#HumanStory: इस शख्‍स के काम से परेशान होकर पत्नी ने छोड़ा साथ, बच्चे का चेहरा भी नहीं देखने दिया

इस समाज की औरतें खुले में नहाती थी. ये देखकर आस-पास गुजरने वाले लोग उनके साथ गलत व्‍यवहार करते थे, छेड़खानी करते थे, वहीं मर्द मल उठाने का काम करते थे.

Nandini Dubey | News18Hindi
Updated: April 16, 2019, 2:31 PM IST
#HumanStory: इस शख्‍स के काम से परेशान होकर पत्नी ने छोड़ा साथ, बच्चे का चेहरा भी नहीं देखने दिया
संजीव कुमार
Nandini Dubey | News18Hindi
Updated: April 16, 2019, 2:31 PM IST
साल 2005 की बात है. मैंने अपने गांव बिहार जाने का मन बनाया था. दरअसल मैंने कभी गांव देखा नहीं था. मैं दिल्‍ली में पला-बढ़ा था. यहीं से पढ़ाई पूरी हुई. इसके बाद मैंने मॉडलिंग करने लगा. इस दौरान मुझे अच्‍छे प्रोजेक्‍ट भी मिल रहे थे तभी उस दिन दीदी के सास की मृत्‍यु की खबर सामने आई. हम लोगों में किसी को अंतिम संस्‍कर के लिए वहां जाना था. मैंने मां से कहा कि मैं जाना चाहता हूं, क्‍योंकि मैं गांव को करीब से देखना चाहता था. इसलिए मैं निकल गया.

दीदी के ससुराल वालों ने भोज का आयोजन किया था. सभी लोग खा-पी रहे थे. इस दौरान मैंने एक कोने में देखा कि लोग जिस जगह खाने के बाद जूठे पत्तल डाल रहे हैं, वहीं कुछ लोग खड़े होकर उन पत्तलों में बचा हुआ खाना इकट्ठा कर रहे हैं. ये देखकर मैं तो दंग ही रह गया. मुझसे रहा नहीं गया और मैंने उन लोगों से पूछ ही लिया कि आप क्या कर रहे हैं, तो उनमें से एक ने जवाब दिया कि हम ये ले जाकर खायेंगें. यह सुनकर मैं हैरान रह गया. ये लोग दूसरों को जूठा खाना खाते हैं. ये सुनकर मैं काफी देर तक परेशान रहा.

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इसके बाद मैंने इस बारे में दीदी के ससुर से बात की तो उन्होंने इसके पीछे की हकीकत बताई. उनका कहना था कि ये डोम जाति के लोग हैं और ये इसी तरह जूठन पर जीते हैं. इसके अलावा ये लोग मैला ढोते हैं. श्मशान पर लाशों को जलाने का काम करते हैं. ये सब बातें सुनकर तो जैसे मैं जम गया कि हम किसी तरक्की की बात कर रहे हैं. शहरों में ऊंची-ऊंची इमारतों पर चढ़े शीशे और एसी वाले दफ्तरों से अलहदा असल भारत की तस्वीर तो सामने है. देश की हकीकत तो इन गांवों में बसी है. रात भर यही सब बातें सोचता रहा.

संजीव कुमार में एक सभा के दौरान


अगले दिन मैं इन लोगों के बारे में पूछते-पूछते इनके निवास-स्थान, ब्लॉक कैंपस पहुंच गया. यहां मैंने देखा कि कुछ लोग बांस से सूंप बनाने का काम कर रहे थे. वहीं पास में महिलाएं अपने अपने कामों में लगीं थीं. इसी दौरान मेरी नजर एक बच्चे पर पड़ी तो देखा कि एक पतीले में वही रात का खाना है और एक बच्चा और एक छोटा-सा कुत्ता, दोनों ही उसी में से साथ खा रहे हैं. यह देखकर मैं फिर परेशान हो गया. ये देखने के बाद मैं वापस दीदी के घर लौट आया. अगली सुबह मुझे दिल्ली के लिए निकलना था.

मैं वापस आ तो गया लेकिन कहीं मन ही नहीं लग रहा था. न घर में और न ही ऑफिस या फिर रैंप शो. रह-रहकर उनके बारे में ही सोच रहा था. इसके बाद मैंने इन लोगों पर पढ़ना शुरू किया. समाज में जाति व्यवस्था, डोम समुदाय, छुआछूत जैसे विषयों पर लोगों से जानकारी जुटाई. आखिराकार मुझसे रहा नहीं गया और मैंने इन लोगों के उत्थान में काम करने का निर्णय ले लिया. बहुत हिम्मत करके अपने फैसले के बारे में घर वालों को बताया लेकिन उन्होंने मेरी बात सुनकर बहुत नाराज भी हुए और बहुत समझाया भी. आखिरकार मेरी जिद के आगे उनकी नहीं चली और मैं साल 2006 में मॉडलिंग जैसा सुनहरा करियर छोड़कर बिहार आ गया.
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संजीव कुमार


यहां आकर मैंने इन लोगों के बारे में पूरी जानकारी जुटाई. सबसे पहले मैंने डोम समुदाय के निवास-स्थान के बारे में पता लगाया, तो पता चला कि ये लोग गांव से एक दम बाहर रहते हैं. मैंने उनके साथ वक्त गुजारना शुरू किया. उस दौरान समझा कि मुझे क्या करना है. हालांकि इस दौरान उनकी स्थानीय भाषा भी ख़ास समझ नहीं आती थी. न ही वे मेरी बात पूरी समझ पाते थे लेकिन कैसे भी मैंने उन्हें और उन्होंने मुझे समझा.
इसके बाद सबसे पहली शुरूआत मैंने बच्चों से की. दरअसल ये बच्चे पढ़ते-लिखते नहीं थे. ये देखकर मैंने सोचा कि इन्हें पढ़ाना चाहिए, क्योंकि पहली पीढ़ी ने जो भुगता है, उसे हम नहीं बदल सकते लेकिन अगर आने वाली पीढ़ी को एक मुकाम दे देंगें, तो आने वाली पीढ़ी को तो कम से कम ये काम नहीं करना पड़ेगा.

डोम जाति के लोग


मैंने उन बच्चों को नहाकर साफ कपड़े पहनना सिखाया. मैं खुद साबुन खरीदकर ले जाते और उन बच्चों को नहलाते, उनके कपड़े धो देते. इसके बाद मैंने औरतों को भी कुछ जरूरी बातें सिखाईं. जैसे वे खुले में नहाती थीं. इसकी वजह से कई बार लोग उन्‍हें देखते थे. अक्सर तो ऐसा होता था कि लोग उनके साथ गलत व्यवहार भी करते थे. फिर मैंने उन्हें समझाया कि ये लोग कुछ भी अपने चारों-तरफ कोई भी कपड़ा बांधकर नहा सकती है, जिससे उन्हें ऐसे दूसरों की नजरों से बच सकेगीं.

मेरा ये काम देखकर यहां के बीडीओ ने मुझे मेरे काम के लिए बधाई दी. इसके अलावा प्रशासनिक विभाग में ही दो कमरे देने का प्रस्ताव दिया, जहां मैं आराम से बच्चों को पढ़ा सकता था. इस तरह मेरे रहने का इंतजाम हो गया था. धीरे-धीरे लोग मेरी बातें समझ रहे थे लेकिन ये सब इतना आसान नहीं था.दरअसल पूरे गांव के साथ-साथ मेरे काम की भनक दीदी के ससुराल वालों को भी लग चुकी थीं. उन्होंने मुझ पर बहुत गुस्सा किया. साथ ही अपने घर में रहने से इनकार कर दिया. इसके बाद मुश्किलें बढ़ती चली गईं. गांव के अपने ही समुदाय के लोगों ने समाज से बहिष्कार, मार देने की धमकियां देने लगे लेकिन इसके बावजूद मैं रूका नहीं.

संजीव कुमार सभा को संबोधित करते हुए


साल 2007 में ‘बहिष्कृत हितकारी संगठन’ की शुरुआत की. इस दौरान मैं एक दिन में लगभग 16 किलोमीटर चलकर 40 गांवों में जाता और वहां डोम समुदाय के लोगों से मिलते, उनसे बातें करते और धीरे-धीरे उन्होंने इन्हें आपस में जोड़ना शुरू किया. उन्होंने ज़मीनी स्तर पर इन 40 गांवों के डोम समुदायों को जोड़कर, उनकी एक अलग पंचायत बनाई. इस पंचायत के लिए चुनाव किये और फिर इन्हीं डोम लोगों में से ‘प्रमुख,’ ‘उप-प्रमुख’ को चुना.

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दरअसल इस चुनाव के पीछे का उद्देश्य था कि हम इन लोगों को सशक्त महसूस कराएं. हम कभी भी पंचायत में चुने हुए लोगों को उनके नाम से नहीं, बल्कि उनके पद से बुलाते थे. जैसे जब भी हम डोम प्रमुख को बुलाते तो ‘प्रमुख साहब’ कहते और यह शब्द उनके दिल में एक अलग ही आत्मविश्वास भर देता था.
इसके बाद इस पंचायत ने नियम बनाया कि जहां भी उन्हें सम्मान नहीं मिलेगा, वे काम करने के लिए नहीं जाएंगे. हालांकि ये आसान नहीं था, क्योंकि इनकी आजीविका और रोज़ी-रोटी इसी पर निर्भर करती थी. लेकिन फिर भी इन लोगों ने अपना फैसला नहीं बदला. इस तरह से धीरे-धीरे लोगों की सोच बदलनी शुरू हो गई.

हालांकि इस दौरान मुझे कई नुकसान उठाना पड़ा जैसे मेरी बीवी मुझे छोड़कर चली गई. आज तक मैंने अपने बच्चे की शक्ल नहीं देखी. दरअसल बीवी चाहती थीं कि मैं ये सब काम छोड़ दूं और उसे साथ जिंदगी बिताऊं. ऐसा मैं कर नहीं पाया और आखिरकार आज मैं अकेला हूं. हालांकि मेरा परिवार मेरे साथ है. इसके अलावा मैं आर्थिक तंगी से भी जूझ रहा हूं, क्योंकि कोई स्थायी नौकरी नहीं होने की वजह से मुझे अपना खर्चा चलाना मुश्किल है लेकिन फिर भी परिवार, दोस्त के दम पर आगे बढ़ रहा हूं. बस खुशी इस बात की है कि लोग बदल रहे हैं.
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