Independence Day Special: जब महात्‍मा गांधी ने कहा, 'मैं स्‍त्री होता तो पुरुषों के थोपे गए अन्‍याय का विरोध करता'

Independence Day Special: जब महात्‍मा गांधी ने कहा, 'मैं स्‍त्री होता तो पुरुषों के थोपे गए अन्‍याय का विरोध करता'
गांधी जी इस बात का समर्थन करते थे कि स्त्रियों को बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए.

महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने समय-समय पर अपने लेखों में इस बात को लिखा कि स्‍त्री को बराबरी का अधिकार मिलना ही चाहिए. महिलाओं को लेकर गांधी जी की जो सोच थी उसे आज के समय में देखा जाए तो उन्‍हें नारीवादी (Feminist) कहना गलत नहीं होगा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 15, 2020, 9:48 AM IST
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महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के जीवन के हर पहलू पर चर्चा होती रही है. फिर चाहे आजादी (Freedom) से जुड़ी उनकी कोई मुहिम हो या उनके विचार, लेकिन बात जब महिलाओं (Women) के साथ गांधी जी के संबंधों की आती है, तो चर्चा उनकी आत्‍मकथा 'सत्य के साथ मेरे प्रयोग' तक सीमित होकर रह जाती है. मगर गांधी जी ने इससे आगे बहुत कुछ कहा था. समाज में स्त्रियों की दशा और उनके साथ हो रहे सुलूक से गांधी जी बेहद आहत थे. यही वजह है कि उन्‍होंने स्त्रियों की आजादी और उन्‍हें बराबरी का अधिकार दिए जाने की बात का न सिर्फ समर्थन किया, बल्कि समय-समय पर अपने लेखों में इस बात को लिखा भी कि स्‍त्री को बराबरी का अधिकार मिलना ही चाहिए. दरअसल, महिलाओं को लेकर गांधी जी की जो सोच थी उसे आज के समय में देखा जाए तो उन्‍हें नारीवादी (Feminist) कहना गलत नहीं होगा. आज जो भी महिलाओं की आजादी और उनके अधिकारों पर लेकर कहा जाता है, वह सब महात्‍मा गांधी अपने समय में कह चुके. आज हम गांधी जी के महिलाओं के संबंध में व्‍यक्‍त किए गए उन्‍हीं विचारों की चर्चा करेंगे.

पत्नी पति की जायदाद नहीं है
किसी भी महिला को पत्‍नी के तौर पर पूरी आजादी मिलनी चाहिए और गांधी जी इस बात के पक्षधर थे. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक गांधी जी यहां तक कहा करते थे कि 'स्त्रियों का बिना अनुमति के कहीं भी न जा सकना तो एक तरह की कैद है. अगर मैं पत्‍नी पर दबाव डालता हूं तो वह मुझ पर क्यों न डाले?' गांधी जी ने यहां तक कहा था कि 'जिस तरह आप उसकी जायदाद नहीं हैं. वैसे ही आपकी पत्नी भी आपकी जायदाद नहीं है. अपनी पत्नी को मोहब्बत से जीतना चाहिए.'

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अबला कहना मानहानि जैसा


गांधीजी महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले अधिक सुदृढ़ और सहृदय मानते थे. यही वजह है कि वह नारी को अबला कहने के सख्त खिलाफ रहे. वह यहां तक कहते थे कि नारी को अबला कहना उसकी मानहानि के बराबर है. उन्‍होंने महिलाओं की बराबरी के बारे में अपने विचार रखते हुए साफ कहा था कि 'मैं अपने बेटे और बेटियों के साथ बिल्‍कुल एक जैसा बर्ताव करना चाहूंगा.'

स्त्रियां पुरुष के लिए सजने से इंकार कर दें
महात्मा गांधी ने यंग इंडिया में समाज में स्त्रियों की स्थिति और भूमिका पर अपने विचार रखते हुए लिखा था कि 'आदमी जितनी बुराइयों के लिए जिम्मेदार है. उनमें सबसे घटिया है नारी जाति का दुरुपयोग करना. अब महिलाएं भी खुद को पुरुष के भोग की वस्तु मानना बंद कर दे. आईडिवा की प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक गांधी जी का विचार था कि स्‍त्री को पुरुष के लिए सजने से इंकार कर देना चाहिए. तभी वह पुरुष के साथ बराबर की साझीदार बन सकेगी.' उन्‍होंने तो यहां तक कहा था कि 'अगर मैं स्त्री के रूप में जन्मा होता, तो पुरुषों के हर उस दावे का विरोध करता जिसमें वे कहते आ रहे हैं कि स्त्री का जन्‍म पुरुष का मन बहलाने के लिए हुआ है.'

स्‍त्री को न कहना आना चाहिए
हरिजन में अपने विचार रखते हुए गांधी जी ने स्‍पष्‍ट कहा था, 'स्‍त्री को न कहना भी आना चाहिए. मेरा पक्‍का विश्‍वास है कि इस देश की सही शिक्षा यही होगी जब स्त्री अपने पति से भी 'न' कहने की कला सीख ले. स्‍त्री के अपने भी अधिकार और कर्तव्य हैं. पति के हाथ की कठपुतली बन कर जीना उसके कर्तव्य का हिस्‍सा नहीं है.'

पुरुषों को स्त्रियों के प्रति रवैया बदलना होगा
गांधी जी ने कड़े शब्‍दों का प्रयोग करते हुए यहां तक कहा था कि 'कुछ लोग अपनी स्त्री को जानवर के बराबर समझते हैं.' वह आगे कहते हैं, 'हमें उस प्रथा को ही उखाड़ कर फेंक देना चाहिए, जो स्त्रियों को हीन समझती है. एक पति के तौर पर पुरुष को अपनी पत्नी के प्रति अपना रवैया बदलना ही होगा,' इसके अलावा भी कई बार उन्‍होंने इस बात का समर्थन किया कि पत्नी पति की दासी नहीं है, उसकी जीवनसाथी है.

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स्त्रियों को गुलाम समझना है बर्बरता
गांधी जी कहा करते थे कि महिलाओं को गुलाम बनाए रखना हमारी बर्बरता की निशानी है. उन्‍हें रसोई की गुलामी में बांधे रखना हमारी बर्बर जमाने की बची हुई निशानी जैसा है. अब उन्‍हें इससे आजादी मिलनी चाहिए. नारी पर ऐसा कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं लगाना चाहिए जो पुरुषों पर न लगाया गया हो.'
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