स्त्री देह की हर सुंदर कहानी के पीछे एक सुंदर पुरुष था

औरत से बात करते हुए जिस मर्द की निगाह उसके चेहरे पर नहीं, छातियों पर टिकी है, जो उससे ऊपर उठ ही नहीं पा रहा, वो उस पीड़ा में अपनी आपाराधिक हिस्सेदारी दर्ज कर रहा है.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: August 9, 2019, 5:01 PM IST
स्त्री देह की हर सुंदर कहानी के पीछे एक सुंदर पुरुष था
इंदु हरिकुमार के प्रोजेक्ट "आइडेंटिटी" की एक पेंटिंग
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: August 9, 2019, 5:01 PM IST
ब्रेस्ट फीडिंग वीक गुजर गया. सारी अच्छी बातें, मातृत्व के गर्व की बातें, खुशी की बातें, सेहत और सावधानियों की बातें गुजर गईं. अब असली वाली बातें करते हैं. वो बातें, जो इस मिट्टी में जन्मी तकरीबन हर लड़की की जिंदगी में उस दिन से दबे पांव दाखिल हो गईं, जिस दिन से उसकी देह ने आकार लेना शुरू किया था. सबकुछ इतना चुपके से हुआ कि जैसे आहिस्ता से डरपोक चूहा निकलता है आलमारी के पीछे से. आहिस्ता से बदलाव आए और उससे भी ज्यादा आहिस्ता से आई शर्म और फिर डर.

मैं शायद पांचवी या छठी में रही होऊंगी. तब तक मैं दरवाजा बंद करके फ्रॉक बदलने लगी थी. एक दिन अचानक दादी कमरे में आ गईं. मैंने घबराकर खुद को ढंक लिया. ये किसी ने सिखाया नहीं था. खुद-ब-खुद हो रहा था. बाद में दादी को आहिस्ता से मां से पूछते सुना कि उसने ऐसा क्यों किया. मां के जवाब पर उन्हें आहिस्ता से सलाह देते भी सुना कि “गर्म लोढ़े से छाती सेंक दो. दब जाएगी.” वो गर्म लोढ़ा मेरी छाती पर कभी रखा नहीं गया, लेकिन उसकी आग बहुत सालों तक महसूस होती रही. मैं दादी को जब भी देखती, मुझे जलता हुआ लोढ़ा याद आता. हालांकि वो बात क्यों कही गई, उसके क्या मायने, क्या संदर्भ, कौन सी ऐसी जरूरत थी, मुझे कुछ पता नहीं था. बस इतना पता था कि वो मुझे जलाना चाहती थीं. उस दिन के बाद मुझे दादी कभी अच्छी नहीं लगी.

मुझे अपनी देह भी अच्छी नहीं लगी. देह के उस बदलते हिस्से से मुझे हमेशा नफरत थी. कितनी सारी लड़कियां ऐसे ही बड़ी हुईं, खुद से नफरत करते हुए. लड़की के भीतर जो बदल रहा था, उसका एहसास उसे खुद नहीं हुआ. आसपास की दुनिया ने, मर्दों ने करवाया. दादी वाले वाकये से पहले उस दोपहर मां ने मुझे एक रु. की टॉफी के वायदे के साथ चायपत्ती के लिए दौड़ा दिया था. दोपहर का वक्त, दुकान में बिलकुल सन्नाटा. मैं अपनी पसंदीदा टॉफी का रैपर खोलने में बिजी. दुकान वाले ने मौका पाकर छातियों पर चिकोटी काट ली. बहुत तेज दर्द हुआ. अब तक मुझे इस बात का बिलकुल एहसास नहीं था कि देह में कुछ बदल रहा है. फ्रॉक के भीतर से कुछ उभर रहा है. वो अलग सा दिखाई देता है. मुझे ये एहसास प्रकृति ने नहीं, उस आदमी ने कराया था. मेरी छातियां उभर रही थीं. मैं बदल रही थी, मैं औरत बन रही थी.

सभी चित्र इंदु हरिकुमार के प्रोजेक्ट "आइडेंटिटी" से. ये और उस प्रोजेक्ट के सारे चित्र उनकी इंस्टाग्राम वॉल पर देखे जा सकते हैं.
सभी चित्र इंदु हरिकुमार के प्रोजेक्ट "आइडेंटिटी" से. ये और उस प्रोजेक्ट के सारे चित्र उनकी इंस्टाग्राम वॉल पर देखे जा सकते हैं.


ये बदलाव की शुरुआत थी. लेकिन जैसे डॉरिस लेसिंग ने लिखा है, ये आईने में खुद को कनखियों से निहारने और लजाने की शुरुआत नहीं थी. ये स्कारलेट ओ हारा की तरह गर्व महसूस करने और खुशी में इतराने की भी शुरुआत नहीं थी. एन्न फ्रैंक की तरह अपनी डायरी में इस संशय को दर्ज करने की भी शुरुआत नहीं थी. ये डर की शुरुआत थी. ये अपनी देह को लेकर चौकन्ना रहने, घबराने और सावधानियां बरतने की शुरुआत थी. ये विचित्र डरावनी नजरों से घूरे जाने की शुरुआत थी. ये आपको देखने की घर के अंकलों तक की नजर बदल जाने की शुरुआत थी. ये भीड़ में, एकांत में, अंधेरे में मौका पाते ही छातियां टटोले जाने की शुरुआत थी. ये गर्म लोढ़ों की शुरुआत थी. ये शर्मिंदगी और डर की शुरुआत थी. और ये अकेले मेरी शुरुआत नहीं थी. ये मेरे आसपास की हर लड़की की जिंदगी में बदलाव की शुरुआत थी.

लेकिन शुरुआत त्रासद न हो तो क्या आगे की कहानी सुंदर शब्दों में लिखी जाती है? यही कहानी ढूंढने निकली थी वो इंडियन आर्टिस्ट इंदु हरिकुमार अपने प्रोजेक्ट “आइडेंटिटी” में, जब उनके पास एक दिन अचानक उस अंजान लड़की का मैसेज आया. लड़की पूछ रही थी कि “मर्दों की नजर हमेशा मेरे सीने पर टिकी रहती है, जैसे बाकी कुछ और मायने ही नहीं रखता.” इंदु ने इंस्टाग्राम पर औरतों से उनकी कहानी मांगी और हर कहानी को एक चित्र में बदल दिया. हर औरत की एक अलग कहानी थी. हर औरत का अपनी छातियों के साथ प्रेम, दर्प, संदेह, साहस, अभिमान और पीड़ा का अनूठा रिश्ता था. किसी को उनके बहुत छोटे होने की शर्म थी तो किसी को बहुत बड़े होने की शर्मिंदगी. एक स्त्री का पति उसके सपाट सीने को कैरम बोर्ड कहता था तो किसी को उसके पति ने इसलिए छोड़ दिया कि उसकी देह में उसे सबसे पसंद थे उसके ब्रेस्ट और ब्रेस्ट कैंसर के बाद वही नहीं रहे. एक है और एक नहीं, ये एक किस्म की अपंगता का, अपाहिज होने का एहसास था. वो शर्म के मारे खुद को आईने में भी नहीं देखती थी.


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देश के कोने-कोने से आई उन कहानियों में एक बात बहुत आम थी. बड़ी होती हर लड़की ने अपनी छातियों को तब जाना, जब किसी परिचित, अंकल, रिश्तेदार या दुकान वाले ने उसे पहली बार दबोच लिया था. सबने बार-बार दोहराई एक ही बात कि तेज दर्द हुआ था. वो इतने बरसों बाद अपना चेहरा, नाम, पहचान छिपाकर अपनी कहानी सुना रही थीं. वो कह रही थीं कि देह का यही एक हिस्सा ऐसा था, जिसके लिए कभी नहीं लगा कि वो मेरा अपना है. मानो उस पर हमेशा किसी और का आधिपत्य था. जिसके जी में आए उसे घूर सकता था, छू सकता था, दबोच सकता था. नैतिकता और सामाजिकता की सीमा के इस पार और उस पार औरत की छातियों पर लगे सैकड़ों घाव थे. इंदु के चित्रों में धीरे-धीरे उन्होंने रिसना शुरू किया.

लेकिन इन रिसते हुए चित्रों के बीच कुछ ऐसे चित्र भी थे, जिनके चारों ओर रंग-बिरंगे फूल बने थे. दुख, शर्मिंदगी और पीड़ा की कहानियों के बीच कुछ ओस सी मुलायम कहानियां. उन कहानियों में उस स्त्री के सीने को बहुत मुहब्बत से निहारती एक जोड़ी आंखें थीं और कामना से टटोलते एक जोड़ी हाथ थे. उनका आटे की लोई की तरह उस क्षण तक गूंथा जाना था कि जब तक सुख और सुकून से लड़की की आंखें न मुंद जाएं और वो सो न जाए. इस नींद के बाद खुली आंखें दुनिया को बस इतरा-इतराकर ही देखती थीं. जमीन से दो इंच ऊपर चलती थीं. गंदी नजरों का आत्मविश्वास से जवाब देती थीं.



स्त्री देह के उस हिस्से की सबसे सुंदर कहानियों के साथ भेजी गईं तस्वीरें भी सबसे सुंदर थीं. ऐसी हर तस्वीर को इंदु हरिकुमार ने सबसे चटख रंगों में उतारा था. और ये सुंदरता भी छातियों के रूप, रंग, आकार की सुंदरता नहीं थी. ये दर्प और अभिमान की, सुंदर महसूस किए जाने की, आदर से संजोए जाने की और आजाद हो सकने की सुंदरता थी.
और ऐसी हर सुंदर कहानी के पीछे एक सुंदर पुरुष था.

जीवन को हमने कैसे रंगों से रचा, ये इस पर ही निर्भर है कि जीवन ने हमें कैसे रंगों से नवाजा. कुछ हमने पाया, कुछ हम ढूंढ लाए. उस प्रोजेक्ट में कितनी लड़कियों की कहानियां पीड़ा की खोह से निकलकर सुदूर फलक तक जाने की कहानियां थीं.

इन कहानियों की कहानी भी कुछ ऐसी है कि कहानी कभी किसी इंडीविजुअल की नहीं होती. एक समाज अपना कलेक्टिव नरेटिव खुद रचता है. और हम औरतों के इस नरेटिव में हमारे समाज के पुरुषों का साझा ही नहीं, बल्कि आपराधिक साझा है. औरत से बात करते हुए जिस मर्द की निगाह उसके चेहरे पर नहीं, छातियों पर टिकी है, जो उससे ऊपर उठ ही नहीं पा रहा, वो उस पीड़ा में अपनी आपाराधिक हिस्सेदारी दर्ज कर रहा है.

स्त्री की देह में हिस्सेदार तो पुरुष को वैसे भी होना ही था. अपनी निगाह बदल लेता तो उसकी कहानी चटख रंगों में बुनी जाती, ऐसे स्याह धूसर रंगों में नहीं कि जिनमें चमक नहीं, अंधेरा है..

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First published: August 9, 2019, 10:50 AM IST
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