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इब्तिदा-ऐ-इश्क है रोता है क्या, पढ़ें मीर तक़ी 'मीर' के शेर और शायरी

इब्तिदा-ऐ-इश्क है रोता है क्या, पढ़ें मीर तक़ी 'मीर' के शेर और शायरी

मीर की शायरी

मीर की शायरी

Meer Taqi Meer Shayari: पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है...

    मीर तक़ी 'मीर' के शेर और शायरी (Meer Taqi Meer Shayari): मीर तक़ी 'मीर' उर्दू शायरी और ग़ज़ल का एक ऐसा नाम हैं जिन्हें ख़ुदा-ए-सुख़न की उपमा दी जाती है. ख़ुदा-ए-सुख़न का मतलब है शायरी का खुदा. मीर ने अपनी शायरी में मोहब्बत के शुरूआती एहसास से लेकर मोहब्बत की तड़प, कशमकश सबकुछ बेहद खूबसूरती से बयां की है. मोहब्बत की कशमकश को बयां करते हुए खुद मीर ने लिखा है कि- पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है , जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है. ऐसा कहा जाता है कि मिर्ज़ा ग़ालिब ने एक बार एक फकीर से मीर की एक नज्म सुनी तो उनके मुंह से बरबस ही निकला, 'रेख्ते के तुम ही नहीं हो उस्ताद ग़ालिब, कहते हैं पिछले ज़माने में कोई मीर भी था.' मीर तक़ी 'मीर' की प्रसिद्ध रचनाएं हैं- ज़िक्र-ए-मीर (आत्मकथा), कुल्लीयते-मीर, कुल्लीयते-फ़ारसी, फ़ैज़-ए-मीर, कहानियों , नुकत-उस-शूरा. आइए पढ़ते हैं आज कविता कोश के सभार से हम आपके लिए लाए हैं मीर की मशहूर शायरी....

    इब्तिदा-ऐ-इश्क है रोता है क्या...

    इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या
    आगे-आगे देखिये होता है क्या

    क़ाफ़िले में सुबह के इक शोर है
    यानी ग़ाफ़िल हम चले सोता है क्या

    सब्ज़ होती ही नहीं ये सरज़मीं
    तुख़्मे-ख़्वाहिशदिल में तू बोता है क्या

    ये निशान-ऐ-इश्क़ हैं जाते नहीं
    दाग़ छाती के अबसधोता है क्या

    ग़ैरते-युसूफ़ है ये वक़्त ऐ अजीज़
    'मीर' इस को रायेग़ाँ खोता है क्या

    इब्तिदा-ऐ-इश्क: इश्क की शुरुआत

    ग़ाफ़िल- अनभिज्ञ

    तुख़्मे-ख़्वाहिश: इच्छाओं के बीज

    अबस- बिन प्रयोजन

    रायेग़ाँ- व्यर्थ

    हमारे आगे तेरा जब किसी ने नाम लिया...

    हमारे आगे तेरा जब किसी ने नाम लिया
    दिल-ए-सितम-ज़दा को हमने थाम-थाम लिया

    ख़राब रहते थे मस्जिद के आगे मयख़ाने
    निगाह-ए-मस्त ने साक़ी की इंतक़ाम लिया

    वो कज-रविश न मिला मुझसे रास्ते में कभू
    न सीधी तरहा से उसने मेरा सलाम लिया

    मेरे सलीक़े से मेरी निभी मोहब्बत में
    तमाम उम्र मैं नाकामियों से काम लिया

    अगरचे गोशा-गुज़ीं हूँ मैं शाइरों में 'मीर'
    प' मेरे शोर ने रू-ए-ज़मीं तमाम किया.

    जो तू ही सनम हम से बेज़ार होगा...

    जो तू ही सनम हम से बेज़ार होगा
    तो जीना हमें अपना दुशवार होगा

    ग़म-ए-हिज्र रखेगा बेताब दिल को
    हमें कुढ़ते-कुढ़ते कुछ आज़ार होगा

    जो अफ़्रात-ए-उल्फ़त है ऐसा तो आशिक़
    कोई दिन में बरसों का बिमार होगा

    उचटती मुलाक़ात कब तक रहेगी
    कभू तो तह-ए-दिल से भी यार होगा

    तुझे देख कर लग गया दिल न जाना
    के इस संगदिल से हमें प्यार होगा.

    पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है

    जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है.

    -नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
    पंखुड़ी इक गुलाब की सी है.

    -दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है
    ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया.

    -कोई तुम सा भी काश तुम को मिले
    मुद्दआ हम को इंतिक़ाम से है.

    -बेवफ़ाई पे तेरी जी है फ़िदा
    क़हर होता जो बा-वफ़ा होता.

    Tags: Book, Lifestyle

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