दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है, पढ़ें मिर्ज़ा ग़ालिब की मशहूर शायरियां

दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है, पढ़ें मिर्ज़ा ग़ालिब की मशहूर शायरियां
पढ़ें मिर्ज़ा ग़ालिब की मशहूर शायरी

मिर्ज़ा ग़ालिब शेर और शायरी ( Mirza Ghalib Shayari): हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले...

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 28, 2020, 10:58 AM IST
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मिर्ज़ा ग़ालिब शेर और शायरी ( Mirza Ghalib Shayari): मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू के मशहूर शायर जिनकी शेर ओ शायरी के चर्चे से शायद ही कोई मरहूम हो. ग़ालिब ने उर्दू और फारसी में भी ऐसे कई शेर और शायरियां कुछ इस अंदाज में लिखीं कि लोग उनके क़ायल थे. ग़ालिब मुगलकाल के प्रसिद्ध कवि थे. ग़ालिब ने अपनी शायरियों में मानो अपना दिल ही निकालकार रख दिया है. ग़ालिब ही वो शायर हैं जिन्होंने अपने उदास दिल से सवाल किया दिल ए नादान तुझे हुआ क्या है और हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले. आज हम रेख्ता डॉट कॉम के हवाले से लेकर आए हैं मिर्ज़ा ग़ालिब के चंद मशहूर शेर और शायरियां...

तेरे वादे पर जिये हम...


तेरे वादे पर जिये हम, तो यह जान, झूठ जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते, अगर एतबार होता .

वह हर एक बात पर कहना कि यों होता तो क्या होता...


न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
डुबोया मुझको होने ने न मैं होता तो क्या होता !


हुआ जब गम से यूँ बेहिश तो गम क्या सर के कटने का,
ना होता गर जुदा तन से तो जहानु पर धरा होता!
हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूं होता तो क्या होता !

ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं...


ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं
कभी सबा को, कभी नामाबर को देखते हैं

वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत हैं!
कभी हम उमको, कभी अपने घर को देखते हैं

नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाज़ू को
ये लोग क्यूँ मेरे ज़ख़्मे जिगर को देखते हैं

तेरे ज़वाहिरे तर्फ़े कुल को क्या देखें
हम औजे तअले लाल-ओ-गुहर को देखते हैं.

तुम न आए तो क्या सहर न हुई...


तुम न आए तो क्या सहर न हुई
हां मगर चैन से बसर न हुई
मेरा नाला सुना ज़माने ने
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई.

सहर- प्रात:
बसर- गुज़रना
नाला- रोना-धोना, शिकवा

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले...


हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यों मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर

वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूं दम-ब-दम निकले

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन

बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले

भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का

अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले

मगर लिखवाए कोई उस को ख़त तो हम से लिखवाए

हुई सुब्ह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले

हुई इस दौर में मंसूब मुझ से बादा-आशामी

फिर आया वो ज़माना जो जहां में जाम-ए-जम निकले

हुई जिन से तवक़्क़ो' ख़स्तगी की दाद पाने की

वो हम से भी ज़ियादा ख़स्ता-ए-तेग़-ए-सितम निकले

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का

उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

कहां मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहां वाइ'ज़

पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले

दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है ...


दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

हम हैं मुश्ताक़ और वो बे-ज़ार

या इलाही ये माजरा क्या है

मैं भी मुंह में ज़बान रखता हूं.

काश पूछो कि मुद्दआ' क्या है
जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद

फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है

ये परी-चेहरा लोग कैसे हैं

ग़म्ज़ा ओ इश्वा ओ अदा क्या है
शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-अंबरीं क्यूँ है

निगह-ए-चश्म-ए-सुरमा सा क्या है
सब्ज़ा ओ गुल कहाँ से आए हैं

अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद

जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
हां भला कर तिरा भला होगा

और दरवेश की सदा क्या है
जान तुम पर निसार करता हूं

मैं नहीं जानता दुआ क्या है
मैं ने माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब'

मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है.

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन...


हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल को ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है.
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