लाइव टीवी
Elec-widget

दो साल में बच्चों ने बस्ती को दिलाई नशे से 'मुक्ति', ऐसे उठाया कदम

News18Hindi
Updated: November 15, 2019, 6:00 PM IST
दो साल में बच्चों ने बस्ती को दिलाई नशे से 'मुक्ति', ऐसे उठाया कदम
बाबरवस्ती पांडेझरी गांव की ही एक बस्ती है. अरविंद इसी स्कूल में पढ़ता है, जहां दिलीप बाघमारे उसे पढ़ाते हैं.

चंद्रकांत बताते हैं कि दिलीप सर से मिलने के बाद उन्होंने पूरे गांव को नशा मुक्त बनाने की अपनी योजना के बारे में बताया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 15, 2019, 6:00 PM IST
  • Share this:
(शिरीष खरे)
नशे के आदी किसी आदमी की आदत बदलना आसान काम नहीं होता. ऐसे में एक स्कूल ने पूरी बस्ती के लोगों की आदत बदल दी है. इस स्कूल ने तंबाकू और शराब का नशा करने वाले लोगों को नशे से मुक्ति दिलाई है. यहां के छोटे बच्चों ने सिर्फ दो साल में हजारों लोगों की सोच बदल दी है. पश्चिम महाराष्ट्र के जिला मुख्यालय सांगली शहर से करीब 150 किलोमीटर दूर जत ब्लॉक का एक छोटा-सा गांव है पांडेझरी. यह सूखाग्रस्त गांव है. यहां के किसान ज्वार और बाजरा उगाते हैं. इसके अलावा कुछ किसान खेतों में पानी होने की स्थिति में अंगूर की खेती करना पसंद करते हैं.

इसे भी पढ़ेंः फ्रिज में भूलकर भी न रखें ये चीजें, खतरे में पड़ सकती है आपकी जिंदगी

बेटे अरविंद ने खाना खाने से किया मना

बस्तियां काफी दूर-दूर और आबादी अपेक्षाकृत कम है. चंद्रकांत कांबले इस गांव के सरपंच हैं. चंद्रकांत कहते हैं कि कोई डेढ़-दो साल पहले की बात है, ऐसी घटना घटी जिसके बारे में उन्होंने सोचा नहीं था. दूसरी में पढ़ने वाले उनके बेटे अरविंद ने उनसे कहा कि वह खाना नहीं खाएगा. चंद्रकांत ने खाना खाने के लिए उसे बहुत मनाया और उससे उसकी इस जिद का कारण पूछा. उसने बताया कि पापा आप नशा करना बंद कर दो. चंद्रकांत बताते हैं कि अरविंद की बात सुनकर वह हैरान हो गए. उनसे गांव में किसी ने ऐसा नहीं कहा था. इसलिए, अगले दिन वह इस बात को समझने के लिए बाबरवस्ती की प्राथमिक शाला पहुंचें.

स्कूल के टीचर ने  गांव को नशा मुक्त बनाने की योजना बनाई
बाबरवस्ती पांडेझरी गांव की ही एक बस्ती है. अरविंद इसी स्कूल में पढ़ता है, जहां दिलीप बाघमारे उसे पढ़ाते हैं. चंद्रकांत ने दिलीप बाघमारे को पूरी घटना के बारे में बताया. चंद्रकांत बताते हैं कि दिलीप सर से मिलने के बाद उन्होंने पूरे गांव को नशा मुक्त बनाने की अपनी योजना के बारे में बताया. इस बारे में दिलीप बाघमारे कहते हैं कि हमारे बच्चों ने कक्षा में सीखने की कुछ गतिविधियों के दौरान अपनी और अपने आसपास के लोगों की अच्छी और बुरी आदतों को पहचाना था. इस दौरान बच्चों ने इस बात पर चर्चा की थी कि किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए किस तरह से तंबाकू और शराब का सेवन बुरा हो सकता है. इसलिए, अरविंद भी नहीं चाहता था कि उसके पिता नशा करें.
Loading...

नशा-मुक्ति अभियान चलाने का संकल्प
उन्होंने सरपंच चंद्रकांत से कहा कि यदि वे नशा छोड़ दें तो पूरी बस्ती और गांव के बाकी लोगों को नशे की लत छुड़ाने में मदद मिलेगी. दिलीप के अनुसार, इन बातों को सुन चंद्रकांत भावुक हो गए. फिर सरपंच होने के नाते उन्होंने नन्हें बच्चों के नेतृव्य में गांव के लिए नशा-मुक्ति अभियान चलाने का संकल्प लिया. वहीं, दिलीप बाघमारे के मुताबिक नशा-मुक्ति का अभियान बहुत चुनौतीपूर्ण था. वह बताते हैं कि तीन सौ की आबादी वाली बस्ती के इस स्कूल में पढ़ने के लिए पचास बच्चे भी नहीं थे. इसलिए उनके सामने पहली चुनौती थी- हम क्या करें?

'अच्छी और बुरी आदतों' विषय पर विशेष सत्र 
वह कहते हैं कि सबसे पहले उन्होंने बच्चों के लिए 'अच्छी और बुरी आदतों' विषय पर कुछ विशेष सत्र आयोजित किए. इनमें बच्चों से नशे के कारण होने वाले बुरे प्रभावों पर चर्चा कराई गई. फिर बच्चे अपने घर, आस-पड़ोस और मोहल्लों में नशे के नुकसान बताने लगे. बच्चे गांव के लोगों को बताते कि तंबाकू खाने से देश और दुनिया में कितने लोगों को मुंह का कैंसर हुआ है. स्कूल के बच्चे गांव के लोगों को मुंह के कैंसर वाली तस्वीरें दिखाते फिर वह समय भी आया जब इन बच्चों के परिवार वालों ने बच्चों के साथ मिलकर पूरे गांव में नशा-मुक्ति के लिए एक रैली निकाली.

बाबा उन्हें पैसा देकर गुटखा लाने को कहते थे
तीसरी में पढ़ने वाली आरती कौरे बताती हैं कि जब उन्होंने अपने दादा से गुटखा छोड़ने को कहा तो वह नहीं माने. आरती के बार-बार मना करने पर भी वह चोरी-चोरी गुटखा खाते थे. एक बार आरती ने उन्हें गुटखा खाते देखा तो वह रोनी लगी. तब उन्हें कहना पड़ा कि रो मत, जा नहीं खाऊंगा गुटखा. तीसरी की ही गोड़प्पा धनसरी कहती हैं कि उनके बाबा उन्हें पैसा देकर गुटखा लाने को कहते थे. एक दिन गोडप्पा ने उनसे कहा ये (गुटखा) खाना इतना अच्छा है तो वह भी खाएगी. वह बोले गुटखा बहुत गंदा होता है तो गोड़प्पा ने कहा कि ऐसा होता तो आप खाते ही नहीं. ऐसा बोल-बोलकर बाबा का गुटखा खाना बंद कराया गया.

पचास में से कोई एक आदमी गुटखा खाते दिख जाता है
ग्रामीण गोडप्पा कुलाड़े बताते हैं कि नशा इतना आसानी से नहीं छूट रहा था लेकिन, बच्चों के प्यार में हम पसीज गए. गोड़प्पा कुलाड़े के मुताबिक दो साल पहले गांव में गुटखा खाने का चलन अधिक था. आज हो सकता है पचास में से कोई एक आदमी गुटखा खाते दिख जाए लेकिन, अब गांव वाले ऐसे आदमी को गुटखा खाने के लिए मना करते हैं. दिलीप बताते हैं कि उन्होंने स्कूल स्तर पर कई सांस्कृतिक कार्यक्रम कराए. नशा छोड़ना क्यों जरूरी है, जैसे विषयों पर कई व्याख्यान आयोजित कराए गए. इनमें बाहर से नशे से संबंधित विषयों के विशेषज्ञ बुलाए गए. इनमें चिकित्सक और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थे.

इसे भी पढ़ेंः हरी सब्जियां ही नहीं लाल सब्जियां भी आपको बना सकती हैं फिट, ये रहे फायदे

नशा मुक्ति शिविर भी लगाए गए
इसके अलावा नशा मुक्ति शिविर भी लगाए गए थे. ग्रामीण बालाजी पडलवार बताते हैं कि ऐसा नहीं है कि उन्हें शराब की बुराई के बारे में कुछ पता ही नहीं था, मगर जब बच्चे और पूरा गांव शराब पीने के लिए मना करने लगा तो उन्होंने सोचा क्यों नशा करके माहौल खराब करें. अंत में बुर्जुग महिला कल्पना कौरे ने कहा कि बड़े होने के नाते हमारा काम होता है कि बच्चों को अच्छी आदते सिखाना, पर बच्चे हमें बताएं कि अच्छा क्या और बुरा क्या, और किससे क्या नुकसान होगा, तो पहले बुरा भले लगे, पर बाद में तो अच्छा ही लगता है.

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए लाइफ़ से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: November 15, 2019, 6:00 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com