'वो मुझे भूलने लगी है, मैं उसे और भी ज्यादा प्यार करने लगा हूं'

सुबह परदे खोलकर उसे सूरज में नहाने देता हूं, चूमता हूं, बालों में तेल लगाता हूं, उसका पसंदीदा खाना पकाता हूं, रात में उसे कोई किताब पढ़कर सुनाता हूं और फिर सुलाता हूं.

News18Hindi
Updated: March 14, 2018, 10:50 AM IST
'वो मुझे भूलने लगी है, मैं उसे और भी ज्यादा प्यार करने लगा हूं'
नितेश सालों से अपनी बीमार पत्नी की देखभाल कर रहे हैं
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Updated: March 14, 2018, 10:50 AM IST
दिया ने ही मुझे मेरा पहला कैमरा दिया था. उसने मुझे सिखाया कि अहसासों को तस्वीरों में कैसे उतारते हैं. अब, जबकि वो पिछले 10 सालों से बिस्तर पर है, मैं उसकी छोटी से छोटी हरकत को कैमरे में कैद कर रहा हूं.

वो मेरी better half नहीं, वो खुद मैं हूं.

नितेश नूर मोहंती पेशे से फोटोग्राफर हैं. उनकी पत्नी, दिया को मस्तिष्क ट्यूमर है. तीन सर्जरी और अनगिन कीमोथैरेपी सेशन्स के बीच वे सालों से बिस्तर पर हैं. नितेश अब उनके साथी, पिता, मां, दोस्त, नर्स, सबकुछ हैं. पढ़ें, नितेश को.

मैं दिया से मिला, तब वो 16 और मैं 17 साल का था.

दोनों ही आर्ट से जुड़े हुए थे. फोटोग्राफी को लेकर दिया का पैशन सबसे बढ़कर था. वो जब-तब इतनी कम उम्र में तस्वीरों और सब्जेक्ट को लेकर अपनी गहरी समझ से मुझे हैरान करती रहती थी. हम 11 साल ऐसे ही साथ रहे. बीच में मैं पढ़ाई के लिए अहमदाबाद रहा. हर हफ्ते मुझे उसकी एक चिट्ठी मिलती, भले ही मैं उसके फोन का भी जवाब न दूं. उसने कभी शिकायत नहीं की.

2003 में हमने शादी कर ली. रुमानी शामें, उजले दिन, तोहफे, प्यार, सपने, सफर- सबकुछ सही जा रहा था कि तभी दिया को एपिलेप्टिक अटैक आया.

स्कैन से पता चला कि उसे सिर का ट्यूमर है. डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए. अब इलाज से उसकी जिंदगी सिर्फ खींची जा रही है. आधे दिन घर पर बीतते हैं और आधा वक्त अस्पताल में. अब तक तीन ऑपरेशन्स हो चुके. लगातार कीमोथैरेपी चल रही है. हर बीतता दिन उसके शरीर को कमजोर बना रहा है. करवट लेने के लिए भी उसे मदद चाहिए होती है. सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती है, जब वो मुझे या हमारी तस्वीरों को अनजान नजरों से देखती है. उसकी याददाश्त पर भी फर्क पड़ा है.

मैं दिया से उस वक्त मिला, जब आसपास का सबकुछ उसके आकर्षण में बंधा था. वो कमउम्र थी, खूबसूरत थी, बेहद जहीन और काबिल. लेकिन उन दिनों भी मैंने उसके लिए वो प्यार महसूस नहीं किया, जो अब करता हूं. मां बनकर उसकी कंघी-चोटी करता हूं, पिता की तरह उसे अस्पताल ले जाता हूं, साथी की तरह उसे चूमता, गले लगता हूं और दोस्त बनकर उसे हंसाता हूं. हर भूमिका के साथ मेरा प्यार भी उसके लिए बदल जाता है, थोड़ा बढ़ जाता है.

तकलीफ के इन दिनों में मुझे प्यार के कई ऐसे कोने-कंगूरे मिले, जो मैं खुद नहीं जानता था कि मेरे भीतर हैं.

अपने तमाम प्यार के बावजूद मैं रोज उसे मरता देख रहा हूं और रोज उसके साथ खुद भी थोड़ा सा मर रहा हूं. कोई भी दिन दिया के लिए आखिरी हो सकता है. ये तो नहीं बदल सकता लेकिन कोशिश करता हूं कि हर दिन को बीते दिन से खुशनुमा बना सकूं.

उसकी याददाश्त कमजोर हो रही है लेकिन मुस्कान और प्यार को किसी याद की जरूरत नहीं होती.

(ये कहानी फेसबुक पेज Humans of Bombay से ली गई है.)

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