90 सालों में सिर्फ 8 बार 'टाइम' को लगा कि कोई महिला भी कवर पर छपने के लायक है

टाइम मैगजीन ने पर्सन ऑफ द ईयर की घोषणा कर दी है. यह अवार्ड उन 35 चेहरों को मिला है, जिन्होंने यौन शौषण के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर आवाज उठाई. इसमें महिलाओं के साथ वे पुरुष भी शामिल हैं, जिन्होंने उनकी आवाज में अपनी आवाज मिलाई.

News18Hindi
Updated: December 8, 2017, 8:38 AM IST
90 सालों में सिर्फ 8 बार 'टाइम' को लगा कि कोई महिला भी कवर पर छपने के लायक है
टाइम मैगजीन ने पर्सन ऑफ द ईयर की घोषणा कर दी है
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Updated: December 8, 2017, 8:38 AM IST
टाइम मैगजीन ने पर्सन ऑफ द ईयर की घोषणा कर दी है. यह अवार्ड उन 35 चेहरों को मिला है, जिन्होंने यौन शौषण के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर आवाज उठाई. इसमें महिलाओं के साथ वे पुरुष भी शामिल हैं, जिन्होंने उनकी आवाज में अपनी आवाज मिलाई. हालांकि इसका एक दूसरा पहलू भी है कि 90 सालों के इतिहास में इस प्रतिष्ठित मैगजीन के कवर पेज पर सिर्फ आठ बार महिलाएं कवर पेज पर आईं, जिनमें से भी दो बार ये कोई अकेली महिला नहीं, बल्कि महिलाओं के समूह थे.

इसकी तुलना में चौंकाने वाली बात ये है कि महिलाओं की तुलना में नौ पुरुष दो-दो बार पर्सन ऑफ द ईयर बने और दो पुरुषों को तीन बार इसमें जगह मिली.  टाइम जैसी नामचीन पत्रिका में ऐसा होना जेहन में कई सवाल लाता है. सबसे पहले बात है महिला अधिकारों की. अमेरिका में जहां महिलाओं के अधिकारों की इतनी लड़ाइयां लड़ी जा रही हैं, जहां से #MeToo जैसे कई सोशल कैंपेन की शुरुआत हो रही है, वहां पर ये बात साफ करती है कि बराबरी के हक की लड़ाई अभी शुरुआती चरण में है.

दूसरा तथ्य ये भी है कि क्या 9 दशकों में किसी महिला ने कोई ऐसा काम नहीं किया है, जिससे वो टाइम के कवर तक पहुंच सके! कहीं-कहीं इस बात को महिलाओं के हक पर राजनैतिक आक्रमण की तरह भी देखा जा सकता है, जहां 90 सालों में केवल आठ दफा ही महिलाएं साल का चेहरा चुने जाने लायक लगीं. इससे साफ होता है कि अभी आधी आबादी को और भी कई कैंपेन चलाने होंगे, जो उन्हें ज्यादा नहीं तो उनके हक लायक जगह दे सकें.
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