीड़ित हैं. इसके बाद तो सोसाइटी ने उनका जीवन मुश्‍किल कर दिया लेकिन ऐसे लोगों की बातों से वे घबराए नहीं बल्‍कि उन परिस्‍थितयों में मजबूती से खड़े रहे. आज आज एक सफल एचआईवी एंड एलजीबीटी राइट्स एक्टिविस्ट हैं.)

    Tags: Delhi news, Human rights, Mumbai news today, Sexual Abuse

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